बदलते परिदृश्य में मोदी-जिनपिंग ‘शिखर वार्ता’ की अहमियत

10/8/2019 11:55:32 PM

चेन्नई के नजदीक स्थित प्राचीन बंदरगाह कस्बा मामल्लपुरम चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के स्वागत के लिए सज रहा है जहां इस सप्ताह (11 से 13 अक्तूबर) प्रधानमंत्री मोदी और जिनपिंग के बीच अनौपचारिक शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात होगी। दूसरी बार सत्ता में आने के बाद मोदी ने शंघाई सहयोग संगठन के बिश्केक शिखर सम्मेलन के दौरान शी को औपचारिक न्यौता दिया था जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था। आशावादी मोदी को अर्जुन पैनैंसके नजदीक शी का स्वागत करते हुए दिखाएंगे और फोटो सैशन के दौरान पांच रथों, कृष्ण के मक्खन गोले तथा तटीय मंदिर को कवर किया जाएगा जबकि दोनों राष्ट्राध्यक्ष परिसर में चहलकदमी कर रहे होंगे।

चीन के वुहान में अप्रैल 2018 में हुई मुलाकात के बाद दोनों नेताओं के बीच यह दूसरी अनौपचारिक शिखर बैठक होगी। इस मुलाकात को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह मुलाकात कश्मीर और सीमा के मुद्दों पर दोनों देशों के बीच उपजे तनाव के बीच हो रही है। इससे पहले वुहान बैठक को काफी सफल करार दिया गया था क्योंकि इससे डोकलाम गतिरोध की पृष्ठभूमि में दोनों तरफ की सेनाओं को अपने संबंध मजबूत करने के लिए रणनीतिक दिशा-निर्देश मिले थे। उसके बाद मोदी और शी दस बार मिल चुके हैं। हालांकि इनमें से अधिकतर मुलाकातें बहुपक्षीय सम्मेलनों के दौरान हुई हैं। मामल्लपुरम सम्मेलन से दोनों देशों के संबंध और मजबूत होने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

कोई तय एजैंडा नहीं
इस सम्मेलन का कोई तय एजैंडा नहीं है क्योंकि दोनों नेताओं के बीच वुहान की तरह लम्बी अनौपचारिक मुलाकातें होने की संभावना है। वुहान में दोनों नेताओं ने 24 घंटों के दौरान 6 सत्र की वार्ता की थी। हालांकि नई दिल्ली ने इस मुलाकात को लेकर चुप्पी साध रखी है लेकिन चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने हाल ही में एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान कहा था ‘मेरा ख्याल है कि इस मुलाकात के दौरान कश्मीर मुख्य विषय नहीं होगा, ऐसा मेरा मानना है।’ सीमा के मसले पर हुआ ने कहा, ‘सीमा और सीमांत क्षेत्रों की सुरक्षा बनाए रखने तथा सीमा पर शांति और स्थिरता की बहाली के लिए दोनों देश साथ मिलकर काम कर सकते हैं।’

ऐसी संभावना है कि वे आपसी हित के विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करेंगे जिनमें रणनीतिक संवाद, वैश्विक मामले, सीमा संबंधी बातचीत तथा दोनों देशों के नागरिकों के बीच संबंध मजबूत करना शामिल है। इस दौरान संभवतया विवादास्पद मुद्दों को नहीं छेड़ा जाएगा। इस सम्मेलन का समय काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन इस समय जहां एक ओर अमरीका के साथ ट्रेड वार में उलझा हुआ है, वहीं हांगकांग में उसके खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं जबकि भारत कश्मीर और अर्थव्यवस्था जैसे मसलों से निपटने में व्यस्त है।

इसलिए चुना गया मामल्लपुरम
इस मुलाकात के लिए मामल्लपुरम को ही क्यों चुना गया? इस बंदरगाह का इतिहास पल्लव राजवंश से जुड़ा हुआ है। किंवदंतियों के अनुसार इसे ‘कदलमलाई’ (समुद्र और पर्वत की भूमि) कहा जाता था। इसके धार्मिक केन्द्र की स्थापना 7वीं शताब्दी के पल्लव राजा नरसिम्हवर्मन ने की थी जिसे मामल्ल कहा जाता था। मार्को पोलो ने अपनी पर्यटन पुस्तक में इस मंदिर का जिक्र किया है जिसमें इसे मामल्लपुरम के सात पैगोडा कहा गया है। यहां स्थित 5 रथ 7 मंदिरों के अवशेष हैं। खास बात यह है कि ये मंदिर सुनामी की मार के बावजूद बचे रहे और यूनेस्को ने 1984 से इन्हें अपने संरक्षण में ले लिया है।

मामल्लपुरम का चीन कनैक्शन
सम्मेलन के लिए मामल्लपुरम को चुनने का एक कारण इसका चीन कनैक्शन भी है। मामल्लपुरम में मिले प्राचीन चीनी, ईरानी तथा रोमन सिक्के इस बात के सबूत हैं कि यह प्राचीन समय में समुद्री बंदरगाह रही है। ऐतिहासिक रिकार्ड यह भी दर्शाते हैं कि पल्लव राजाओं ने चीन सहित दक्षिण पूर्व एशिया के साथ सांस्कृतिक, सैन्य और व्यापारिक संबंध स्थापित कर रखे थे। खास बात यह है कि चीन में बौद्ध धर्म का प्रसार भी मामल्लपुरम के माध्यम से ही हुआ था। पल्लव राजकुमार बोधि धर्म ने 642 ईसा पूर्व चीन की यात्रा की और वह न केवल चीन में एक आदर्श बन गए, बल्कि बौद्ध धर्म के 28वें आचार्य भी बने। मशहूर चीनी विद्वान और राजनीतिक दार्शनिक हुआंग त्सुंग ने पल्लव राजधानी कांचीपुरम की अपनी यात्रा का जिक्र किया है। चीनी विशेषज्ञों के अनुसार, चीन के तांग वंश ने पल्लव के तीसरे राजा राजसिम्हन 11 को दक्षिण चीन के लिए अपना जनरल भी नियुक्त किया था। इस सम्मेलन के बारे में हाल ही में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि यह सम्मेलन भी वुहान जैसी गर्मजोशी से भरा होगा। उन्होंने कहा था, ‘भारत और चीन, जो उभरती हुई शक्तियां हैं, 

दोनों के लिए संतुलन स्थापित करना जरूरी है क्योंकि इन दोनों को दुनिया से और एक-दूसरे से कई उम्मीदें हैं।’ दोनों नेता ऐसी पृष्ठभूमि में मिल रहे हैं जबकि अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद बीजिंग ने पाकिस्तान द्वारा इस मसले के अंतर्राष्ट्रीयकरण का खुला समर्थन किया है। यू.एन.जी.ए. में चीनी विदेश मंत्री द्वारा इमरान खान के समर्थन में दिए गए भाषणों पर नई दिल्ली ने नाराजगी जाहिर की थी। इन सभी बातों ने वुहान जैसी भावना को नुक्सान पहुंचाया है। इसके अलावा भारत अपने पड़ोस में पाकिस्तान-चीन के रणनीतिक गठबंधन तथा वहां पर चीन की व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर असहज है। दूसरी तरफ चीन और अमरीका के बीच जारी ट्रेड वार के बीच भारत और अमरीका के बीच बढ़ती नजदीकियों को चीन आशंका की नजर से देखता है। इस सबके बावजूद भारत ने हांगकांग प्रदर्शनों के मामले में यह कहते हुए संयम दिखाया है कि यह उनका आंतरिक मामला है।

बहरहाल मामल्लपुरम के तट पर होने वाले इस सम्मेलन, जिसमें 7 घंटे का निजी संवाद होगा, से सियासी पारा कम होने की उम्मीद है। जाहिर है कि दोनों पक्ष इस सम्मेलन को बड़े ताम-झाम से दूर रखना चाहते हैं। चीन और भारत के बदलते रिश्तों के मद्देनजर इस तरह का अनौपचारिक सम्मेलन काफी महत्वपूर्ण होगा जिसमें दोनों देशों के शक्तिशाली नेता आपसी संवाद कायम करेंगे।   
कल्याणी शंकर kalyani60@gmail.com


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