सपने दिखाना और उन्हें पूरा करने के साधन उपलब्ध न कराना अपराध

punjabkesari.in Saturday, Feb 07, 2026 - 04:10 AM (IST)

देश में हर वर्ष बजट में कुछ न कुछ ऐसा होता है, जो लोकलुभावन, मनभावन होता है और कभी तो यह कि आसमान से तारे तोड़कर ले आने जैसी घोषणाएं कर दी जाती हैं। यह भी कहा जाता है कि बस आप हम पर भरोसा रखिए और जब भी हमें जरूरत हो, अपना आशीर्वाद अर्थात वोट देते रहिए, आपकी मनोकामनाएं पूरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।

सपनों के साथ छल : इसमें संदेह नहीं कि वर्तमान सरकार के पहले दशक और उसके बाद से अब तक काफी कुछ ऐसा हुआ है जो कामनाओं को साकार करने जैसा रहा लेकिन फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो होना चाहिए था, शुरू हुआ लेकिन आधा-अधूरा रहा या बंद हो गया। अनेक परियोजनाओं की घोषणाएं फाइलों में सिमटकर रह गईं। कुछ उदाहरण हैं :

जून, 2015 में कहा गया कि देश के 100 शहरों को टैक्नोलॉजी आधारित, सतत् विकास की प्रक्रिया से जोड़ा जाएगा अर्थात यहां रहने वाले अपने जीवन में वह बदलाव देख सकेंगे जो वे अक्सर विदेश यात्रा के समय विकसित देशों में देखते हैं या फिर सिनेमा और प्रचार साधनों के माध्यम से अनुमान लगा लेते हैं। इन स्मार्ट शहरों में गड्ढों से मुक्त शानदार सड़कें, जलभराव से निपटने के साधन, कूड़ा-कचरा निस्तारण के उपाय मतलब वेस्ट मैनेजमैंट, जितनी जरूरत हो उतनी ऊर्जा या बिजली मिलने की व्यवस्था और सभी आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर, उद्यमियों के लिए वन विंडो सिस्टम और सामान्य नागरिक को डिजिटल, ई-गवर्नैंस का तोहफा। इसके लिए भारी-भरकम राशि 48,000 करोड़ रुपए रखी गई। अब आंकड़े बताते हैं कि लगभग 18 शहरों में अब तक काम पूरा हुआ और बाकी में कहीं-कहीं थोड़ा-बहुत काम होता दिखा तथा बाद में वह भी ठप्प हो गया। कहीं जमीन न मिलने का बहाना बना तो अनेक स्थानों पर रखरखाव की व्यवस्था का अभाव होने से जो निर्माण कार्य हुए थे, वे मलबे का रूप धारण करने लगे।  

हम अक्सर चीन, जापान और अन्य शहरों में तेज गति से चलने वाली बुलेट ट्रेन के बारे में सुनते और अगर वहां जाने का मौका मिला तो देखते भी हैं तथा आश्चर्यचकित होते हैं कि बिना गाड़ी के अंदर या आसपास कोई कंपन हुए 3-4 सौ की स्पीड से दौडऩा कितना रोमांचक है। कमाल की इंजीनियरिंग और टैक्नोलॉजी तथा साथ में चढऩे-उतरने और प्लेटफार्म पर यात्रियों के लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध देखकर लगता है कि काश भारत में यह हो पाता। कोई बात नहीं, हमारी सरकार ने भी घोषणा कर दी कि 2014-2017 के कालखंड में मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन की सवारी करने का आनंद मिल जाएगा। अब कहते हैं कि शायद 2029 तक यह उम्मीद पूरी हो, पर अब इस पर तसल्ली करनी पड़ रही है कि वंदे भारत ट्रेन चल रही है। यह सांत्वना हो सकती है लेकिन विश्व में हो रही इस क्षेत्र की प्रगति के सामने कहीं नहीं ठहरती।

हाईवेज यानी राजमार्गों का विस्तार देश में व्यापार करने की सुविधा का महत्वपूर्ण अंग है। इसी तरह बंदरगाहों पर आधुनिक सुविधाओं का होना जरूरी है। राष्ट्रीय हो या अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, निर्यात हो या आयात, जब तक एक स्थान से दूसरे स्थान तक निर्मित वस्तुओं को लाने-ले जाने की रुकावटहीन व्यवस्था नहीं होगी, तब तक हम व्यापार में पिछड़े ही रहेंगे। यह अच्छा संकेत है कि इन साधनों के निर्माण की गति बढ़ी है लेकिन इन्हें पूरा किए जाने के टारगेट से अभी हम बहुत पीछे हैं। जो प्रोजैक्ट पिछले वर्ष पूरे होने थे, वे 4-5 साल आगे सरका दिए गए हैं। देश में रेल नैटवर्क बिछाना केंद्र सरकार के जिम्मे आता है, विशेषकर मालगाडिय़ों का संचालन जिसके लिए डैडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बनाने की जरूरत है। इस दिशा में अब तक हुई प्रगति निराशाजनक है।

इसका कारण है कि पुरानी लाइनों पर अभी भी यात्री और सामान ले जाने वाली रेलों का एक-साथ चलाया जाना। पैसेंजर ट्रेनों को निकालने के लिए गुड्स ट्रेनों को रोक दिया जाता है, जिससे जो आवश्यक औद्योगिक सामग्री है अपने नियत स्थान पर बहुत देर से पहुंचती है और उसकी लागत बढ़ जाती है। हालांकि, गति शक्ति योजना का लक्ष्य देश की प्रगति के लिए जरूरी रेल, सड़क, पोर्ट, जलमार्ग, वायुमार्ग, सार्वजनिक परिवहन और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास करना है लेकिन इनके पूरा होने में जो बार-बार समय बढ़ा दिया जाता है, वह चिंताजनक ही नहीं, एक तरह से खतरनाक भी है क्योंकि हमारे प्रतिद्वंद्वी हमसे पहले निॢदष्ट स्थान पर पहुंच जाएंगे। 

रुकावट पैदा करने की सजा नहीं : आखिर हम समय पर काम क्यों नहीं शुरू और पूरा कर पाते। इसका सबसे बड़ा कारण है प्रशासनिक स्तर पर अधिकारियों का निष्पक्ष और पारदर्शी न होना। दूसरा, सरकार चाहे कितने भी दावे कर ले लेकिन खौफनाक सच यह है कि रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार सभी मंत्रालयों और उनके अधीन कार्यालयों में इस हद तक व्याप्त है कि बिना उसके कोई भी फाइल मंजूर नहीं होती। जब कोई दुर्घटना या हादसा वर्षों पहले की गई प्रशासनिक लापरवाही के कारण हो जाता है, तब उस व्यक्ति की तलाश की जाती है जिसके गले में फांसी का फंदा फिट किया जा सके।

देरी को अपराध घोषित किया जाए : प्रश्न यह है कि क्या किसी परियोजना के समय पर पूरा न किए जाने को अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और इसके लिए जो जिम्मेदार अधिकारी हैं उन्हें कड़ी सजा का प्रावधान किया जाना चाहिए? इस दिशा में सरकार को कोई ठोस कदम उठाना ही होगा।-पूरन चंद सरीन


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