महाभियोग प्रस्ताव : सांसदों के निशाने पर मुख्य निर्वाचन आयुक्त

punjabkesari.in Wednesday, Mar 18, 2026 - 02:49 AM (IST)

फिर से चुनावी मौसम आ गया। अगले माह असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और विभिन्न राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए ‘मुझे वोट दो’ के लिए चुनावी केक परोस रहे हैं और इस चुनावी नौटंकी के बीच 193 सांसदों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव पेश किया है। हालांकि हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव को सदन ने अस्वीकार किया। लोकसभा अध्यक्ष पर आरोप लगाया गया था कि वह सदन के निष्पक्ष कार्यकरण को सुनिश्चित करने में विफल रहे हैं। अब इन सांसदों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध पक्षपात, भेदभावपूर्ण आचरण, वोट चोरी, चुनावी धोखाधड़ी की जांच में बाधा डालने, मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण के माध्यम से दलित, वंचित और मुस्लिम मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने का आरोप लगाया है। 

हालांकि विपक्ष के पास संसद में संख्या नहीं है और यह पूर्व निर्धारित है कि महाभियोग प्रस्ताव विफल होगा। इस महाभियोग प्रस्ताव का अस्वीकार होना उनकी विजय के रूप में देखा जाएगा और गलत कार्यों से उन्हें मुक्त माना जाएगा। तथापि कुछ लोग विपक्ष की शिकायतों को उचित मानते हैं। निर्वाचन आयोग ने इस तरह कार्य किया कि उस पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाया गया। उसने विपक्ष के साथ समान व्यवहार नहीं किया और उनके निर्णयों से अधिकतर भाजपा को लाभ हुआ। इन सबके चलते कई बार एक तरह से नागरिकता का परीक्षण भी बना। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप किया और निर्वाचन आयोग से कहा कि वह पारदॢशता बरते। 

प. बंगाल में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण में उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार और निर्वाचन आयोग के बीच बढ़ते टकराव पर अंकुश लगा। मुख्यमंत्री ने अपना धरना तब समाप्त किया, जब न्यायालय ने मतदाता सूची से लोगों को शामिल न करने के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई के लिए अधिकरणों के गठन का आदेश दिया। विपक्ष जानता है कि उसके पास संख्या नहीं है किंतु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उसे संस्थागत रूप से जो गलत कार्य किए जा रहे हैं उनका पर्दाफाश करने के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। जब से मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण की प्रक्रिया शुरू हुई, विपक्ष बार-बार यह कह रहा है कि इसके कार्यान्वयन में गंभीर खामियां हैं। विपक्ष के व्यापक विरोध के बावजूद आयोग ने यह प्रक्रिया जारी रखी। अत: निर्वाचन आयोग के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव लाना उचित है। 

संसदीय विरोध को राजनीतिक बताना विरोध और विमत को अवैध बताने का प्रयास है। इसी तरह इस प्रस्ताव को अतिवादी कदम बताना विपक्ष को जिम्मेदारी के वैध अवसरों से वंचित रखना है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विपक्ष को स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या प्रतीकात्मक उद्देश्य से अंतिम विकल्प का इस्तेमाल करना उचित है, क्योंकि यह कदम राजनीतिक समस्या का समाधान नहीं है। ऐसा कर विपक्ष स्वयं की उपेक्षा कर रहा है और एक उच्च संवैधानिक प्राधिकारी के साथ टकराव को और बढ़ा रहा है। 

भाजपा का आरोप है कि यह कदम पूर्णत: राजनीतिक है और इसका उद्देश्य विशेषकर पश्चिम बंगाल में चुनावों से पूर्व दबाव डालना है। निर्वाचन आयोग के दुराचार के विरुद्ध कोई ठोस सबूत नहीं है। यह केवल दिखावे के लिए राजनीतिक नाटक और एक स्वतंत्र संवैधानिक पद का राजनीतिकरण है, जिसके चलते चुनावों में जनता का विश्वास कम हो सकता है। संविधान के अंतर्गत मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए दोनों सदनों का दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। दोनों सदनों में राजग की सदस्य संख्या को ध्यान में रखते हुए इस महाभियोग प्रस्ताव का गिरना निश्चित है। तथापि स्वतंत्र भारत में इतिहास में यह पहली बार है कि एक वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव की औपचारिक सूचना दी गई है। यह कदम संस्थागत सत्यनिष्ठा के मुद्दे पर सरकार को चुनौती देने का प्रयास है। यहां तक कि यदि प्रस्ताव गिर भी गया, फिर भी इसका निर्वाचन आयोग के लिए नैतिक और प्रतिष्ठा से जुड़ा महत्व होगा। 

संसदीय वाद विवाद, जांच और औपचारिक आरोपों से एक दस्तावेजी इतिहास बन जाता है और इससे पदधारक की दीर्घकालीन प्रतिष्ठा प्रभावित होती है। तथापि महाभियोग प्रस्ताव लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गंभीर और ङ्क्षचताजनक संकेत है। निर्वाचन आयोग के पद से स्वतंत्र और राजनीतिक रूप से तटस्थ रहने की अपेक्षा की जाती है। यदि महाभियोग प्रस्ताव का उद्देश्य राजनीतिक असहमति का प्रयास है तो इससे आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित होगी। 

कुल मिलाकर महाभियोग प्रस्ताव किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, अपितु यह बताता है कि विपक्षी दलों और निर्वाचन आयोग में किस प्रकार विश्वास का अभाव है। दुखद तथ्य यह है कि हमारे नेतागण बुनियादी सिद्धांतों को नजरअंदाज करते हैं। यदि महाभियोग प्रस्ताव से मुख्य निर्वाचन आयोग को हटाने में वे विफल रहे तो यह विवाद और यह प्रक्रिया सुनिश्चित करेगी कि उसका आचरण स्थायी राजनीतिक और ऐतिहासिक छाप छोड़ेगा और संसद के ऐतिहासिक रिकॉर्ड का हिस्सा बना रहेगा। इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर होने का खतरा भी है क्योंकि जवाबदेही और संस्थागत स्थिरता दोनों के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए। विपक्ष को मुख्य निर्वाचन आयोग, राज्यपाल, न्यायालय आदि को राजनीतिक टकराव में घसीटने की बजाय सोच-विचार कर कदम उठाने चाहिएं। अविश्वास प्रस्ताव और महाभियोग प्रस्ताव उस जिम्मेदारी से बचना और अपने उत्तरदायित्वों को छोडऩा है। हमें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली की आधारशिला स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हैं। यदि चुनावों की विश्वसनीयता समाप्त होती है तो सरकार की वैधता भी कमजोर होती है।-पूनम आई. कौशिश


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