ममता की चुनौती, ममता को चुनौती

punjabkesari.in Friday, Nov 28, 2025 - 03:48 AM (IST)

बिहार में तो एस.आई.आर. सिर्फ पायलट प्रोजैक्ट था, असली प्रयोग तो बंगाल में होने वाला है। तो क्या बंगाल में ममता बनर्जी हार जाएंगी? क्या ममता को हराना इतना आसान है? बंगाल में विधानसभा चुनाव मार्च-अप्रैल में होने हैं और अभी से चुनावी मौसम शुरू हो गया है। अगले 2-3 महीनों में मौसम बिगडऩा तय है, लिहाजा चुनाव से संबंधित दलों को पेटी बांध लेनी चाहिए। भाजपा की एन.डी.ए. सरकार के पास धनबल है, नेताओं की फौज है, बेहतर रणनीतिकार हैं,  लेकिन ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री हैं, महिलाओं में लोकप्रिय हैं, जीत का जज्बा है, मुस्लिम-ङ्क्षहदुओं को खुश रखा है। ऐसे में मुकाबला कड़ा और नजदीकी का हो सकता है। आमतौर पर कहा जा रहा है कि 30 लाख से लेकर 1 करोड़ तक वोट संदिग्ध हैं। ममता इसे समझ रही हैं। भाजपा के बंगाल के नेता ऐसा संकेत दे रहे हैं। 

पिछले 10 सालों को देखा जाए तो भाजपा का ग्राफ तेजी से बढ़ा है लेकिन ममता बनर्जी की पकड़ में भी कोई कमी नहीं आई। 2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 10 फीसदी वोट मिले थे और सिर्फ तीन सीटें ही जीती जा सकी थीं। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में 3 गुना बढ़कर वोट फीसदी 30 प्रतिशत हो जाता है। सीटों की संख्या 3 से बढ़कर 77 हो जाती है। उधर ममता बनर्जी 2016 का चुनाव दो-तिहाई मतों से और 2021 में तीन-चौथाई मतों से जीतती हैं। 2021 में ममता को 2 करोड़ 87 लाख वोट मिलते हैं। भाजपा को 2 करोड़ 28 लाख वोट मिलते हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में ममता बनर्जी को 2 करोड़ 75 लाख वोट मिलते हैं। 42 में से 29 लोकसभा सीटें कब्जे में आती हैं। उधर भाजपा 12 सीटों पर सिमट जाती है; 2019 में 18 सीटें थीं। लेकिन भाजपा का वोट 2 करोड़ 33 लाख हो जाता है। इस हिसाब से देखा जाए तो ममता और मोदी में वोटों का फासला 2021 के 59 लाख से घटकर 42 लाख ही रह जाता है। ऐसे में अगर 20-22 लाख वोट इधर-उधर हुए तो ममता का खेल बिगड़ सकता है और अगर सच में 1 करोड़ वोट कट गए तो बंगाल में बिहार से भी बड़ी सुनामी आ सकती है। 

अब भाजपा 30 फीसदी तक तो पहुंच गई लेकिन करीब 47 फीसदी वाली ममता को इस संख्या से हराया नहीं जा सकता। जब तक ममता बनर्जी के सुरक्षित वोट बैंक में सेंधमारी नहीं होगी, तब तक भाजपा का सत्ता में आना कठिन लगता है। वाम दलों और कांग्रेस का वोटर जो भाजपा के साथ चला गया था, वह वहीं टिका रहेगा, यह कहना भी मुश्किल नजर आता है। लेकिन ममता क्या ऐसा होने देंगी? सबसे बड़ी बात है कि बिहार में एन.डी.ए. की सरकार थी लेकिन बंगाल में ममता की सरकार है। ऐसे में अपनी मर्जी से एस.आई.आर. करवाना संभव नहीं होगा। ममता दो मोर्चों पर सक्रिय नजर आती हैं। एक, कम से कम वोट कटें। दो, पूरी तरह से ठोक-पीट कर ही नए वोटर के नाम जोड़े जाएं। चुनाव आयोग का नया टैंडर ममता को परेशान कर रहा है। आयोग ने 1000 डाटा एन्ट्री आपरेटर और 50 सॉफ्टवेयर डिवैल्पर अनुबंध के आधार पर भर्ती करने का फैसला किया है। उन्हें 1 साल के लिए रखा जाएगा। ममता ने इसका विरोध किया है। अब मतदाता का फार्म कैसा भरा जाता है यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि डाटा एंट्री क्या की जाती है। उसी के आधार पर वोटर का नाम स्वीकृत होगा या खारिज हो जाएगा। इस मुद्दे पर टी.एम.सी. के 10 सांसदों ने चुनाव आयोग से मिलने का समय मांगा है। 

भाजपा जानती है कि वह बिहार की तरह महिलाओं के लिए दस हजारी योजना पर बंगाल में अमल नहीं कर सकती क्योंकि वहां उसकी सरकार नहीं है। देश भर के लिए कोई योजना लागू कर के ही वह बंगाल की महिलाओं तक पहुंच सकती है। वित्तीय हालत देखते हुए ऐसा संभव नहीं है। वैसे भी ई.डी. के राडार पर ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी से लेकर करीब 10 प्रमुख सांसद और ममता मंत्रिमंडल के मंत्री हैं। क्या अगले 2 महीनों में ई.डी. ओवर टाइम करती नजर आएगी? भाजपा बंगाल में हिंदुत्व और विकास का घोल परोसती रही है। बंगाल में करीब 30 फीसदी मुस्लिम हैं और भाजपा के लिए हिंदू मुस्लिम करना आसान होना चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है। बंगाल में आमतौर पर हिन्दू धर्मनिरपेक्ष रहा है। ऐसे में विरोधी वोट पर एस.आई.आर. की कुल्हाड़ी चलाना आसान उपाय है। लेकिन भाजपा इसके साथ-साथ ममता की बंगाली अस्मिता के हथियार का तोड़ निकालने में लगी है। बंगाल में बाहरी बनाम बंगाल की बेटी के बीच चुनाव का नैरेटिव ममता स्थापित करती रही हैं। इस बार भाजपा भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जरिए सेंध लगाने की कोशिश में है। उसका कहना है कि बंगाल की जनता को आक्रामक अंदाज में यह समझाने की कोशिश होगी कि उनके मुखर्जी बंगाल की मिट्टी के ही मानुष थे। ऐसे में उन पर बाहरी होने का आरोप नहीं लगाया जा सकता।

ममता बनर्जी भाजपा की इस चाल को पहले ही समझ गई थीं। उन्होंने दुर्गा पूजा के मौके पर लगने वाले पंडालों के लिए जमकर पैसा देना शुरू किया। अगर मौलवियों का मानदेय बढ़ाया तो पुजारियों के मानदेय में भी उतना ही इजाफा किया। पिछले लोकसभा चुनावों में तो ममता चुनावी सभाओं में चंडी पाठ करती नजर आई थीं। भाजपा का हिंदू कार्ड तो लोकसभा चुनावों में पिट गया या यूं कहा जाए कि उम्मीद के मुताबिक चला नहीं लेकिन विधानसभा चुनावों में भाजपा संघ के साथ मिलकर इस कार्ड को फिर से भुनाने के फेर में है। लेकिन टी.एम.सी. में निचले स्तर पर भ्रष्टाचार बहुत है। ममता इस पर रोक लगाने में कामयाब नहीं हुईं। पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी ने इस चोरी-चकारी को बड़ा मुद्दा बनाया था। ममता ने तब कुछ जगह कार्यकत्र्ताओं से रिश्वत की रकम लौटाई भी थी लेकिन यह काम एक हद से ज्यादा पूरा नहीं हुआ। ममता बनर्जी के खिलाफ यह मामला तूल पकड़ सकता है। ममता बनर्जी ने समाज के विभिन्न वर्गों के लिए ढेरों योजनाएं चला रखी हैं। भाजपा इन योजनाओं में भ्रष्टाचार और योजना से छूटे हुए वोटरों को भी टारगेट पर ले रही है। कुल मिलाकर मुकाबला तगड़ा होने वाला है। ममता अगर मोदी को चुनौती दे रही हैं तो ममता को मोदी से चुनौती भी मिल रही है।-विजय विद्रोही


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