सोने पर सरकारी नजर : वरदान या नियंत्रण का जाल
punjabkesari.in Friday, May 15, 2026 - 04:49 AM (IST)
जब से प्रधानमंत्री ने देशवासियों को सोना न खरीदने की अपील की है, सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। उनमें से एक वीडियो पोस्ट काफी वायरल हो रहा है, जिसमें सरकार की सोने से जुड़ी नई नीति पर गहरी चिंता जताई गई है। पोस्ट में कहा गया है कि सरकार अब आम घरों में पड़े सोने को वित्तीय संपत्ति बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। आयात के दबाव, रुपए पर तनाव और ई-गोल्ड को बढ़ावा देने के नाम पर यह कदम उठाया जा रहा है। वीडियो में स्पष्ट किया गया कि सोना अब सिर्फ जेवर या निवेश नहीं, बल्कि एक ‘पावर’ है। पर जब यह डिजिटल हो जाएगा तो नियंत्रण किसके हाथ में होगा? आपके, बैंक के या सिस्टम के? यह सवाल आज हर आम आदमी को सोचने पर मजबूर कर रहा है।
वीडियो में सरकार की तर्कसंगतता को भी समझाया गया है। भारत में घरों, लॉकरों में जेवरों और सिक्कों के रूप में भारी मात्रा में सोना पड़ा हुआ है, लेकिन यह अर्थव्यवस्था में घूमता नहीं है। न बैंक इसका इस्तेमाल कर पाते हैं, न जेवराती। हर साल देश को नया सोना आयात करना पड़ता है, जिसके लिए डॉलर खर्च होते हैं और आयात बिल बढ़ता है। सरकार का तर्क है कि यदि यह निष्क्रिय सोना सिस्टम में आ जाए, तो आयात कम होगा, अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। इसके लिए ई-गोल्ड यूनिट्स या गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें आप भौतिक सोना जमा करेंगे, डिजिटल यूनिट्स लेंगे, ब्याज कमाएंगे और लॉकर चार्ज बचाएंगे। वीडियो में सोने की शुद्धता जांच, बार-कॉइन-जेवर स्वीकार करने और रिनॉऊंड रिफाइनर से टाई-अप जैसी सुविधाओं का जिक्र भी है।
लेकिन वीडियो सिर्फ सरकारी तर्क पर नहीं रुकता। यह चेतावनी देता है कि कैश को ‘यू.पी.आई.’ से डिजिटल बनाने, कागजी शेयरों को डीमैट में लाने के बाद अब सोने की बारी है। भौतिक सोना, जो लॉकर में ‘अदृश्य’ और ‘निजी’ था, अब पंजीकृत, ‘ट्रैकेबल’ और नियमों के दायरे में आ जाएगा। वीडियो में ‘सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड’ का भी उदाहरण दिया गया है, जहां 1 लाख का निवेश 4.86 लाख हो गया लेकिन अब फोकस घरेलू सोने पर है। सवाल उठाया गया है कि क्या यह सिर्फ आयात कम करने की रणनीति है या सिस्टम में पूर्ण नियंत्रण का खेल? यह पोस्ट आम आदमी की चिंताओं को छूता है। सोना भारतीय संस्कृति में सिर्फ संपत्ति नहीं, बल्कि सुरक्षा, विवाह और आपातकालीन फंड माना जाता है। महिलाओं के मंगलसूत्र से लेकर परिवार की पीढ़ी-दर-पीढ़ी की जमा पूंजी तक, यह भावनात्मक और आर्थिक रूप से जुड़ा है। वीडियो के संदेश को देखते हुए लगता है कि डिजिटल सोना बनने पर न सिर्फ रूप बदलेगा, बल्कि नियंत्रण, दृश्यता और भविष्य के नियम भी बदल जाएंगे।
इस पोस्ट पर आए कमैंट्स इस चिंता को और गहरा करते हैं। एक यूजर ने लिखा, ‘‘बड़े-बड़े उद्योगपतियों का जेवर ले लो, आम जनता को बख्श दो।’’ दूसरे ने कहा, ‘‘डिजिटल इंडिया मतलब गुलामी, फंडामैंटल राइट्स खोना।’’ कई कमैंट्स में डर जताया गया कि सरकार महिलाओं के मंगलसूत्र तक पर नजर रखेगी। एक ने चेतावनी दी, ‘‘बैंक डूब गया तो क्या देंगे? फिजिकल गोल्ड ही अच्छा।’’ कुछ यूजर्स ने इसे ‘न्यू वल्र्ड ऑर्डर’ या ‘ग्लोबलिस्ट एजैंडे’ से जोड़कर देखा, जहां सोना रजिस्टर कराने के बाद आम आदमी सड़क पर आ जाएगा। कुल मिलाकर, कमैंट सैक्शन सरकार पर अविश्वास, डिजिटल नियंत्रण के भय और व्यक्तिगत स्वायत्तता खोने की भावना से भरा पड़ा है।
अब सवाल यह है कि यह नीति आम आदमी को कितना फायदा पहुंचाएगी? फायदों की बात करें तो यह निश्चित रूप से कुछ वर्गों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। जो लोग अपना सोना लॉकर में बेकार पड़ा रखते हैं, उन्हें ब्याज कमाने का मौका मिलेगा। लॉकर चार्ज बचेंगे, सोने की शुद्धता की जांच होगी और जरूरत पडऩे पर इसे आसानी से लिक्विड किया जा सकेगा। अर्थव्यवस्था के स्तर पर आयात बिल कम होने से रुपया मजबूत होगा, महंगाई पर काबू रहेगा और विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित होगा। अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी को फायदा पहुंचेगा। यानी कि स्थिर अर्थव्यवस्था, बेहतर रोजगार और कम आयात निर्भरता। छोटे किसान, मध्यम वर्गीय परिवार या महिलाएं, जो सोने को सुरक्षित निवेश मानती हैं, बिना बेचे ब्याज कमा सकेंगी। गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम में शुद्धता जांच की सुविधा भी जेवरातों की विश्वसनीयता बढ़ाएगी। लेकिन नुकसान भी कम नहीं। सबसे बड़ा खतरा नियंत्रण का है। भौतिक सोना परिवार की स्वतंत्र संपत्ति है। डिजिटल होने पर बैंक या सरकार के पास डाटा होगा। कर चोरी, ब्लैक मनी या आपात स्थिति में सरकार इसका इस्तेमाल कर सकती है। विगत में नोटबंदी और अन्य नीतियों के अनुभव ने लोगों में अविश्वास पैदा कर दिया है। यदि बैंक संकट आए या सिस्टम फेल हो जाए तो क्या होगा?
सांस्कृतिक रूप से सोना ‘निजी’ है, विवाह, त्यौहार या आपात में इसे बेचने या गिरवी रखने का फैसला परिवार का होता है। डिजिटल सिस्टम में यह फैसला नियमों से बंध जाएगा। मध्यम और निचले वर्ग के लिए, जो सोने को मुद्रास्फीति रोधी बचाव मानते हैं, यह जोखिम भरा हो सकता है। आम आदमी के लिए फायदा तभी होगा, जब इस स्कीम में पारदॢशता, वैकल्पिक विकल्प और विश्वास का माहौल बने। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई जबरदस्ती न हो, डाटा प्राइवेसी सुरक्षित रहे और निकासी आसान हो। यदि स्कीम वैकल्पिक रहे और लोग अपनी मर्जी से जुड़ें, तो यह वरदान साबित हो सकती है। लेकिन यदि इसे ‘सिस्टम का गेम’ बनाया गया तो अविश्वास बढ़ेगा।
देखा जाए तो यह बहस सिर्फ सोने की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण की है। वायरल पोस्ट और उसके कमैंट्स ने आम आदमी की चिंता को आवाज दी है। सरकार को इस पर खुली बहस करनी चाहिए। सोना भारत की सांस्कृतिक धरोहर है, इसे सिर्फ वित्तीय संपत्ति बनाकर आम आदमी का भरोसा न खोया जाए। यदि नीति संतुलित और जनहित में बनी, तो यह अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगी, अन्यथा यह सिर्फ ‘नियंत्रण’ का खेल साबित होगी। आम आदमी को फैसला खुद करना होगा, डिजिटल सुविधा चुनें या पारंपरिक सुरक्षा?-रजनीश कपूर
