क्या भाजपा का हिन्दुत्व कार्ड समाप्ति की ओर है

2021-05-05T03:01:40.113

अंत में यह सब अच्छा लग रहा था। दो महीने ल बा आठ चरण वाला भीषण चुनाव तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल का फिर से मु यमंत्री के तौर पर बिठा रहा है। 66 वर्षीय बंगाल की बाघिन ममता ने तीसरी बार राजनीतिक खेल के नियमों को फिर से लिखा और प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एक कठिन जीत हासिल की। 

ममता ने ‘खेला होबे’ के अपने स्पष्ट आह्वान के साथ उल्लेखनीय राजनीतिक लचीलापन दिखाया। एक व्हीलचेयर पर सवार होकर उन्होंने अकेले ही भाजपा को रोक दिया, जिसे वह बाहरी व्यक्ति करार दे रही थीं। भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल एक कठिन राह थी जहां पर 27 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता थे। जय श्रीराम की अत्यधिक असावधानी का असर भी उस राज्य में पड़ा।  जहां पर दुर्गा और काली को पूजा जाता है। 

2016 में 3 सीटें लेने वाली भाजपा को इस बार 77 सीटें मिलीं जो प्रमुख विपक्षी पार्टी के रूप में उभर कर आई है। हालांकि भाजपा का लक्ष्य 200 सीटें जीतने का था। इसलिए 77 विधायक कोई उपलब्धि नहीं हैं। भाजपा ने असम और पुड्डुचेरी को जीता और केरल में अपनी इकलौती सीट खो दी। तमिलनाडु में इसने अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन किया। तमिलनाडु में द्रमुक के एम.के. स्टालिन के साथ कांग्रेस रथ पर सवार दिखाई दी। 

राहुल गांधी फिर से असफल हो गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन के एक नेता के रूप में वह मोदी के खिलाफ नेतृत्व नहीं कर सकते। हालांकि इन चुनावों में सबसे बड़ी बात यह है कि ममता स्पष्ट रूप से भाजपा के खिलाफ विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए खुद को तैयार कर रही हैं। 

चुनावी युद्ध को मोदी-शाह बनाम ममता के रूप में प्रकट कर संघ ने ममता को बड़े से बड़े व्यक्ति के रूप में पेश किया जो 2024 में मोदी के मु य प्रतिद्वंद्वी होने की संभावना रखती हैं। वह न केवल एक प्रमुख रणनीतिकार के रूप में उभरी हैं बल्कि उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल का भी स मान किया है। राकांपा के शरद पवार ममता के लिए एक नर्म रवैया रखते हैं। उन्होंने सपा के मुलायम, आप के केजरीवाल, शिवसेना के उद्धव ठाकरे और जदयू के नीतीश कुमार के साथ एक समीकरण बनाया है। 

ममता ने सोनिया के हौसले का फायदा उठाया है और वह निरंतर ही भूतपूर्व कांग्रेसियों के स पर्क में रहती हैं। स्पष्ट रूप से पश्चिम बंगाल के चुनाव भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव डालेंगे। हालांकि यह शुरूआती दिन हैं लेकिन ममता के पार्टी नेताओं और प्रतिद्वंद्वियों ने उन्हें ‘शी-मोदी’ का उपनाम दिया है। ममता भी अपने प्रतिद्वंद्वी मोदी की तरह सिंगल हैं और उनकी तरह ही कौशल रखती हैं। ममता में जोखिम के लिए भूख है और उनके खिलाफ कोई लांछन या नकारात्मक विशेषता नहीं है।

कांग्रेस के राहुल गांधी को गैर-गंभीर राजनीतिक खिलाड़ी के रूप में खारिज कर दिया गया है। ममता बनर्जी ने मोदी के रथ को रोकने की कोशिश की है और एक डार्क होर्स के रूप में उबरने की कोशिश कर रही हैं जो आर.एस.एस.-भाजपा को चुनौती दे सकती हैं। राकांपा के शरद पवार भी अपना समय तय कर रहे हैं और भाजपा के खिलाफ विपक्षी एकता को जुटा रहे हैं। निश्चित रूप से पूर्वी तट के राज्यों में गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेसी दलों की एक अखंड रेखा मौजूदा है। जिन्होंने बार-बार चुनाव जीत कर सत्ता हासिल की है।

फिर चाहे यह आंध्र प्रदेश में वाई.एस.आर.सी. जगन रैड्डी हों, तेलंगाना में टी.आर.एस. के चंद्रशेखर राव हों, ओडीसा में बीजद के नवीन पटनायक या फिर तमिलनाडु में द्रमुक के एम.के. स्टालिन हों। इस पृष्ठ भूमि में क्या भाजपा की अजेयता मर रही है? आखिर कब तक भाजपा मोदी के ऊपर निर्भर रह सकती है जोकि अकेले ही वोट जुटाने की क्षमता रखते हैं। क्या ङ्क्षहदुत्व कार्ड अपनी समाप्ति की तारीख से पहले नजर आ रहा है। कोविड सुनामी के कुप्रबंधन  ने भाजपा को प्रभावित किया है। 

इसके अलावा मोदी सरकार अपने वायदों पर खरी नहीं उतरी। अर्थव्यवस्था भी आशा के अनुरूप कार्य नहीं कर रही। ग्रामीण क्षेत्र असंतुष्ट दिखाई देता है। रोजगार सृजन के मामले को लेकर सरकार की अयोग्यता पर युवा वर्ग क्रोधित है। सा प्रदायिक ध्रुवीकरण ने चुनावी फायदा नहीं पहुंचाया। जीत से उत्साहित हो क्षेत्रीय दल सरकार के खिलाफ अपनी स्थिति को और मजबूत कर सकते हैं। नीतियां बनाने की सरकार की स्थिति को और कमजोर कर सकते हैं। मिसाल के तौर पर किसान आंदोलन। फिर भी विपक्षी एकता कोई आसान काम नहीं है।

जहां पर विभिन्न पार्टियों का अलग लक्ष्य और अलग-अलग एजैंडा है, उन सबको एक साथ लाना होगा। निश्चित तौर पर भाजपा के लिए अब नए विकल्प खुले होंगे। भाजपा ने संकेत दिए हंै कि वह क्षेत्रीय दलों को कम नहीं आंकेगी और अगले वर्ष यू.पी., उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, हिमाचल तथा गुजरात के विधानसभा चुनावों के लिए एक रणनीति बनाई जाएगी। 

पार्टी सुदृढ़ स्थिति में है। मोदी का कोई सानी नहीं और शाह ने भाजपा को एक चुनावी मशीन में बदल दिया है जो अच्छे नतीजों की फसल को काट सकती है। केंद्र में सत्ता में होने के साथ सरकार के पास अपने दुश्मनों पर जीत प्राप्त करने और लोगों को प्रभावित करने के लिए एक बड़ी क्षमता है। 

तो आगे क्या होगा? : यह कहना जल्दबाजी होगी कि क्या क्षेत्रीय नेता एक साथ आ सकते हैं? मोदी का रथ तभी रुक सकता है यदि विपक्षी दल एक साथ खड़े हो जाएं और बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में एक गठबंधन को बुन सकें। विपक्षी एकता को यदि बचना है और नेतृत्व करना है तो इसका नेतृत्व दूसरे या प्रमुख पार्टी नेता के द्वारा किया जाना चाहिए। शीर्ष विपक्षी नेता के लिए अब शरद पवार और ममता बनर्जी के बीच खींचातानी हो सकती है। क्षेत्रीय पार्टियां यह जानती हैं कि यदि वे अपने मतभेद भुलाएं तो ही वह भाजपा के खिलाफ खड़ी हो सकती हैं।-पूनम आई .कोशिश


Content Writer

Pardeep

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