भारत की पुलिस व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता

punjabkesari.in Sunday, Jan 16, 2022 - 07:21 AM (IST)

किसी भी देश एवं वहां की कानून-व्यवस्था की नींव, उस देश की पुलिस होती है। देश की आम जनता आखिर पुलिस से क्या अपेक्षाएं रखती है? देश के नागरिक मित्रवत् पुलिस चाहते हैं, जो अमीरों-गरीबों के साथ समान व्यवहार करे। ऐसे पुलिस थाने हों, जहां बिना रिश्वत के काम हो सके। हमारे देश में महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों को नियंत्रण में रखा जा सके। इन अपेक्षाओं की पूर्ति हेतु सार्वजनिक पदों पर निष्पक्षता और कौशल के साथ काम करने वाले प्रतिभाशाली अधिकारी चुने जाने चाहिएं। दुर्भाग्य से, कई अधिकारियों को सत्ताधारी दल के साथ उनके संबंधों और वफादारी के आधार पर बड़े पद दिए जाते हैं। ऐसे में उनके कनिष्ठ अधिकारियों के लिए रोल मॉडल बनने की क्या उम्मीद की जा सकती है। 

भारत को एक ऐसे पुलिस बल की आवश्यकता है, जो उत्तरदायी और सम्मानित हो। उसके लिए हमें यह जानने की जरूरत है कि अक्सर समाज के मध्यम और निचले वर्गों से आने वाले अधिकारी भी पुलिस अकादमी के ठोस प्रशिक्षण के बाद पथभ्रष्ट क्यों हो जाते हैं। नैशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी.) के डाटा से पता चलता है कि 2010 और  2019 के बीच पुलिस हिरासत में प्रतिवर्ष औसतन 100 मौतें होती रही हैं। भले ही इनके पीछे भिन्न कारण रहे हों, फिर भी हिरासत में होने वाली मृत्यु पुलिस को संदेह के घेरे में ला खड़ा करती है। 

इस मामले में सुधारात्मक कदम क्या हो सकते हैं? गिर तारियों की सं या कम की जानी चाहिए। उच्चतम न्यायालय का स्पष्ट आदेश है कि प्रत्येक गिर तारी न्यायोचित हो और अनिवार्यता के पैमाने पर खरी उतरे। एन.सी.आर.बी. के डाटा से पता चलता है कि भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत होने वाली गिर तारियों में कुछ कमी आई है। 2010 से 2019 के बीच दंड संहिता के अंतर्गत होने वाले अपराधों में बढ़ौत्तरी के बावजूद पिछले 5 वर्षों में गिर तारियों में आई 5 लाख की कमी मायने रखती है। 

नैशनल पुलिस कमिशन एवं विधि आयोग ने अपनी 154वीं और मलीमथ आयोग रिपोर्ट के अलावा प्रकाश सिंह, बनाम भारत सरकार मामले में सिफारिश की गई है कि जांच को पारदर्शी और बेहतर बनाने के लिए पुलिस से इसे अलग रखा जाना चाहिए। जांच के लिए एक पृथक विंग होने से दोषी से स्वीकारोक्ति के लिए अनुचित माध्यमों का प्रयोग नहीं होगा और इसे पेशेवर दृष्टिकोण से संपन्न किया जा सकेगा। सिविल पुलिस के पास काम का अतिरिक्त बोझ होता है, इसलिए वह जल्द से जल्द अपराध की स्वीकारोक्ति में फंस जाती है। साइबर अपराध जैसे मामलों में पुलिस की सहायता के लिए विशेषज्ञ होने चाहिएं।

एन.सी.आर.बी. के डाटा से पता चलता है कि पिछले 10 वर्षों में पुलिस के विरुद्ध प्रत्येक वर्ष 47.2 आपराधिक मामले दर्ज किए जाते हैं। पुलिस कर्मचारियों और अधिकारियों को यह एहसास होना चाहिए कि उनका काम मानवाधिकारों का हनन नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा करना है। 

अभी भी हमारे देश में औपनिवेशिक पैटर्न पर चली आ रही पुलिस व्यवस्था को प्रगतिशील, आधुनिक एवं प्रजातांत्रिक देश की जनता की भावनाओं के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए प्रयासों में देर हो रही है। पुलिस को ‘स्मार्ट’ बनाने का प्रधानमंत्री मोदी का स्वप्न धरातल के स्तर पर साकार नहीं हुआ है। 1998 में बनी रिबैरो कमेटी ने भी पुलिस सुधार से जुड़ी अपनी रपट सरकार को दे दी, लेकिन वह भी ठंडे बस्ते में पड़ी है और पुलिस सुधार के लिए कोई ठोस कदम अभी तक नहीं उठाया जा सका। पुलिस के बुरे बर्ताव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आम लोग पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने में भी हिचकिचाते हैं। 

2006 में सोली सोराबजी की अध्यक्षता में मॉडल पुलिस अधिनियम तैयार किया गया था, जिसे आज तक लागू नहीं किया गया। 22 सितंबर, 2006 को उच्चतम न्यायालय ने प्रकाश सिंह बनाम यूनियन ऑफ  इंडिया मामले में केन्द्र एवं राज्य सरकारों को पुलिस सुधार से संबंधित 7 दिशा-निर्देशों के पालन का आदेश दिया था, जिसके पीछे 2 उद्देश्य थे-1. पुलिस के लिए कार्यात्मक स्वायत्तता एवं 2. पुलिस की जवाबदेही में वृद्धि। इस आदेश को 10 वर्ष से भी अधिक बीत चुके हैं, परन्तु राज्य सरकारें इसे अमल में नहीं ला सकीं। पुलिस विभाग में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। पहले, पूरे देश के लिए एक पुलिस विधेयक हुआ करता था, लेकिन अब 17 राज्यों ने इससे जुड़े अलग-अलग कानून अधिनियमित कर रखे हैं। बाकी के राज्यों ने इससे संबंधित कार्यकारी आदेश जारी कर रखे हैं। 

हमारे देश में लगभग 24,000 पुलिस थाने हैं। पुलिस बल की सं या लगभग 20.26 लाख है। ये लोग अपनी क्षमता का मात्र 45 प्रतिशत ही राष्ट्र को दे पा रहे हैं। बुनियादी ढांचे की कमी, जनशक्ति एवं कार्यात्मक स्वायत्तता का अभाव, इसके मु य कारण हैं। अगर देश की पुलिस पूरी तरह से सक्षम होगी, तो राष्ट्र की माओवादी, कश्मीरी आतंकवाद तथा उत्तर-पूर्वी राज्यों के अलगाववादी आंदोलन से आसानी से निपटा जा सकेगा। लोग अपने को सुरक्षित महसूस करेंगे। भारत की तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था को भी तभी सही सफलता मिल सकती है।-डॉ.सरवन सिंह बघेल


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