बढ़ती जनसंख्या है बड़ी चुनौती

punjabkesari.in Sunday, Jul 11, 2021 - 05:56 AM (IST)

जनसंख्या दिवस एक बार फिर हमारी दहलीज पर आ खड़ा हुआ है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जनसं या दिवस पर भाषणबाजी तो बहुत होती है लेकिन धरातल पर काम कम ही हो पाता है। दरअसल कोरोना काल ने हमें यह बता दिया है कि अधिक जनसंख्या विभिन्न तौर-तरीकों से हमारे लिए एक बड़ा खतरा है। दरअसल सघन जनसं या वाले क्षेत्रों में विषाणुजनित रोग फैलने का खतरा ज्यादा होता है। 

आज कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर न जाने और एक-दूसरे से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जा रही है। जाहिर है सघन जनसं या वाले क्षेत्रों में ऐसे उपाय अपनाना मुश्किल हो जाता है। पिछले दिनों प्रतिष्ठित मैडिकल जर्नल लांसेट में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत की जनसं या वृद्धि दर में वर्ष 2047 के बाद से कमी आएगी। वर्ष 2047 तक भारत की जनसंख्या करीब 1$61 अरब यानी अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच जाएगी। 

गौरतलब है कि 2010 से लेकर 2019 तक भारत की जनसं या वृद्धि दर औसतन 1$2 फीसदी रही है। रिपोर्ट में बताया गया था कि इस गति से 2027 तक भारत, चीन को पीछे छोड़कर सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। लांसेट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र ने पहले प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में गिरते प्रजनन दर तथा बुजुर्गों की आबादी को तो ध्यान में रखा था लेकिन कुछ दूसरे मापदंडों पर ध्यान नहीं दिया था। लांसेट की रिपोर्ट के अनुसार 2047 में भारत की आबादी 1$61 अरब यानी दुनिया में सबसे ज्यादा होगी। एेसे में भारत को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। 

यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि आज प्रत्येक क्षेत्र में जागरूकता आने के बावजूद आम जनता में जनसं या नियंत्रण के प्रति जागरूकता का अभाव दिखाई देता है। आज सरकार करोड़ों रुपए विज्ञापनों एवं परिचर्चाओं पर खर्च कर रही है लेकिन जनसं या तेजी के साथ बढ़ती जा रही है। इस जनसंख्या वृद्धि के पीछे काफी हद तक हमारे देश की सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना भी जि मेदार है।

दूसरी ओर परिवार नियोजन नीतियों का ठीक ढंग से क्रियान्वयन भी नहीं हो पा रहा है। बहरहाल कहीं न कहीं चूक जरूर हुई है जिसका खामियाजा स पूर्ण देश को उठाना पड़ रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सब इस समस्या पर गंभीरता के साथ पुर्नविचार करें ताकि भविष्य में हमें जनसं या विस्फोट से जन्मी अन्य समस्याआें से भी छुटकारा मिल सके। 

यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि पिछले 50 वर्षों में सरकार तथा विभिन्न सामाजिक संगठन जनता के साथ एक एेसा संवाद स्थापित करने में नाकाम रहे हैं जिससे कि इस समस्या का स्थाई हल निकल सके। आज विभिन्न धार्मिक एवं राजनीतिक नेता बड़े-बड़े समारोह में जनता को इस देश की अनेक गंभीर समस्याआें के बारे में बताते हैं। इन समारोहों में नेताआें और धर्मगुरुआें द्वारा शायद ही कभी जनसं या वृद्धि की समस्या पर चर्चा की जाती है।-रोहित कौशिक


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