भारत की सफलता दुनिया के लिए भी मायने रखती है

punjabkesari.in Wednesday, Sep 28, 2022 - 05:04 AM (IST)

हम जिस वैश्वीकृत युग में रहते हैं, उसके बारे में अक्सर कहा जाता है कि दुनिया के किसी भी हिस्से में एक घटना भौगोलिक दूरी की परवाह किए बिना कई क्षेत्रों को संभावित रूप से प्रभावित कर सकती है। यह अति व्यापी और परस्पर जुड़ी हुई वैश्विक मूल्य शृंखलाओं का युग है, जहां जरूरी नहीं कि सफलता या असफलता राष्ट्रीय सीमाओं तक ही सीमित हो।

ऐसे वैश्विक परिदृश्य में, भारत जैसे देश की सफलता केवल उसकी अपनी विकास महत्वाकांक्षाओं के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है। भारत ने अपने निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त कर लिया है और यह वैश्विक प्रवृत्तियों को आकार देने की शक्ति के साथ एक निर्णायक शक्ति होगी। दुनिया की एक-छठी आबादी का घर, भारत के विशाल मानव संसाधनों का अक्सर नीतिगत चर्चाओं में उल्लेख किया जाता है।

इस संसाधन की क्षमता का उपयोग करने में, भारत और दुनिया दोनों को बड़े पैमाने पर लाभ उठाना है। भारत में 2020 और 2050 के बीच 15-64 वर्ष के कामकाजी आयु वर्ग में और 183 मिलियन लोगों के जुडऩे की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त, भारत की कामकाजी उम्र की आबादी 2027 तक वैश्विक श्रम शक्ति के 18.6 प्रतिशत तक बढऩे की उम्मीद है। यह श्रम बल विभिन्न उद्योगों के लिए संभावित मांग को पूरा करेगा। विश्व आॢथक मंच के अनुसार, 2030 तक भारत का नेतृत्व मध्यम वर्ग के हाथों में होने का अनुमान है। 2030 में, लगभग 80 प्रतिशत परिवार मध्यम आय वाले होंगे, जो आज लगभग 50 प्रतिशत से अधिक हैं। मध्यम वर्ग के द्वारा 2030 में उपभोक्ता खर्च का 75 प्रतिशत चलाने की उम्मीद है।

यह खंड तेजी से मांग उत्पन्न कर सकता है, भारत के उपभोग व्यय को बढ़ा सकता है और एक लाभदायक बाजार के रूप में सेवा प्रदान कर सकता है। दुनिया भर के उद्योगों के पास इस बाजार की बेहतर सेवा करने और देश के युवा और सक्षम लोगों का दोहन करने का अवसर होगा। हाल के वर्षों में, भारत विश्व अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान पर आ गया है। हाल ही में भारत ब्रिटेन को पछाड़ कर दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।

डॉलर विनिमय दर का उपयोग करके की गई गणना के आधार पर, प्रासंगिक तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार मौजूदा संदर्भ में $854.7 बिलियन था, जो कि यू.के. के $816 बिलियन के तिमाही आंकड़े से बड़ा था। विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार 2021 में भारत सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) द्वारा क्रय शक्ति समता (पी.पी.पी.) के संदर्भ में व्यक्त वर्तमान अमरीकी डॉलर में तीसरा सबसे बड़ा देश था। गरीबी, संसाधनों के असमान वितरण, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी अपर्याप्तताओं के रूप में बड़ी चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुमानों के अनुसार, भारत वैश्विक विकास का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा है।

इसके अतिरिक्त, एक बार जब भारत विभिन्न वर्गों, समुदायों और क्षेत्रों में देश के भीतर समृद्धि का अधिक समान प्रसार प्राप्त कर लेता है, तो यह वैश्विक विकास की संभावनाओं के बारे में सोचने का आग्रह करता है। भारत जिन बाधाओं का सामना कर रहा है, उन पर काबू पाने से वह अपनी वास्तविक क्षमता को पूरा कर पाएगा और राष्ट्र को वैश्विक विकास में अधिक से अधिक क्षमता में योगदान करने में मदद मिलेगी। भारत ने 2021-22 में 83.57 बिलियन डॉलर के अपने उच्चतम वाॢषक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ.डी.आई.) तक पहुंच कर इस तथ्य को स्थापित किया कि यह तेजी से एक पसंदीदा निवेश गंतव्य के रूप में उभर रहा है।

पिछले 20 वर्षों में एफ.डी.आई. प्रवाह में 20 गुना वृद्धि हुई है। भारत को और भी आकर्षक और स्थिर निवेश क्षेत्र बनाने की दिशा में संयुक्त प्रयास चल रहे हैं। एफ.डी.आई. प्रवाह के कई फायदे हैं। वे घरेलू उत्पादन को मजबूत करते हैं, विदेशों से प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण की सुविधा प्रदान करते हैं और बदले में भारत को विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त करने में सक्षम बनाते हैं। कोविड संकट के दौरान अन्य देशों को टीकों की आपूॢत में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका से दुनिया में देश के महत्व को और भी बल मिला है।

भारत ने 98 देशों को कोविड-19 वैक्सीन की 235 मिलियन से अधिक खुराक की आपूॢत की। देश के वैज्ञानिक अनुसंधान और विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार से भारत की घरेलू वैज्ञानिक अनुसंधान प्रणाली के लाभों का विस्तार करने की क्षमता में और वृद्धि होगी। राष्ट्रीय हित से परे जाना दुनिया के साथ एकजुटता के लोकाचार को प्रदॢशत करता है। बहुध्रुवीय विश्व के उभरते हुए भू-राजनीतिक परिदृश्य में, विशेष रूप से एशिया में एक प्रभावशाली खिलाड़ी के रूप में, राष्ट्र एक महत्वपूर्ण धुरी के रूप में उभरा है, विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन पर चर्चा में।

एक राष्ट्र का आर्थिक दबदबा कई गैर-आर्थिक कारकों पर भी निर्भर करता है। भारत की सफलता को भी केवल उसके आर्थिक कौशल के संदर्भ में नहीं देखा जाना चाहिए। भारत की सफलता की परिभाषा सामाजिक रूप से प्रगति करने, टिकाऊ उत्पादन करने और संसाधनों को वितरित करने और अधिक समान रूप से बनाए गए मूल्य की क्षमता की कारक होनी चाहिए।-अमित कपूर/विवेक देबरॉय


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