मालाबार-2 : चीन की ‘परेशानी का सबब’

2020-11-22T05:15:17.383

जब से हिन्द महासागर में भारत समेत तीन देशों ने साझा युद्धाभ्यास किया, चीन के लिए परेशानी का सबब बन गया। चीन इस पर अपनी पैनी नजर बनाए हुए था। जहां चीन अपने फैलाव को लेकर चौकन्ना हो गया है वहीं हिन्द महासागर क्षेत्र में क्वॉड के कदम बढ़ रहे हैं। 

17 से 20 नवंबर के बीच चले मालाबार-2 सैन्याभ्यास में भारतीय और अमरीकी विमानवाहक युद्धपोत ने हिस्सा लिया, विक्रमादित्य विमान वाहक युद्धपोत भारत की तरफ से और अमरीका की तरफ से निमित्ज ने हिस्सा लिया। चार दिनों तक चले इस युद्धाभ्यास में कई और जहाज, पनडुब्बियां और युद्धक विमानों ने हिस्सा लिया, इनमें आई.एन.एस. विक्रमादित्य पर तैनात मिग 29 एम.के.आई., यू.एस.एस. निमित्ज पर तैनात एफ-18 लड़ाकू विमान और ईटूसी हॉक वायुयान शामिल थे। यह नौसेना अभ्यास वृहद पैमाने पर आयोजित हो हुआ। 

दूसरे चरण में इस युद्धाभ्यास का फैलाव अरब सागर में किया  गया, यह अभ्यास मालाबार-1 से कहीं अधिक बड़ा और वृहद था। इसका उद्देश्य ङ्क्षहद महासागर में चीन के बढ़ते कदमों को रोकना है और अपनी सुरक्षा को और मजबूत करना है। इसके साथ ही समुद्री डाकुओं से निपटने और दूसरी मुसीबतों का सामना करना भी इस नौसेना अभ्यास का उद्देश्य था। यह नौ सेना अभ्यास उस समय हुआ जब भारत और चीन की सेनाएं लद्दाख में आमने-सामने डटी हुई हैं और दोनों देशों में युद्ध तनाव को कम करने के लिए सैन्य और राजनयिक स्तर पर वार्ता का दौर जारी है। लेकिन भारत ने एक बात ठान ली है कि वह अपनी ही सरहद में पीछे नहीं हटेगा। भारत चीन को पीछे हटने पर मजबूर करेगा। 

चीन की हरकतों पर लगाम लगाने के लिए वैसे तो दुनिया भर के कई देश साथ आना चाहते हैं लेकिन वह चीन के आतंक से परेशान हैं इसलिए खुलकर सामने नहीं आ सकते। क्वॉड देशों की तैयारी इस बार इतनी बड़ी है कि मालाबार-2 में शामिल सभी देशों ने अपने अत्याधुनिक हथियारों को इसमें झोंक दिया है, जिसमें सतह पर मार करने वाले आधुनिक हथियार, एंटी-सबमरीन युद्ध अभ्यास और चारों मित्र देशों की नौ सेनाओं में समन्वय एक अहम पड़ाव है। भारत की तरफ से मालाबार-2 युद्ध अभ्यास में स्वनिर्मित विध्वंसक आई.एन.एस. कोलकाता, आई.एन.एस. चेन्नई, स्टेल्थ फ्रीगेट आईएनएस तलवार, फ्लीट सपोर्ट आई.एन.एस. दीपक और हैलीकॉप्टरों का दस्ता शामिल हुआ। इसमें स्वनिर्मित पनडुब्बी आई.एन.एस. खांडेरी और पी.आई. एयरक्राफ्ट भी शामिल हुए। 

अमरीका की तरफ से यू.एस.एस. निमित्ज के साथ क्रूज यू.एस.एस. प्रिंसटन और विध्वंसक यू.एस.एस. स्ट्रेट शामिल थे। इसके साथ अमरीकी नौसेना के पी-8ए एयरक्राफ्ट ने अभ्यास में हिस्सा लिया। वहीं ऑस्ट्रेलिया की तरफ से लंबी दूरी मारक क्षमता वाला फ्रीगेट बैलेरेंट, एम.एच.-60 हैलीकॉप्टर ने हिस्सा लिया। हालांकि इस बार जापान ने अपनी तरफ से हिस्सा लेने वाले फ्रीगेट के बारे में जानकारी नहीं दी है लेकिन मालाबार-1 अभ्यास के दौरान जापान की तरफ से विध्वंसक ओनामी और हैलीकॉप्टर एस.एच.-60 ने हिस्सा लिया था।

भारत की तरफ से नेवी चीफ एडमिरल करमबीर सिंह ने बताया कि इस बार मालाबार-2 में हमने बहुत तेज और आक्रामक स्तर का युद्धाभ्यास शुरु किया है और यह सब चीन की हिन्द महासागर में बढ़ती गतिविधि को देखते हुए किया है। इस अभ्यास का उद्देश्य चीन को यह दिखाना है कि अगर वह अपनी हद में न रहा तो उसके खिलाफ अब दुनिया में माहौल बन चुका है, अब ज्यादा समय नहीं लगेगा चीन के पर कतरने में। 

हालांकि चीन ने मालाबार-1 की कड़ी आलोचना की थी। लेकिन दक्षिण-पूर्वी एशिया और दक्षिण एशिया में चीन की हर एक हरकत पर पूरी नजर रखी जा रही है। हिन्द महासागर समुद्र में एक बहुत संवेदनशील और सैन्य गतिविधियों वाला क्षेत्र है और इस क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को कुछ देश अपने-अपने लाभ के लिए अलग तरीके से परिमाणित कर रहे हैं, हिन्द महासागर में इस बात का डर फैला हुआ है कि कुछ देश यहां पर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को अपने हित  के लिए अपने तरीके से तोड़-मरोड़ सकते हैं। यही कारण है कि उन देशों की गतिविधि पर लगाम लगाने और पूरे हिन्द क्षेत्र को व्यापार वाणिज्य के लिए खुला रखने की कवायद के लिए सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करना बहुत जरूरी है। 

क्वॉड सैन्य अभ्यास से पहले 6 अक्तूबर को जापान की राजधानी टोक्यो में क्वॉड विदेश मंत्रियों की एक बैठक हुई थी जिसके बाद 2+2 की बैठक भारत और अमरीका के बीच 26-27 अक्तूबर को हुई थी। टोक्यो बैठक को लेकर चीन इतना डर गया था कि उसने अपने सरकारी मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में संपादकीय इस नाम से छापा था जिसमें कहा गया था कि ‘टोक्यो में सभी एक साथ भौंके लेकिन काटा किसी ने नहीं’। इस वक्तव्य से साफ होता है कि चीन कितनी खीझ और कितनी हताशा का सामना इस समय कर रहा है। लेकिन क्वॉड के साथ भारत कृत संकल्प है कि चीन को भूमि के साथ-साथ समुद्र में भी रोकना बहुत जरूरी है, यह इसलिए भी जरूरी है जिससे क्षेत्र के देशों को चीन के कर्ज और डर से बचाया जाए, साथ ही पूरे क्षेत्र में व्यापार वाणिज्य का माहौल बनाया जाए जिसका लाभ क्षेत्र के सभी देशों को मिले।


Pardeep

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