चीन के प्रभाव में नेपाल से ‘अशुभ संकेत’

7/18/2019 2:35:19 AM

भारत के करोड़ों लोग जिन सब्जियों, फलों और डिब्बाबंद चीजों का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें नेपाल में प्रतिबंधित किया जा रहा है। दर्जनों की संख्या में माल से भरे ट्रक लौटाए जा रहे हैं। बड़ी मात्रा में माल खराब भी हुआ है। तर्क यह है कि इन चीजों में खतरनाक रसायन मिले हुए हैं। अगर सेहत के लिए हानिकारक माल कोई देश सप्लाई कर रहा है, तो उसे ठुकरा देने का दूसरे देश को संप्रभु अधिकार है। 

भारत के विभिन्न शहरों में समय-समय पर मारे जाने वाले छापों में नुक्सानदेह मिलावट की पुष्टि भी होती है, इसलिए नेपाल की शिकायत को हम सिरे से खारिज नहीं करते लेकिन एक शंका पैदा होती है। भारत के माल को खराब साबित करने का तकनीकी ज्ञान नेपाल को अचानक कहां से प्राप्त हो गया? 

यह कोई असंबद्ध, एकमात्र घटना नहीं है। उत्तराखंड शासन ने सभी सीमावर्ती जिलों के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को पत्र लिखकर सीमावर्ती इलाके में नेपाली माओवादियों की बढ़ती सक्रियता और चीनी भाषा के प्रसार के बारे में रिपोर्ट मांगी है। इस आशय की शिकायतें मिली थीं कि खुली सीमा का फायदा उठाकर माओवादी स्थानीय जनता को गुमराह कर रहे हैं। गौरतलब है ऊधम सिंह नगर, पिथौरागढ़ और चंपावत नेपाल सीमा से लगे हुए हैं। उत्तराखंड की कुछ भूमि पर नेपाल दावे भी करता रहा है। राजा महेन्द्र से लेकर अब तक नेपाल में भारत विरोधी एक लॉबी हमेशा सक्रिय रही है लेकिन खड्ग प्रसाद शर्मा ओली के नेतृत्व में एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनने के बाद इन गतिविधियों में तेजी आई है। कारण यह है कि भारत-नेपाल संबंधों के इतिहास में पहली बार नेपाल में चीन का प्रभाव बेलगाम हुआ है। 

स्कूलों में चीनी पाठ्यक्रम 
तीसरी घटना के सामरिक महत्व का अंदाजा नेपाल के अंग्रेजी दैनिक ‘हिमालयन टाइम्स’ की इस सम्पादकीय टिप्पणी से लगाया जा सकता है :  काठमांडू घाटी और उसके बाहर कई कुलीन स्कूलों में सरकार और अभिभावकों को बताए बगैर चीनी भाषा अनिवार्य कर दी गई है। स्कूल के समय में इस तरह की पढ़ाई गैर-कानूनी है। इन स्कूलों ने पाठ्यक्रम विकास केन्द्र से नियमानुसार अनुमति भी नहीं ली। विषय की अनिवार्यता तय करने का अधिकार केवल इस केन्द्र को है। अधिकतर स्कूलों ने अभिभावकों को सूचित नहीं किया। नेपाल के प्राइवेट और बोॄडग स्कूल संगठन ने भी इसे असंवैधानिक बताया है। कोई भी विदेशी भाषा इस तरह स्कूलों में नहीं पढ़ाई जा सकती है। इस मामले में तो चीनी दूतावास वित्तीय सहायता भी प्रदान कर रहा है। 

कुमाऊंक्षेत्र में चीन की दिलचस्पी अभी ठीक से उजागर नहीं हुई है लेकिन तराई में तो खुला खेल चल रहा है। चीन का सांस्कृतिक प्रभाव बढ़ाने के लिए चीनी अध्ययन केन्द्र खोलने की शुरूआत ओली सरकार  बनने से पहले हुई थी। अब इसमें तेजी आई है। अभी तक 35 केन्द्र खोले जा चुके हैं। याद करें, शीत युद्ध के दौरान अमरीका और सोवियत संघ भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में सांस्कृतिक और सूचना केन्द्रों के माध्यम से अपना राजनीतिक प्रभाव किस तरह बढ़ाते थे। कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम सी.आई.ए. के बौद्धिक दस्ते के रूप में काम करती थी। अब वही सब चीन कर रहा है। 

गोरखपुर से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर, बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बिनी पर चीन की नास्तिक कम्युनिस्ट सरकार  का विकास के बहाने वर्चस्व बढ़ रहा है। दलाईलामा को शुद्ध धार्मिक अनुष्ठान तक के लिए आज तक लुम्बिनी नहीं जाने दिया गया है। नेपाल के तराई क्षेत्र में  चीन का बढ़ता असर निश्चित रूप से भारत के प्रतिकूल होगा। तराई की आबादी की बदौलत नेपाल की वर्चस्ववादी बांभन-ठंकुरी जाति के शासक वर्ग पर बीच-बीच में अंकुश लगता रहा है। सांस्कृतिक और धार्मिक कारणों से तराई के लोगों का भारत की ओर स्वाभाविक झुकाव रहा है। 

नेपाली शासन और प्रशासन में तराई का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है। नेपाल की सेना मुख्यत: घाटी और आसपास के क्षेत्रों की है, जिसमें तराई की नुमाइंदगी वस्तुत: नहीं है। तराई में असंतोष है। पिछले चुनाव में साबित हुआ कि भारत समर्थक पार्टियों का प्रभाव कम और माओवादियों का विस्तार हुआ है। यह चीन के अनुकूल है। हर असंतोष एक दोधारी तलवार होता है। भरोसा नहीं किया जा सकता कि चीन माओवादियों की आड़ में भारत के खिलाफ माहौल नहीं भड़काएगा।

ओली सरकार फिलहाल तराई की जनता का मुंह बंद करने में कामयाब हो गई है लेकिन असंतोष की आग अब भी सुलग रही है। समस्या यह है कि नेपाली कांग्रेस से लेकर कम्युनिस्ट तक, सभी इतिहास और अपने सिद्धांतों को बहुत जल्दी भूल गए। वे याद नहीं कर पा रहे कि निरंकुश राणा सरकार के खिलाफ बी.पी. कोइराला की नुमाइंदगी में  फैसलाकुन लड़ाई तराई की धरती से लड़ी गई थी। हिंसक माओवादी आंदोलन में न सिर्फ तराई, भारत की भूमि का भी इस्तेमाल हुआ था। दिल्ली, नोएडा, लखनऊ, वाराणसी, सिलीगुड़ी और अन्य भारतीय शहरों में नेपाल से भागे माओवादी पनाह लिया करते थे। वह चर्चित 12 सूत्री समझौता नई दिल्ली में ही हुआ था, जिसके तहत माओवादियों को सत्ता में आने का मौका मिला। लेनिन सभी राष्ट्रीयताओं के साथ न्याय की बात करते थे। नेपाल के कम्युनिस्टों ने इसी को दफन कर दिया। नेपाल के पहाड़ी इलाकों की तुलना में तराई की आबादी नि:संदेह एक अलग राष्ट्रीयता है। सात दशक से इस राष्ट्रीयता की न्यायोचित मांगें जस की तस पड़ी हैं। 

राणा शाही के खिलाफ तराई में संघर्ष के बड़े नेता वेदानंद झा को ङ्क्षहदी के मुद्दे पर 1951 में ही नेपाली कांग्रेस छोड़ कर नेपाल तराई कांग्रेस का गठन करना पड़ा था। हिंदी के साथ नाइंसाफी अब भी चल रही है। लाखों मधेसियों को अभी तक नागरिकता नहीं प्रदान की गई है। नए राज्यों का गठन तो हुआ लेकिन उसमें भी तराई की जनता निराश हुई। असंतोष की स्थिति में एक ङ्क्षचगारी दावानल पैदा कर देती है। 2015 में यही हुआ था। भारत से माल भरकर नेपाल जाने वाले ट्रकों को तराई की सीमा पर कई महीनों तक रोका जाता रहा। इससे आम नेपाली को बड़ी तकलीफ हुई। ट्रकों की आवाजाही रोकी थी मधेसी आंदोलनकारियों ने। मगर नेपाली शासकों ने अपने गिरेबान में झांकने के बजाय ठीकरा फोड़ा भारत के सिर। भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति से इंकार नहीं किया जा सकता। चीन न तो राजीव गांधी के समय मदद कर पाया था और न 2015 में। 

भारत-नेपाल सेनाएं
गौर करिए चीन और कहां  भारत की नस दबा रहा है। अभी तक भारत और नेपाल की सेनाओं में विशिष्ट संबंध रहे हैं। दोनों देशों के सेनाध्यक्ष एक-दूसरे के मानद जनरल होते हैं। नेपाल के फौजी अफसरों की ट्रेङ्क्षनग देहरादून और अन्य स्थानों पर होती है। 1950 की संधि के तहत नेपाल को हथियारों की सप्लाई भारत से होनी थी। किसी अन्य देश से हथियार लेने से पहले भारत से मशविरा जरूरी था। पिछले कई सालों से संधि की यह धारा प्रभावी नहीं रही। नेपाली सैन्य अधिकारियों की ट्रेङ्क्षनग भारत में होने के कारण नई दिल्ली के हाथ में एक अहम लीवर रहा। मसलन प्रधानमंत्री के नाते माओवादी नेता प्रचंड ने सेनाध्यक्ष जनरल रुक्मांगद को बर्खास्त करने का आदेश जारी कर दिया था। सेनाध्यक्ष ने इस आदेश की अनदेखी कर दी। अब चीन की सैनिक अकादमियों में प्रशिक्षण के लिए नेपाली अफसरों की संख्या बढ़ा दी गई है। वह दिन भी बहुत दूर नहीं जब नेपाली सेना अधिकाधिक चीनी हथियारों से लैस होगी। भारत के लिए निहितार्थ स्पष्ट हैं। 

आर्थिक मोर्चा तो भारत के लिए और मुश्किल है। नेपाल में प्रत्यक्ष चीनी निवेश लगातार बढ़ रहा है। 2017-18 में भारत का निवेश चीन की तुलना में 10 फीसदी से कम रहा। पुरानी कहावत है-दाम कराए काम। भारतीय राजनयिक को नेपाल में इतनी कठिन स्थितियों का सामना पहली बार करना पड़ रहा है। संसाधनों की सीमा के दृष्टिगत नई नीतियों और नए उपकरणों की जरूरत है।-प्रदीप कुमार