महाराष्ट्र में अब ‘ट्रिपल-इंजन’ की सरकार!

punjabkesari.in Friday, Jan 23, 2026 - 04:58 AM (IST)

हम कैथोलिक एक इतालवी शब्द, ‘पैपाबिली’ का उपयोग उन कार्डिनलों की पहचान करने के लिए करते हैं, जिनमें भविष्य का पोप बनने के आवश्यक गुण होते हैं। राजनीति के शब्दकोष में इसके समान कोई शब्द नहीं, लेकिन यदि होता, तो निश्चित रूप से इसका इस्तेमाल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस की पहचान करने के लिए किया जाता, जिन्होंने अकेले दम पर अपने राज्य को भाजपा की झोली में डाल दिया। महाराष्ट्र पर अब कम से कम अगले 2 दशकों तक उनकी पार्टी का शासन रहेगा।

वर्तमान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वे दो नाम हैं, जिन्हें हम अक्सर 2034 में मोदी के पद छोडऩे के बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में सुनते हैं। उस सूची में अब हमारे राज्य के मुख्यमंत्री का नाम भी जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने बाल ठाकरे की शिवसेना और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) को विभाजित और कमजोर कर दिया है। शरद पवार, जिन्हें कभी ‘मराठा स्ट्रॉन्ग मैन’ के रूप में सराहा जाता था, अब अपने पुराने स्वरूप की मात्र एक छाया बनकर रह गए हैं। अपने राजनीतिक विरोधियों की महत्वाकांक्षाओं और कमजोरियों का फायदा उठाते हुए, फड़णवीस ने पहले शरद पवार के भतीजे अजीत को पाला बदलने के लिए उकसाया और फिर यही प्रयोग मुंबई के पड़ोसी जिले ठाणे के एक शिवसैनिक एकनाथ शिंदे के साथ दोहराया, जो पार्टी में जमीनी स्तर से उठकर प्रमुखता तक पहुंचे थे। शिंदे इस बात से आहत थे कि वंशवादी शासन की मजबूरियों के कारण सेना में उनकी प्रगति के दरवाजे बंद हो गए थे और वह स्थायी रूप से दूसरी श्रेणी में ही बने रहेंगे।

फडऩवीस ने बहुत चतुराई से उस कारक को पकड़ा और उन्हें प्रस्ताव दिया कि यदि शिंदे जैसा सिद्ध नेतृत्व कौशल वाला व्यक्ति हिंदुत्व ब्रिगेड के साथ हाथ मिलाता है, तो महिमा के शिखर उनके करीब होंगे। शिंदे को आनन-फानन में भारत के सबसे समृद्ध राज्यों में से एक का मुख्यमंत्री बना दिया गया, जिससे ‘मराठी मानुस’ के रैंकों में विभाजन पर मुहर लग गई। शिवसेना के दिवंगत संरक्षक बाल ठाकरे ने मुंबई शहर के मराठी भाषी निवासियों की भावनाओं के साथ यह समझकर खेला था कि ‘बाहरी’ (जो घर पर गुजराती बोलते हैं) उनकी विरासत छीन रहे हैं और तमिल व अन्य दक्षिण भारतीय वे सफेदपोश नौकरियां छीन रहे हैं, जो उन्हें बेहतर जीवन स्तर का आश्वासन दे सकती थीं। बाला साहेब, जैसा कि उन्हें कहा जाता था, एक उत्कृष्ट वक्ता थे, नरेंद्र मोदी से भी एक पायदान ऊपर, जिन्हें हम हर दिन टैलीविजन पर सुनते हैं। हमारे प्रधानमंत्री की तरह, बाल ठाकरे भी अपने दर्शकों को यह विश्वास दिला सकते थे कि काला वास्तव में सफेद है या सफेद काला। 

मुंबई में रहने वाले मराठी भाषी मुख्य रूप से कोंकण के नाम से जाने जाने वाले राज्य के तटीय गांवों और छोटे शहरों से थे। वे बड़ी संख्या में शिवसेना में शामिल हुए। जब उन्हें अपनी बात साबित करने के लिए ताकत का इस्तेमाल करने के लिए कहा गया, तो उन्होंने उत्साहपूर्वक ऐसा किया। पुलिस उन्हें रोकने के लिए उतनी उत्साही नहीं थी क्योंकि उस समय सत्ता में मौजूद कांग्रेस पार्टी, कम्युनिस्टों और अन्य वामपंथी दलों को बेअसर करने के लिए शिवसेना का इस्तेमाल कर रही थी, जो उसके शासन के मुख्य विरोधी थे। सरकार की इस कायरता ने सेना को प्रोत्साहित किया, जो जल्द ही शहर में एक बड़ी ताकत बन गई। अब फडऩवीस ने मुंबई नगर निगम (बी.एम.सी) पर अपनी नजरें जमा लीं, जिसका वाॢषक बजट संघ के कुछ छोटे राज्यों से भी अधिक है। शिवसेना ने 2 दशकों से अधिक समय तक नगर निगम पर अपना दबदबा बनाए रखा था। यह व्यापक रूप से अफवाह थी कि कॉर्पोरेटर नियमित रूप से अपने अधिकार क्षेत्र में हस्ताक्षरित अनुबंधों का 10 प्रतिशत हिस्सा लेते थे। शहर में यह आम समझ थी कि शिवसेना एक संगठित राजनीतिक दल के रूप में इसलिए जीवित रह सकी क्योंकि नगर निगम से होने वाली कमाई ही धन का एकमात्र स्रोत थी जब वे केंद्र या राज्य सरकारों का हिस्सा नहीं थे।

यह तय है कि एकनाथ शिंदे के गुट में शामिल होने वाले सेना के कई सक्रिय सदस्य और कॉर्पोरेटर इसलिए वहां गए क्योंकि वे अपनी ‘जीविका’ से वंचित हो गए थे। स्थानीय नगर निकाय चुनावों में 3 साल या उससे अधिक की देरी की गई, ताकि शिंदे उन शिवसेना कॉर्पोरेटरों को लुभा सकें, जो राज्य द्वारा निगम के मामलों के प्रबंधन के लिए अपने स्वयं के अधिकारियों को नियुक्त किए जाने के बाद खुद को शक्तिहीन पा रहे थे। आज भाजपा आॢथक रूप से आसानी से सबसे समृद्ध पार्टी है। विरोधियों द्वारा अंतिम समय में नाम वापस लेने के कारण निर्विरोध चुने गए भाजपा कॉर्पोरेटरों की संख्या जांच की मांग करती है। भाजपा विपक्ष-मुक्त सरकार के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उचित या अनुचित, सभी साधनों का इस्तेमाल करने के लिए जानी जाती है। उनके उम्मीदवारों की यह निर्विरोध जीत एक नई रणनीति है, जो केवल मौद्रिक प्रलोभनों के माध्यम से संभव है।

पुणे नगर निगम चुनाव अपने अलग हुए भतीजे के साथ मिलकर लडऩे के बावजूद उद्धव ठाकरे गुट और शरद पवार के गुट की हार को इन दोनों नेताओं के अंत के रूप में प्रचारित किया गया है। शरद पवार को उम्र संबंधी कमजोरियों के कारण अपनी पार्टी की कमान अपने भतीजे को सौंप देनी चाहिए थी। वे अब खुद को अलग-थलग पाएंगे। लेकिन जहां तक उद्धव का सवाल है, मैं अभी उन्हें खारिज करने के विचार से सहमत नहीं हूं। एकनाथ शिंदे ने मुंबई में उद्धव के क्षेत्र में सेंध लगाई है लेकिन उद्धव के गुट ने दिखाया है कि वह अभी भी सक्रिय है। मराठी भाषी इलाकों में इसने शिंदे के उम्मीदवारों को उन अधिकांश सीटों पर मात दी, जहां इसने चुनाव लड़ा था। नगर निगम में शिंदे गुट के पास 29 सीटें हैं जबकि उद्धव के गुट और उनके चचेरे भाई राज की मनसे के पास कुल मिलाकर 79 सीटें हैं। 89 सीटों वाली भाजपा को 114 के बहुमत के आंकड़े को पार करने के लिए शिंदे गुट के समर्थन की आवश्यकता है। एकनाथ शिंदे इसका उपयोग इस मांग के लिए कर रहे हैं कि उनके उम्मीदवार को कम से कम शुरुआती अढ़ाई साल के लिए मुंबई का मेयर बनाया जाए। देखना दिलचस्प होगा कि यह सवाल कैसे सुलझता है।

दो सहयोगी राजनीतिक दलों द्वारा अपनी संपत्ति को दूसरे द्वारा चोरी किए जाने से बचाने का दृश्य कम से कम हास्यास्पद तो है ही। एकनाथ शिंदे ने अपने 29 निर्वाचित कॉर्पोरेटरों को शहर के एक 5-सितारा होटल में स्थानांतरित कर दिया है। उन्हें स्पष्ट रूप से अपने मित्र देवेंद्र फडऩवीस पर संदेह है कि वे उन 29 में से कम से कम कुछ, यदि सभी नहीं, को सर्व-विजेता भाजपा में शामिल करने का प्रयास करेंगे। ‘एक पार्टी, एक निॢववाद नेता’ के अपने उद्देश्य की ओर भाजपा का निरंतर मार्च, जो एक हिंदू राष्ट्र स्थापित करने की मांग कर रहा है, उसे पश्चिम बंगाल, पंजाब और तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों में प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा। धर्म-आधारित शासन पड़ोसी पाकिस्तान में व्यवहार्य साबित नहीं हुआ है। आशा करें कि हम उन कदमों का अनुसरण न करें।-जूलियो रिबैरो(पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)


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