मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला 215 अधिकारियों को एक साथ सजा सुनाई

punjabkesari.in Monday, Oct 02, 2023 - 04:00 AM (IST)

अदालतों द्वारा फैसले सुनाने में देर करने से पीड़ितों को न्याय प्रदान करने का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। इसीलिए कहा जाता है कि देर से मिलने वाला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है। देर से न्याय प्रदान करने के इसी तरह के 31 वर्ष पुराने एक मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने 29 सितम्बर को तमिलनाडु के धर्मपुरी जिले के एक आदिवासी गांव वाचाथी में 20 जून,1992 को 18 महिलाओं के बलात्कार और उन पर अत्याचार के मामले में 215 अधिकारियों को, जिनमें वन, पुलिस और राजस्व विभाग के अधिकारी शामिल हैं, एक साथ जेल की सजा का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। 

इस छापेमारी के दौरान सम्पत्ति और मवेशियों का भी भारी विनाश हुआ था। वर्ष 2011 में धर्मपुरी की एक सत्र अदालत ने इस सिलसिले में भारतीय वन सेवा के 4 अधिकारियों, 84 पुलिस कर्मियों और 5 राजस्व विभाग के अधिकारियों सहित 126 वन कर्मचारियों को दोषी ठहराया था। इस कांड के विरुद्ध भड़के व्यापक जनरोष के दृष्टिगत राज्य सरकार को 1995 में इसकी सी.बी.आई. द्वारा जांच करवानी पड़ी थी जिसने इस मामले में तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक एम. हरिकृष्णन तथा अन्य अधिकारियों सहित 269 आरोपियों के विरुद्ध चार्जशीट दायर की थी। 

मद्रास हाईकोर्ट ने इस बारे आरोपियों द्वारा दायर सभी अपीलें रद्द करके एक सत्र अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए, जिसमें इन अधिकारियों को गांव में चंदन की लकड़ी की तस्करी रोकने के लिए की गई छापेमारी के दौरान महिलाओं के यौन उत्पीडऩ व उन पर अत्याचार करने का दोषी ठहराया गया था, उक्त फैसला सुनाया। उल्लेखनीय है कि कुल 269 आरोपियों में से 54 की मुकद्दमे के दौरान मृत्यु हो गई और शेष 215 को 1 से 10 वर्ष तक जेल की सजा सुनाई गई थी जिसे अब मद्रास हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखते हुए सभी आरोपियों की कस्टडी लेकर उन्हें सजा पूरी करने का निर्देश देने के अलावा 2016 में एक डिवीजन बैंच के आदेश के अनुसार प्रत्येक बलात्कार पीड़िता को तुरंत 10-10 लाख रुपए मुआवजा देने तथा इसके लिए अपराधियों से 50 प्रतिशत राशि वसूल करने के निर्देश दिए। 

अदालत ने अपने एक अन्य बड़े फैसले में आरोपियों को बचाने के लिए तत्कालीन जिला कलैक्टर, पुलिस अधीक्षक और जिला वन अधिकारी के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश दिया जिन्होंने वास्तविकता जानते हुए भी दोषियों को बचाने की कोशिश की और इसका खमियाजा निर्दोष ग्रामीणों को भुगतना पड़ा। इसके साथ ही राज्य सरकार को 18 बलात्कार पीड़िताओं या उनके सदस्यों को उपयुक्त नौकरी या स्थायी स्वरोजगार देने का निर्देश दिया। उन्होंने सरकार को इस घटना के बाद वाचाथी गांव में रोजगार और जीवन स्तर में सुधार के लिए उठाए गए कल्याणकारी उपायों पर अदालत को रिपोर्ट देने का निर्देश दिया। हम अक्सर लिखते रहते हैं कि अदालतों द्वारा पीड़ितों को न्याय प्रदान करने में होने वाले इतने अधिक विलंब के कारण ही अपराधियों का हौसला बढ़ गया है कि वे हत्या और मारपीट, बलात्कार, चोरी कुछ भी कर सकते हैं। अत: अदालतों में न्याय प्रक्रिया को चुस्त और तेज करने की अत्यधिक जरूरत है, ताकि न्याय में देरी कहीं अन्याय न बन जाए।  


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