बिना वारंट गिरफ्तार व्यक्ति को कब तक पुलिस हिरासत में रखा जा सकता है?

punjabkesari.in Friday, Aug 14, 2026 - 05:37 AM (IST)

अब तक कहानी : हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश राज्य बनाम सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागा राजू मामले में फैसला सुनाया  कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बी.एन.एस.एस.) की धारा 187(2) के तहत जांच एजैंसी द्वारा पुलिस हिरासत मांगने की अवधि बढ़ाई गई है। बी.एन.एस.एस. के अंतर्गत अब हिरासत को टुकड़ों में मांगा जा सकता है, हालांकि कुल मिलाकर यह हिरासत की कुल अनुमत अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के दौरान 15 दिनों से अधिक नहीं होगी, न कि केवल रिमांड के पहले 15 दिनों तक सीमित रहेगी।

न्यायालय ने यह भी माना कि यद्यपि बी.एन.एस.एस. की धारा 38 के तहत पसंद के वकील से मिलने का अधिकार गारंटीकृत है लेकिन इसका किसी भी तरह से यह तात्पर्य नहीं है कि प्रत्येक पूछताछ सत्र की संपूर्ण अवधि के लिए वकील की निरंतर शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य है।

पुलिस हिरासत संबंधी वर्तमान कानून : बी.एन.एस.एस. की धारा 58 में प्रावधान है कि पुलिस द्वारा बिना वारंट के गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि धारा 187 के तहत मैजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत न किया गया हो।

बी.एन.एस.एस. की धारा 187(2) में यह प्रावधान है कि यदि जांच अधिकारी को यह प्रतीत होता है कि जांच 24 घंटे के भीतर पूरी नहीं की जा सकती और यह मानने के आधार हैं कि आरोप सही है, तो मैजिस्ट्रेट प्रारंभिक 40 दिनों या 60 दिनों के दौरान, 60 दिनों या 90 दिनों की हिरासत अवधि में से, अभियुक्त को अधिकतम 15 दिनों की अवधि के लिए, पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से, हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है। धारा 187(3) में यह प्रावधान है कि यदि मैजिस्ट्रेट पर्याप्त आधारों से संतुष्ट है, तो वह किसी आरोपी व्यक्ति को 15 दिनों की अवधि से अधिक समय तक (न्यायिक) हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, जो कि निम्नलिखित अवधि से अधिक हो सकती है : 1. 90 दिन, यदि जांच मृत्युदंड, आजीवन कारावास या 10 वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय अपराध से संबंधित है; 2. 60 दिन, यदि जांच किसी अन्य अपराध से संबंधित है। अत:, यदि जांच उपरोक्त निर्धारित समय अवधि के भीतर पूरी नहीं होती, तो आरोपी व्यक्ति को रिहा किया जा सकता है, जिसे आमतौर पर जमानत न मिलने के रूप में जाना जाता है।

सुदा सुरेश मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह विधायी परिवर्तन उन स्थितियों से निपटने के लिए किया गया था, जहां जांच के दौरान नए तथ्य, खुलासे या सुराग सामने आ सकते हैं। इसलिए, पुलिस हिरासत की अवधि को प्रारंभिक 15 दिनों से बढ़ाकर 40 या 60 दिनों तक कर दिया गया। पहले, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167 के तहत यह प्रावधान था कि किसी आरोपी को पुलिस हिरासत में रखने की अवधि कुल मिलाकर प्रारंभिक 15 दिनों से अधिक नहीं हो सकती थी। हालांकि, इन पहले 15 दिनों की अवधि के दौरान मैजिस्ट्रेट न्यायिक हिरासत से पुलिस हिरासत और इसके विपरीत हिरासत की प्रकृति में परिवर्तन कर सकता था।

वकील की उपस्थिति में : बी.एन.एस.एस. की धारा 38 में यह प्रावधान है कि ‘जब किसी व्यक्ति को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर पूछताछ की जाती है, तो उसे पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार होगा, हालांकि पूरी पूछताछ के दौरान नहीं।’ यह प्रावधान दंड   प्रक्रिया संहिता की धारा 41-डी के समान है।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना  कि प्रावधान को स्पष्ट रूप से पढऩे से यह स्पष्ट होता है कि इसमें पूछताछ सत्र के दौरान वकील की निरंतर शारीरिक उपस्थिति अनिवार्य नहीं है, चाहे दृश्य या श्रव्य दूरी कितनी भी हो। न्यायालय ने कहा कि निरंतर उपस्थिति का बिना शर्त अधिकार, धारा 38 बी.एन.एस.एस. में निहित प्रावधान से परे होगा। इसलिए न्यायालय ने उच्च न्यायालय द्वारा लगाई गई शर्त में संशोधन किया और कहा कि ऐसे वकील को केवल पूछताछ स्थल पर उपस्थित रहने की अनुमति होगी, जहां से वह प्रतिवादी-आरोपी को देख सके। 

वीडियोग्राफी और सी.सी.टी.वी. दस्तावेजीकरण के प्रश्न पर, न्यायालय ने यह भी माना कि विभिन्न स्थानों के बीच आरोपी के आवागमन की निर्बाध वीडियोग्राफी की बजाय, पूछताछ के वास्तविक सत्र की ऑडियो-विजुअल रिकॉर्डिंग और आरोपी के साथ की गई किसी भी खोज या बरामदगी की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग, आवश्यकता को पूरा करेगी।(लेखक भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी हैं) (‘द हिंदू’ से साभार)-आर.के. विज 


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