क्या राज्यपाल केंद्र की कठपुतली हैं!

6/9/2021 4:51:31 AM

जिस किसी ने भी यह कहा कि ‘अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा वालों के लिए अलग-अलग राजनीतिक उपा’, उसने सही कहा है, विशेषकर तब जब राज्यपाल के उच्च संवैधानिक पद की बात आती हे। केन्द्र द्वारा नियुक्त निष्ठावान राज्यपाल भारत की राजगद्दी पर बैठे अपने माई-बाप की इच्छानुसार कार्य करते हैं और शासन एक बड़ी नौटंकी बन जाता है। जिसके चलते समय परीक्षित बुनियादी नियमों को नए सिरे से लिखा जाता है और लोकतंत्र की मर्यादाआें को पलटा जाता है, उन्हें तोड़ा जाता है किंतु किसे परवाह। 

जुलाई 2019 से पश्चिम बंगाल अैर नई दिल्ली में राज्यपाल जगदीप धनखड़  और ममता बनर्जी के बीच चल रहे मतभेदों ने राज्यपाल की भूमिका पर पुन: प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं। राज्यपाल पर नए आरोप लगाते हुए ममता सरकार ने कहा है कि उन्होंने अपने संबंधियों को अपने व्यक्तिगत स्टाफ में आफिसर ऑन स्पैशल ड्यूटी नियुक्त किया है। 

इस आरोप का धनखड़ ने खंडन किया है और कहा है कि वास्तव में यह ममता सरकार द्वारा राज्य में चुनावों के बाद हुई हिंसा के मद्देनजर कानून और व्यवस्था की गंभीर स्थिति से ध्यान हटाने के लिए किया गया है। उन्होंने कहा, ‘‘मंै जानना चाहता हूं कि राज्य प्रशासन क्या कर रहा है? हिंसा बढ़ रही है, राज्य में हिंसा चारों तरफ व्याप्त है और लोक सेवा पर अहंकार भारी पड़ रहा है।’’ 

प्रत्युत्तर में तृणमूल कांग्रेस ने राष्ट्रपति से कहा है कि धनखड़़ को गिरफ्तार किया जाए क्योंकि राज्यपाल राजभवन में रहकर संतुष्ट नहीं हैं और वे राजनीति में अधिक रुचि ले रहे हैं। मोदी जी को उन्हें चुनाव में उतारना चाहिए और मंत्री बनाना चाहिए। एक और हमला करते हुए ममता ने धनखड़ को लिखा, ‘‘मैं आपको विशेष सलाह देती हूं कि आप मु यमंत्री और मंत्रियों की उपेक्षा न करें और संविधान के अंतर्गत अपनी शक्तियों का अतिक्रमण करते हुए अधिकारियों के साथ संवाद या उन्हें निर्देश न दें और उन्हें अपने समक्ष पेश होने के लिए न कहें। आप इस सलाह की उपेक्षा कर रहे हैं।’’ 

धनखड़ ने इसका प्रत्युत्तर यह कहकर दिया, ‘‘मैं यह जानकर व्यथित हूं कि मु यमंत्री इस बात पर भी विचार कर रही हैं कि राज्यपाल को उनकी सरकार सेे आदेश लेने चाहिएं।’’ निश्चित रूप से दो संवैधानिक पदाधिकारियोंं के बीच यह तू-तू, मैं-मैं पहली या अंतिम बार नहीं है। इस संबंध में मोदी की राजग सरकार भी विश्वनाथ प्रताप सिंह की 1989 की राष्ट्रीय मोर्चा सरकार, 1999 की वाजपेयी सकार या 2004 से 2014 के बीच यू.पी.ए. सरकार से अलग नहीं है क्योंकि इन सभी ने अपने राजनीतिक एजैंडा को आगे बढ़ाने के लिए राज्यपाल के पद का उपयोग और दुरुपयोग किया है और राज्यपाल को अपनी बातें मनवाने के लिए कहा है, जो यदि केन्द्र ने चाहा तो राज्य सरकारों को अस्थिर करने के लिए तत्पर रहते हैं। व्यक्ति या पार्टी के हित में कोई भी इस बात की आलोचना नहीं करता और संविधान की भावना की उपेक्षा करता है। 

इस नए घटनाक्रम ने राज्यपाल की भूमिका, योग्यता, उनके संवैधानिक दायित्व और कत्र्तव्यों के बारे में एक बार फिर से प्रश्न उठा दिए हैं। इससे एक विचारणीय प्रश्र उठता है कि क्या राज्यपाल केन्द्र की कठपुतली हैं या राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में जनता के विश्वास के संरक्षक हैं? क्या राज्यपाल के कार्यों में एकरूपता और सामंजस्य के लिए कोई नियम हैं? क्या उनके लिए कोई दिशा-निर्देश या मार्ग निर्देश हैं? 

फाइलों को मंगाना, मंत्रियों और नौकरशाहों को बुलाना, दिल्ली में अपने राजनीतिक आकाओं के अनुसार राज्य सरकार के विरुद्ध विरोध की आवाज दर्ज करना या उसको उकसाना जिनके चलते मु यमंत्री के लिए प्रत्येक कदम पर शासन चलाना मुश्किल हो जाता है और वे लोग राज्यपाल पद का उपयोग सक्रिय राजनीति में उतरने के लिए भी करते हैं। इस सबके चलते संविधान निर्माताआें द्वारा प्रस्तावित उस से टीवाल को निष्क्रिय कर दिया गया है कि किस व्यक्ति को राज्यपाल निुयक्त किया जाना चाहिए, उनकी नियुक्ति का तरीका क्या होगा और उसकी भूमिका क्या होगी। 

संविधान में उन्हें निर्वाचित सरकार के निर्णयों को प्रभावित करने की शक्ति दी गई है जिसके लिए उन्हें उनसे परामर्श करने, चेतावनी देने और प्रोत्साहन देने का अधिकार दिया गया है। उनकी भूमिका एक मित्र, मार्गदर्शक और दार्शनिक की है और वे अपने असीमित विवेकाधिकार से अपनी मंत्री परिषद का मार्ग निर्देशन करते हैं। इस मामले में उन्हें राष्ट्रपति से अधिक शक्तियां प्राप्त हैं। 

सरकारिया कमीशन ने इस बात को स्वीकार किया और उच्चतम न्यायालय ने भी इसका समर्थन किया कि राज्यपाल की भूमिका एक संवैधानिक प्रहरी की है और वह केन्द्र और राज्य के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क सूत्र है। एक स्वतंत्र संवैधानिक पदधारी होने के नाते राज्यपाल केन्द्र सरकार का अधीनस्थ या आज्ञापालक नहीं है। 

सरकारिया आयोग ने दो महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं। पहली, राज्यपाल की नियुक्ति राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श कर की जाए और दूसरी आपवादिक में परिस्थितियों के अलावा उसके पांच साल के कार्यकाल में बाधा न डाली जाए किंतु इन सिफारिशों को लागू नहीं किया गया। 

उच्च पदों पर निष्पक्ष, ईमानदार और  संवैधानिक मूल्यों तथा परंपराआें का पालन करने वाले व्यक्तियों को नियुक्त करना चाहिए। हमारे नेताओं को दलीय राजनीति से ऊपर उठकर इस उच्च संवैधानिक पद के बारे में स्वस्थ परंपराआें को स्थापित करना चाहिए तभी हमारा लोकतंत्र पुन: पटरी पर लाया जा सकता है।-पूनम आई.कोशिश

 
 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Recommended News

static