एच.पी.वी. टीकाकरण : सर्वाइकल कैंसर के उन्मूलन की दिशा में बहुत बड़ा कदम

punjabkesari.in Saturday, Mar 28, 2026 - 05:34 AM (IST)

प्रोफैसर हैराल्ड जुर हाऊजेन को 2008 में उनकी इस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार मिला कि ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एच.पी.वी.) के हाई-रिस्क स्ट्रेन से लगातार होने वाला संक्रमण ही सर्वाइकल कैंसर का मूलभूत कारण है। उनकी इस खोज ने रोगनिरोधी टीकों के साथ-साथ संक्रमण फैलाने वाले एजैंट का पता लगाने वाले परीक्षणों के विकास का भी मार्ग प्रशस्त किया। 

सर्वाइकल कैंसर भारत में महिलाओं में दूसरा सबसे आम कैंसर है। हर साल इसके लगभग 1 लाख नए मामले सामने आते हैं और इनमें से करीब आधे मामलों में मौत हो जाती है, जो दुनिया भर के कैंसर के बोझ का लगभग एक-चौथाई है। पीड़ित महिलाएं अपेक्षाकृत कम उम्र की होती हैं और परिवार व समाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही होती हैं। कैंसर विशेषज्ञ के रूप में, मैंने उनकी तकलीफों को करीब से देखा है। ऐसी महिलाएं, जिनमें चौथी स्टेज में इस रोग का पता चला, उनमें यूरिनरी फिस्टुला विकसित हो चुका था और कंसल्टिंग रूम में उनके दाखिल होने से पहले ही बदबू आने लगती थी। फिर कुछ अपेक्षाकृत भाग्यशाली महिलाएं भी थीं, जिन्हें शुरुआती अवस्था में ही इस रोग से ग्रसित होने के बारे में पता चल गया और जब यह बीमारी ठीक हो सकती थी, लेकिन सिर्फ रैडिकल सर्जरी या कीमो और रेडिएशन थैरेपी सेे। ऐसे में गहन या एग्रेसिव सर्जरी का शरीर पर असर हुआ, लंबे समय तक चले रेडिएशन उपचार के कारण देखभाल करने वालों को पढ़ाई या काम से वंचित रहना पड़ा। इसके अलावा, हमारे हरसंभव प्रयासों के बावजूद कुछ मामलों में कैंसर दोबारा लौट आया, जिसके लिए और भी जटिल प्रक्रियाओं, जैसे एक्सैंटरेशन सर्जरी और स्टोमा आदि की आवश्यकता पड़ी। हां, हम इलाज कर सकते थे, लेकिन इसकी शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक कीमत चुकानी होती। और भी दुखद बात यह थी कि इस बीमारी की रोकथाम की जा सकती थी। 1940 के दशक से ही पश्चिमी देशों में नियमित पैप स्मीयर जांच के माध्यम से द्वितीयक रोकथाम की व्यवस्था की गई थी, जिससे न केवल कैंसर का, बल्कि रोग की प्रारंभिक अवस्थाओं का भी पता लगाया जा सकता था।

भारत और अन्य निम्न-मध्यम आय वाले देशों (एल.एम.आई.सी.) में हमारे पास इतनी बुनियादी सुविधाएं और प्रशिक्षित जनशक्ति नहीं थी कि 30 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं की जीवन में एक बार भी जांच की जा सके, जबकि हर 3 साल के अंतराल पर यह जांच कराने की सलाह दी गई थी। यहां तक कि आज भी, विजुअल इंस्पैक्शन (वी.आई.) के माध्यम से राष्ट्रीय स्क्रीनिंग कार्यक्रम होने के बावजूद, स्क्रीनिंग कवरेज 5 प्रतिशत से अधिक नहीं है और जिन महिलाओं का टैस्ट पॉजिटिव पाया जाता है, उन्हें अस्पताल लाकर रोग की पुष्टि के लिए बायोप्सी और उपचार कराना भी बेहद कठिन होता है। एच.पी.वी. टीकाकरण ने 2006 में एक उम्मीद भरे सुपरहीरो की तरह इस परिदृश्य में प्रवेश किया। एक साधारण सा इंट्रामस्क्युलर इंजैक्शन इतनी बड़ी तकलीफ से बचा सकता है! यह वास्तव में बेहद उत्साहजनक संभावना थी। अब तक 500 मिलियन से अधिक खुराकें दुनिया भर में और लगभग 4 मिलियन खुराकें भारत में दी जा चुकी हैं। 

व्यवस्थित परीक्षणों और पोस्ट-मार्कीटिंग सॢवलांस से प्राप्त समेकित आंकड़ों से यह स्पष्ट है कि टीका लगवाने वाली महिलाओं में सामान्य आबादी  की तुलना में प्रतिकूल प्रभावों में कोई वृद्धि नहीं हुई। उनमें क्षणिक हल्की प्रतिक्रियाएं देखी गई हैं, जो सभी टीकों में सामान्य होती हैं। इन टीकों का प्रजनन क्षमता, जन्म दर, जन्मजात विकृतियों या मासिक धर्म के पैटर्न पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पाया गया। डब्ल्यू.एच.ओ. की सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन पहल का लक्ष्य सर्वाइकल कैंसर को एक दुर्लभ कैंसर बनाना है, जिसके होने की दर प्रति 1 लाख में केवल 4 मामलों तक सीमित हो।  इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए 2030 तक 15 वर्ष की आयु से पहले 90 प्रतिशत लड़कियों का एच.पी.वी. टीकाकरण, 35 और 45 वर्ष की आयु में 70 प्रतिशत महिलाओं की एच.पी.वी. परीक्षण द्वारा स्क्रीनिंग और जिन महिलाओं में रोग के लक्षण पाए जाएं, उनमें से 90 प्रतिशत का उपचार जैसे कुछ महत्वपूर्ण उद्देश्यों को हासिल करना आवश्यक है।  

आखिरकार, अब उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है-माननीय प्रधानमंत्री द्वारा 28 फरवरी, 2026 को राष्ट्रीय एच.पी.वी. टीकाकरण अभियान को देशव्यापी स्तर पर लांच किया जाना, महिलाओं के स्वास्थ्य और प्रजनन अधिकारों को महत्व दिलाने की दिशा में सर्वोच्च राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत है, जिसकी वे हकदार हैं।(प्रोफैसर एमेरिट्स, राष्ट्रीय कैंसर संस्थान, झज्जर; एम्स दिल्ली के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की पूर्व प्रमुख)-नीरजा भटला 


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