‘मनुष्य तू बड़ा महान है’

2021-01-13T04:42:59.753

छुटपन में संघ की शाखाओं पर गाया जरूर करते थे कि मनुष्य तू बड़ा महान है। पर अर्थ आज समझ में आया जब शरीर मसान की राह पर आ टिका है। पता नहीं यह मनुष्य किस हड्डी से बना है कि बड़े-बड़े तूफान और झंझावत इसे झुका ही नहीं सके? जनवरी 2020 में जो मनुष्य कोरोना महामारी से कांप उठा था जनवरी, 2021 आते ही कोरोना महामारी की वैक्सीन ढूंढ लाया। 

जिस कोरोना महामारी के भय से अमरीका जैसा शक्तिशाली राष्ट्र कराह उठा था आज साल भर की उपलब्धि में इस मानव ने उसका इलाज ढूंढ लिया। मानव फिर खड़ा हो गया, भयमुक्त हो गया। कोरोना से लाखों मरने वालों की परवाह न कर मनुष्य भावी पीढ़ी को बचाने वैक्सीन, दवाइयां और टीके ढूंढ लाया। सोचो, यह केवल आज कोरोना महामारी से आविष्कार हुआ है? सिर्फ कोरोना का इलाज इस मानव ने ढूंढ निकाला है? नहीं दोस्तो, इस मानव ने जब धरती पर कदम रखा ही था तब से ही यह मनुष्य सर्दी-गर्मी, भूकंप, महामारी, सुनामी, आसमानी बिजली, बारिश, बाढ़ों से दो-चार होता आया है। घबराया तो आदि मानव तब भी नहीं था, जब वह गुफाओं में रहता था कंदमूल खाकर गुजारा करता था। मानव ने घर का आविष्कार कर डाला। 

अनाज, फल, फूल ले आया। पहली क्रांति मनुष्य ने ‘अग्रि’ के आविष्कार से, दूसरी क्रांति ‘पहिए’ के आविष्कार से मानव जीवन को प्रदान की। कभी तपेदिक, कभी प्लेग ने मानव को आ घेरा। आप ही बताइए आज कहीं प्लेग या तपेदिक दिखता है? मानव ने स्वयं बीमारियों, महामारियों को हराने की ठानी है। पूछो क्यों? इसलिए कि उसमें जीने की इच्छा है। जीवन के प्रति निष्ठा है और उसमें है भावी पीढिय़ों को जिंदा रखने का जज्बा। इस मानव के जीवन में तो काले पक्ष और हताशा का नामो-निशान ही नहीं। इस मानव को तो आगे बढऩा है। बीज को चाहे जितना गहरा गाढ़ो उसे तो सृष्टि देखनी है-उभर कर बाहर आना है। यही मानव प्रकृति है। जीवन को आगे बढऩे से मुसीबतें नहीं रोक सकतीं। संस्कृत में मनुष्य की इस प्रकृति को ‘जिजीविषा’ कहा गया है। भयानक संकटों में भी जीवन को जिंदा रहना है। मानव को आगे बढऩा ही है। 

कोरोना, प्लेग, तपेदिक, सुनामी ‘जिजीविषा’ को मिटा नहीं सकतीं। मनुष्य यकीनन तू बड़ा महान है। नए-नए आविष्कार कर, नई-नई क्रांतियां मानव धरती पर लाता जा रहा है। मानव तू धन्य है, तू महान है। तेरी इस ‘जिजीविषा’ को सलाम है। पक्षियों की उड़ान से तू ही तो ‘वायुयान’ लाया है। बांध बनाकर तूने ही तो दरियाओं को सीमाओं में बांधा है। तेरी संतान धन्य। मानव, तेरे वैज्ञानिक तेरे इंजीनियर्ज, तेरे डाक्टर्ज, तेरे भूगर्भ शास्त्री, तेरे खगोल विज्ञानी, तेरे अन्वेषक, तेरे आविष्कारिक वंदनीय। मनीषी, यती-तपी, बुद्धिजीवी, आलोचक-वाचक-पाठक, संत-महंत सभी वंदनीय। जिन्होंने आज कोरोना जैसी महामारी का इलाज ढूंढ निकाला है। हे मानव, तू अपने उन सहधर्मियों का भी वंदन कर। यही वे लोग हैं जो जीवन को आगे बढ़ा रहे हैं। हे, मानव, तू अपने सब साथियों का अभिनंदन कर। 

जीवन कभी रुकता नहीं। इसे तो आने वाली पीढिय़ों तक पहुंचना है। इस जीवन को आगे बढऩे से प्राकृतिक आपदाओं ने ही नहीं रोका इस जीवन को कई मानवद्राहियों ने भी रोका है। इसे रोकने में कभी कोई हलाकू आया, कभी चंगेज खान, कभी अब्दाली, कभी नादिरशाह, कभी तैमूरलंग और कभी सिकंदर ने भी हाथ आजमाए थे। मानव को खत्म करने के लाखों प्रयत्न किए पर मानव मरा नहीं। सौ-सौ साल धर्म के नाम पर युद्ध हुए इस मानव को मिटाने को। पर मानव मरा नहीं। दो-दो तो विश्व युद्ध हो चुके हैं इस मानव को खत्म करने के लिए, पर शाबाश वीर मानव, आज भी जिंदा है और आगे भी जिंदा रहेगा। 

परन्तु हे मानव! तू अपने वरद पुत्रों पर गर्व कर जिन्होंने तुझे बचाए रखने में अपना सहयोग दिया। क्या तू अरब-मुल्कों की प्रारंभिक अवस्था को नहीं देख रहा? जहां पहले कोई कायदा-कानून नहीं था। अंधविश्वास था, अव्यवस्था थी। मुसीबतें तो मनुष्य को धैर्यवान बनाती हैं। ‘कोरोना’, ‘बर्ड फ्लू’, ‘पोलियो’, ‘प्लेग’, ‘तपेदिक’ तो तेेरे पैरों की ठोकर पर हैं। 

मैं तो मानव का ऋणी हूं कि इसने शासन तंत्र को चलाने के लिए भी कभी राजतंत्र, कभी लोकतंत्र, कभी सैन्य तंत्र, कभी तानाशाही, कभी लोकशाही, कभी साम्यवाद, अपनाया ताकि समाज व्यवस्थित ढंग से चलता रहे। समाज एक मर्यादा में रहे। इन्हीं शासनतंत्रों से ‘मतस्य-न्याय-प्रणाली’ को मानव ने समाज से समाप्त किया। मानव तू धन्य है। बीमारियों में तू विजेता। समाज की व्यवस्था को भी संभाल कर रखा और इस जीवन को भी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाता चला जा रहा है। मानव तेरी सदा ही जय हो।-मा. मोहन लाल(पूर्व परिवहन मंत्री, पंजाब)


Pardeep

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