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‘अफगानिस्तान के सिख तथा हिंदू अब कितने रह गए बाकी’

2020-07-29T03:31:48.75

जिस दिन से काबुल में 25 मार्च को गुरुद्वारा हरराय साहिब में एक आतंकी हमले में आई.एस. के बंदूकधारियों ने 25 सिखों की निर्मम हत्या की थी  उसी दिन से अल्पसंख्यक सिख तथा हिंदू समुदायों ने भारत सरकार को उनके तत्काल अफगानिस्तान से बचाव के लिए कई बार अपील की है। हमें इन दोनों समुदायों के इतिहास पर नजर दौड़ानी होगी। 

अफगानिस्तान में हिंदू धर्म कब पहुंचा
इतिहासकार इंद्रजीत सिंह जिन्होंने ‘अफगान हिंदूज एंड सिख्स : ए हिस्ट्री ऑफ ए थाऊजैंड ईयर्स’ नामक किताब  भी लिखी है, के अनुसार ङ्क्षहदू सम्राटों ने एक बार काबुल सहित पूर्वी अफगानिस्तान पर राज किया था।

अफगानिस्तान में इस्लाम सातवीं शताब्दी में आया। ऐसा माना जाता है कि जुनबिल वंश पहले हिंदू थे जिन्होंने कंधार से लेकर गजनी तक 600 से 780 ईस्वी तक शासन किया। इसके बाद हिंदू शाही शासकों ने यहां शासन किया। 10वीं शताब्दी की समाप्ति पर इन शासकों को गजन विदज द्वारा बदला गया, जिन्होंने हिंदू बलों को स्थापित किया। इंद्रजीत सिंह के अनुसार 1504 में मुगल सम्राट बाबर ने काबुल पर कब्जा किया। बाबर ने काबुल को ‘ङ्क्षहदुस्तान का अपना बाजार’ कह कर संबोधित किया तथा काबुल प्रांत 1738 तक हिंदुस्तान के साथ रहा है।

अफगानिस्तान में सिख धर्म कब पहुंचा?
सिख धर्म के संस्थापक श्री गुरु नानक देव जी ने 16वीं शताब्दी के शुरू में अफगानिस्तान की यात्रा की तथा नींव-पत्थर रखा। उनकी जन्म साखियों में दर्ज इतिहास के अनुसार उनकी चौथी उदासी के दौरान (1519-21) उन्होंने भाई मरदाना के साथ अफगानिस्तान की यात्रा की जिसमें वर्तमान में काबुल भी शामिल था। इसके अलावा उन्होंने कंधार, जलालाबाद तथा सुल्तानपुर की यात्राएं कीं। इन सभी स्थानों पर आज गुरुद्वारे बने हुए हैं। सिखों के 7वें गुरु गुरुहरराय जी ने भी काबुल में सिख प्रचारकों को भेजने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अफगान समाज में हिंदुओं तथा सिखों द्वारा अफगानिस्तान में व्यापार करने के कई दस्तावेज रिकार्ड किए गए हैं। मगर आज 99 प्रतिशत हिंदू तथा सिखों ने अफगानिस्तान को छोड़ दिया है। 

हिंदू तथा सिखों ने अफगानिस्तान को कब और क्यों छोड़ा?
सिंह का कहना है कि अफगानिस्तान में 1970 तक 3 लाख के करीब हिंदू तथा सिख थे। 1983 में ए.के. 47 के साथ एक व्यक्ति ने जलालाबाद के गुरुद्वारे में धावा बोल दिया तथा 13 सिखों तथा 4 अफगानी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। 1989 में गुरुद्वारा गुरुतेग बहादुर सिंह (जलालाबाद) पर मुजाहिद्दीनों ने रॉकेटों से हमला कर दिया जिसमें 17 सिखों की मौत हो गई। 1992 में उस समय प्रस्थान शुरू हुआ जब मुजाहिद्दीनों ने वहां की कमान संभाली। 1979 में सोवियत दखलअंदाजी शुरू हुई जो अफगानिस्तान में एक दशक तक रही है तथा अफगानिस्तान में गृह युद्ध चलता रहा है। 

मुजाहिद्दीनों के अधीन बड़े पैमाने पर अपहरण, जबरन वसूली, सम्पत्तियों की छीना झपटी, धार्मिक उत्पीडऩ शुरू हुआ जो अफगानिस्तान से प्रस्थान करने का एक बड़ा कारण बना। तालिबान के आने के बाद से भी हिंदुओं तथा सिखों का उत्पीडऩ जारी रहा। 

अफगान सरकार (मुजाहिद्दीन द्वारा पूरे काबुल को अपने अधिकार लेने से पूर्व) ने आब गैंग यात्री पासपोर्ट नामक एक स्कीम के तहत तीव्र पासपोर्ट जारी किए हैं। भारतीय दूतावास के वीजा विभाग को स्थापित किया। 50,000 लोगों ने अफगानिस्तान को इस स्कीम के तहत छोड़ दिया तथा यह लोग भारत में आ पहुंचे। इतिहासकार इंद्रजीत सिंह के अनुसार भारत से ये लोग कई दूसरे देशों की ओर चले गए। अफगान हिंदुओं में ज्यादातर लोग अब जर्मनी में स्थापित हो चुके हैं और सिख यू.के. में रह रहे हैं। इसके अलावा इन समुदायों के अन्य लोग आस्ट्रिया, बैल्जियम, हालैंड, फ्रांस, कनाडा तथा अमरीका में रह रहे हैं।

भारत में कितने अफगानी सिख रह रहे हैं
दिल्ली में अफगान हिंदू सिख वैल्फेयर सोसायटी के प्रमुख खाजिंद्र सिंह का कहना है कि भारत में करीब 18,000 अफगानी सिख रह रहे हैं जिनमें से 50-60 प्रतिशत ने भारतीय नागरिकता ले ली है तथा बाकी के या तो शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं या फिर लम्बी अवधि के वीजा पर भारत में हैं। ज्यादातर अफगानी सिख दिल्ली में तथा बाकी के पंजाब तथा हरियाणा में रह रहे हैं। 

अफगानिस्तान में कितने बचे बाकी?
काबुल में छब्बल सिंह जोकि गुरुद्वारा दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी सिंह सभा करते परवान प्रबंधन कमेटी के सदस्य हैं के अनुसार अफगानिस्तान में इस समय करीब 650 सिख हैं (90-100 परिवार) तथा करीब 50 हिंदू बाकी बचे हैं। जब से 25 मार्च को काबुल में गुरुद्वारा पर हमला हुआ है तब से अब यहां पर कोई भी नहीं रहना चाहता। 

क्या नागरिकता संशोधन एक्ट इनकी मदद करेगा?
नागरिकता संशोधन एक्ट 2019 जोकि भारत में रहने की अनिवार्य अवधि को 11 वर्षों से 5 वर्ष कर देता है। यह एक्ट इन अफगान सिखों तथा हिंदुओं जोकि 31 दिसम्बर 2014 से पहले आए हैं, की मदद करेगा। हालांकि नागरिकता संशोधन एक्ट के नियम गृह मंत्रालय द्वारा अभी बनाए जाने बाकी हैं। (आई.एक्स.)-दिव्या गोयल


Pardeep

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