जाधव मामले में आई.सी.जे. के ‘निर्णय’ के बाद क्या

7/19/2019 12:20:26 AM

अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक अदालत (आई.सी. जे.) का 17 जुलाई, 2019 को दिया गया निर्णय अधिकतर मामलों में मजबूती से भारत का समर्थन करता है। अदालत ने कहा कि वियना कन्वैंशन के तहत दोनों देश काऊंसलर एक्सैस यानी दूतावास की पहुंच देने के लिए बाध्य है। काऊंसलर एक्सैस स्वाभाविक न्याय तथा ईमानदारी के नियमों का विस्तार है।

किसी अन्य देश में हिरासत अथवा नजरबंदी में रखे गए आरोपी को तुरंत सूचित किया जाना चाहिए कि उसे काऊंसलर एक्सैस प्राप्त करने का अधिकार है। जिस देश से आरोपी संबंध रखता हो उसे तुरंत सूचित किया जाना चाहिए कि उनका नागरिक हिरासत में है और आवेदन करने पर आवश्यक तौर पर काऊंसलर एक्सैस उपलब्ध करवाया जाएगा। ऐसा एक्सैस विदेशी धरती पर आरोपी को कानूनी प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के सक्षम बनाता है ताकि आरोपी के खिलाफ मुकद्दमा निष्पक्ष तरीके से चलाया जाए। आई.सी.जे. ने सही कहा कि पाकिस्तान ने इन सभी पूर्व शर्तों का उल्लंघन किया और इसलिए ऐसे आधारभूत मानवाधिकार उल्लंघनों पर आधारित सजा को अंजाम तक पहुंचाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। 

निर्णय को पढऩे से पता चलता है कि भारत लगभग सभी मायनों में जीत गया है। जिस चीज ने बहुतों को हैरान किया, वह थी पाकिस्तान का आधिकारिक दावा कि निर्णय वास्तव में पाकिस्तान की विजय है। इस नजरिए के समर्थक ऐसे प्रबल तथा हिम्मती दावे के लिए मुख्य रूप से दो कारण बताते हैं। पहला, आई.सी.जे. ने जाधव को रिहा नहीं किया और दूसरा, चूंकि पाकिस्तान में सैन्य अदालतों को माना जाता है और यह मामला अपने आप सैन्य अदालत को चला जाएगा जो पूरी तरह से सरकार नियंत्रित है। अब प्रासंगिक प्रश्र यह है कि जब मामला पाकिस्तान को ही वापस भेजा गया है तो इसकी समीक्षा तथा पुनॢवचार की प्रक्रिया क्या होगी जो जाधव को उपलब्ध करवाई जाएगी। 

सैन्य अदालतें
आई.सी.जे. ने अपने निर्णय के पैरा 135 में स्पष्ट कहा है कि जहां भारत ने यह घोषित करने के लिए कहा है कि पाकिस्तानी सैन्य अदालतें अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करती हैं, आई.सी.जे. की यह राय थी कि न्यायाधिकरण/अदालत का गठन सीमित अधिकार क्षेत्र के साथ वियना कन्वैंशन की व्याख्या तथा लागू करने के लिए किया गया है। इसका अधिकार क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय कानून के अन्य नियमों पर आधारित दावों से आगे नहीं जाता। इसलिए यह स्पष्ट है कि सैन्य अदालतों की वैधता पर सीमित अधिकार क्षेत्र के कारण आई.सी.जे. की कोई राय नहीं है। इसलिए वह प्रश्न भविष्य में अधिनिर्णय के लिए किसी उचित फोरम के सामने खुला रहेगा। 

सुनवाई नए फोरम में हो
आई.सी.जे. के निर्णय के पैरा 146 में काऊंसलर सुविधा बहाल करने की बात कही गई है। वियना कन्वैंशन के तहत काऊंसलर सुविधा नहीं देना ही न्याय के मूलभूत सिद्धांत का उल्लंघन है। पाकिस्तान ने आई.सी.जे. में हिरासत में कन्फैशन यानी स्वीकारोक्ति को ही सबूत के तौर पर पेश किया। अदालत ने विशेष तौर पर जिक्र किया है कि जाधव के केस की सुनवाई किसी नए फोरम में हो और अनिवार्य तौर पर यह सैन्य अदालत में नहीं हो सकती। आई.सी.जे. के निर्णय ने पाकिस्तान पर एक अनिवार्य जिम्मेदारी डाली है ताकि आवश्यक निर्देश के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सके कि जाधव को मौत की सजा देने के उसके सैन्य अदालत के निर्णय की समीक्षा अत्यंत व्यापक हो, यह सुनिश्चित करते हुए कि यह आई.सी.जे. द्वारा बताए गए सभी प्रासंगिक आधारों को ध्यान में रखता है।

सैन्य अदालतों की वैधता के प्रश्र पर न जाते हुए, पैरा 139 से 147 में अदालत की टिप्पणियों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि जाधव को उपलब्ध उपायों की प्रकृति क्या है, यह भी एक अनिवार्य निर्देश है। न्यायिक प्राधिकरण की प्रकृति, जो समीक्षा और पुनॢवचार के प्रश्र में नहीं जाएगी, वह सैन्य अदालत नहीं हो सकती है और शायद यही वजह है कि आई.सी.जे. एक कानून के द्वारा नए फोरम के गठन का सुझाव देता है। 

पाकिस्तान की चाल बेनकाब
पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में बुरी तरह से मुंह की खा चुका है। सामान्य मासूम नागरिकों को दोषी करार देने की उसकी चाल बेनकाब हो गई है। आई.सी.जे. ने पाकिस्तान को एक अवसर दिया जिसका इस्तेमाल वह अपने कानूनों में सुधार और न्याय की मूलभूत सुविधा के पालन के लिए कर सकता है। अब पाकिस्तान इस मामले में अगला कदम क्या उठाता है, इस पर पूरे विश्व की नजर होगी। निश्चित तौर पर अन्तर्राष्ट्रीय अदालत में यह भारत की बहुत बड़ी जीत है।-अरुण जेतली