‘चकौती में भारत ने काफी जल्दबाजी में कोशिशें कीं’

2020-11-24T04:27:27.073

‘‘फिर भी इसका मतलब यह था कि दोनों बटालियन एक-दूसरे की मदद करने की हालत में नहीं होंगी। इसका यह मतलब भी होगा कि चकौती के पीछे स्थित 5 मीलों पर सम्मिलित सड़क नदी की दूरी की ओर से दुश्मनों द्वारा निगरानी और गोलाबारी की मार में रहेगी। इसको कबूल करना पड़ा इसलिए 24 मई की रात जब नई बटालियन पहुंच गई तो यह फौरन विबडोरी में पड़ाव डालने के लिए चली गई और इसके बाद परेशान करने वाले दस्ते दोनों दिशाओं में चले गए।’’ 

‘‘अगले कुछ दिनों के दौरान, दुश्मन ने अपनी पेशकदमी जारी रखी, उनके हमलों को तोपखानों के द्वारा अच्छी तरह सहायता दी गई। उनके हवाई जहाजों ने दिन के उजाले में स्पष्ट रूप से हम पर अपना दबाव बढ़ाया, हमारी अगली चौकियां जो कमजोरी के साथ हमारे कब्जे में थीं, उन्हें तोपखानों की मदद हासिल नहीं थी। उन्हें एक के बाद दूसरी को पराजित किया गया था और फिर हमें स्थायी रूप से चकौती और विबडोरी की ओर पीछे धकेल दिया गया।’’ 

‘‘फिर भी इस समय के अन्दर पहलुओं में परेशान करने की ताकतवर कार्रवाई जारी थी। अब जबकि आजाद और कबायलियों के छोटे दस्ते मोर्चे पर वापस लौट रहे थे और परेशान करने वाले दस्तों को शक्ति देने के लिए उन्हें भेजा जा रहा था, दुश्मन को बाहर भगाने का मंसूबा कामयाब हो रहा था। वह ज्यादा से ज्यादा गिनती में पहलुओं में बिखरने शुरू हो गए थे इसलिए वह बेकार पहाड़ों पर कब्जा जमाने में ज्यादातर ताकत लगा रहे थे। इसलिए इनकी पेशकदमी में उचित हद तक सुस्ती लाई गई। यह सारा काम एक हफ्ते में मुकम्मल किया गया। मई के अंत तक हमें अपने बचाव के मोर्चों में वापस धकेला गया था और दुश्मन चकौती व विबडोरी के सामने हमला करने की पोजीशन में खड़ा था।’’ 

‘‘चकौती में भारत ने काफी जल्दबाजी से कोशिशें कीं, इन्हें वास्तविक रूप से हमला नहीं कहा जा सकता लेकिन यह ज्यादातर हमले से पहले वाली प्राथमिक कार्रवाइयों की तरह लग रहा था। मैंने सोचा कि उन्होंने  ज्यादा गहरी फौजी जासूसी को अंजाम देने और हमले के लिए अधिक ताकत जमा करने हेतु इसे रोक दिया है। परन्तु सच्चाई में दुश्मन हमारे परेशान करने वाले दस्तों का पीछा करते हुए अपने बाएं पहलू की ओर बिखरना शुरू हो गया था, इस प्रकार और कुछ दिनों तक हमला नहीं हुआ। इसी बीच दरिया के दूसरे किनारे पर भी, भारतीयों ने विबडोरी पर जोर-आजमाइश करने  के लिए नहीं सोचा था और इसकी बजाय उन्होंने पहलुओं में जाने और गतिविधि को घेरे में लेते हुए इसे खाली कराने के बारे में सोचा।’’ 

निश्चित रूप से तो यह नहीं कहा जा सकता कि उनका मकसद क्या था। यह इलाका बहुत बड़ा था, पहाड़ बहुत ही ऊंचे थे और वहां पर बहुत-सी गुजरगाहें थीं, इसलिए सारे खतरे वाले स्थानों की निगरानी करना संभव नहीं था। भारतीयों के लिए इस कार्रवाई हेतु कुछ सख्त पहाड़ों पर चढऩे की महारत दरकार थी और हमारे लिए उनकी गतिविधि की भविष्यवाणी करने और पेशकदमी करने के लिए काफी सोचना होता है।

इस काम के लिए आजाद के कुछ फौजी बाकी रह गए थे और संभावित खतरे वाले स्थानों पर दुश्मन को आगे बढऩे से रोकने के लिए, हमें आम तौर पर इस काम की शुरूआत दुश्मन की गतिविधि के शुरू होने से कई घंटे पहले करनी पड़ी थी। फिर भी कई दिनों तक की गतिविधि और जवाबी कार्रवाई के बाद अंत में किस्मत ने हमारा साथ दिया और हर बार हमें सही स्थान मिले, दोनों किनारों पर ठहराव आ गया था।’’-पेशकश: ओम प्रकाश खेमकरणी
 


Pardeep

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