बोरवैल में दम तोड़ती जिंदगी

punjabkesari.in Sunday, Jul 12, 2026 - 04:01 AM (IST)

हादसों पर हादसे मानो हमारी नियति बन चुके हैं। धू-धू जलती इमारतें, ताश के पत्तों की तरह बिखरते जर्जर भवन, घटिया निर्माण सामग्री का संताप भोगते पुल, अनहोनी को न्यौता देते खुले बोरवैल-मैनहोल, कुल मिलाकर नियमोल्लंघन की धृष्टता में यहां क्या कुछ नहीं होता? इसी अवहेलनात्मक रवैये ने हरियाणा में एक मासूम को असमय ही हमसे छीन लिया। बीते दिनों अंबाला के गांव धन्यौड़ा में लापरवाहीवश खुले छोड़े गए 220 फुट गहरे बोरवैल में गिरना, 4 वर्षीय निरवैर सिंह उर्फ निर्भय की अकाल मृत्यु का कारण बना। 

स्मरण करें तो ऐसा ही एक हादसा वर्ष 2006 के दौरान कुरुक्षेत्र में भी घटा था। प्रिंस नामक बालक के बोरवैल में गिरने की खबर ने समूचे राष्ट्र को झकझोर कर रख दिया। तब युद्धस्तर पर चले सामूहिक अभियान में प्रिंस को सही-सलामत बाहर निकालने में कामयाबी मिलना हर किसी के लिए राहत का विषय था लेकिन इस बार हालात सर्वथा विपरीत रहे। सेना, नैशनल डिजास्टर रिस्पॉन्स फोर्स, पुलिस तथा दूसरी एजैंसियों द्वारा लगातार 21 घंटे अनथक प्रयास करने के बावजूद निरवैर को बचाना संभव नहीं हो पाया।  कानूनी कार्रवाई तथा दिशा-निर्देशों की बात करें तो सर्वोच्च न्यायालय दशकों पहले ही स्पष्ट निर्देश दे चुका है कि नए बोरवैल की खुदाई से पूर्व स्थानीय प्रशासन को सूचित करना अनिवार्य होगा। बोरवैल के चारों ओर सुरक्षा घेरा बनाया जाएगा। अनुपयोगी होने पर बोरवैल को मलबे-मिट्टी से पूरी तरह भरने के पश्चात, मजबूत लोहे का ढक्कन लगाकर स्थायी तौर पर बंद करना होगा। 

नियम-कानून बने तो अवश्य, लेकिन हकीकत में लागू कहां हो पाते हैं? हालिया हादसे में भी परिजनों के आरोपानुसार, खेत के मालिक ने बोरवैल से मोटर निकालने के बाद, गड्ढा भरने की बजाय खुला ही छोड़ दिया। कहीं न कहीं यहां स्थानीय प्रशासन की अनभिज्ञता/उदासीनता भी दृष्टिगोचर होती है। दो-टूक शब्दों में, मानवीय त्रुटि व प्रशासनिक उदासीनता ने एक परिवार का कुलदीपक छीन लिया। बचाव कार्यों व आपातकालीन सहायता के विषय में भले ही भारतवर्ष दस कदम आगे हो, किंतु नियम अनुपालन के मसले में अन्य कई राष्ट्रों के मुकाबले इसे कहीं पिछड़ा पाएंगे। न तो नागरिक अपने कत्तव्यों के प्रति सचेत हैं, न ही व्यवस्थात्मक स्तर पर कत्र्तव्यपरायणता का बोध होता है। राज्यों द्वारा निजी स्तर पर दिशा-निर्देश दिए जाने के बावजूद नियमों में कोताही आम देखी जा सकती है। यदि बोरवैल खुला छोडऩे वालों का व्यवहार गैर-जिम्मेदाराना है, तो तंत्र भी अमूमन दुर्घटना घटने के बाद ही हरकत में आता है। 20 वर्षों के लंबे अंतराल के बीच विभिन्न प्रांतों से ऐसी अनेक घटनाओं के समाचार आते रहना सबक न सीखने की आदत के जीवंत प्रमाण हैं। 

आज भी देश में अनुपयोगी कुंओं की भरमार है। जीर्ण-शीर्ण अवस्था में खुले पड़े ये कूप किसी अनहोनी को दावत दे रहे हैं। पंजाब की ही बात लें, अनवरत गिरता भूजल स्तर बड़ी संख्या में खोदे गए बोरवैल अनुपयोगी बना रहा है। लगभग 14 लाख बोरवैल तथा कुएं प्रयोग करने योग्य नहीं रहे। कृषि विभाग के मुताबिक, इनमें से करीब 10 लाख बोरवैल खुले छोड़ दिए गए हैं। इनके अतिरिक्त  खेत-खलिहानों तथा गांवों में बने 1.45 लाख से अधिक पुराने खुले कुएं भी सूख चुके हैं। अनिवार्य सुरक्षा उपायों की उपेक्षा में ये बच्चों तथा जानवरों के लिए हादसे का सबब बन सकते हैं। इन घटनाओं में सर्वाधिक दोषी हैं वे लोग, जो आवश्यकतानुसार बोरवैल खोदते तो हैं किंतु अप्रयुक्त  होने पर उसे भरना जरूरी नहीं समझते। मामलों में प्रशासनिक सतर्कता पर सवाल उठने के साथ संभावित खतरे के प्रति जन-जागरूकता के प्रसार की कमी भी कचोटती है। दुर्घटनाओं को अंजाम देते अंधकूप हों, सड़क पर पड़े गड्ढे अथवा ढक्कन रहित मैनहोल, समग्र रूप में हमारी व्यवस्थात्मक खामियां ही उजागर करते हैं। आजादी के वर्षों बाद भी इनसे निपटने में सक्षम न बन पाना सबसे बड़ी विडंबना है। 

कारण स्पष्ट है, लचीला कानून व ऊपर से नीचे तक फैला भ्रष्टतंत्र, जिनका अवलम्बन लेकर अक्सर दोषी साफ बच निकलते हैं। घटनाओं के दोहराव का सीधा-सा अर्थ है, हमने भूतकाल से कुछ नहीं सीखा। हादसा घटित होने के उपरांत शोर मचाने वाली भीड़ का हिस्सा बनने की अपेक्षा यदि हम व्यक्तिगत तौर पर अपने आस-पास के प्रति सावधानी बरतते हुए जन-जागृति फैलाने में सहायक बनें तो काफी हद तक संभावित हादसे रोके जा सकते हैं। जहां तक बात है सरकारी तथा प्रशासनिक दायित्व की, तो मात्र मुआवजे की घोषणा करने एवं भविष्य में दुर्घटनाएं न होने का आश्वासन देने भर से बात नहीं बनती, जब तक कि वास्तव में घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना संभव न बनाया जा सके। स्थिति में सुधार लाने के दृष्टिगत प्रशासन से यही उम्मीद की जाती है कि अपेक्षित सक्रियता दिखाते हुए ऐसे प्रत्येक अनुपयोगी बोरवैल का पूरा रिकॉर्ड रखें, साथ ही साथ नियमों का अक्षरश: परिपालन भी सुनिश्चित करें। इस बारे ग्राम पंचायतों, स्थानीय निकायों तथा स्वंयसेवी संगठनों की जवाबदेही भी तय की जाए। घटना में दोषी रहे सभी लोगों को कठोरतापूर्वक दंडित करना अत्यावश्यक है। इससे नियम तोडऩे वाले अन्य लोगों को भी सीखमिल सकेगी और वे कानून को अनदेखा करने से बचेंगे।-दीपिका अरोड़ा 


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