‘अर्धसत्य और शुद्ध झूठ’ से मुद्दे ढंकती है सरकार

2020-10-14T02:11:16.873

लगता है वर्तमान सरकार का मुख्य मंतव्य बेईमानी, अर्धसत्य, ताने देना तथा शुद्ध झूठ के माध्यम से मुद्दों को ढंकने का है। जिस तरह सूर्य की किरणें बादलों को चीर कर बाहर आती हैं उसी तरह कुछ तथ्य भी बाहर आ जाते हैं। जहां तक भारतीय अर्थव्यवस्था का संबंध है यहां पर इसके बारे में तथ्य मौजूद हैं। पहला यह कि भारतीय अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। यह वर्तमान वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही से पहले कम से कम 8 तिमाहियों के दौरान ऐसा हुआ जिसमें वृद्धि दर गिर कर 23.9 प्रतिशत हो गई। अपनी याद्दाशत को ताजा करते हुए 2018-19 की पहली तिमाही में वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत रिकार्ड की गई थी। 

2019-20 की चौथी तिमाही में यह 3.2 प्रतिशत पर धराशायी हुई जोकि 500 मूल प्वाइंट की गिरावट है। दूसरा यह कि ऐसी बड़ी गिरावट परमात्मा की किसी कार्रवाई के कारण नहीं बल्कि उन लोगों के कारण संभव हुई जो अपने आपको भगवान मानते थे। तीसरा तथ्य यह है कि मंदी से बाहर निकलने के उपायों को अनेकों अर्थशास्त्रियों ने सुझाया मगर सरकार ने इसका कोई इस्तेमाल नहीं किया। सरकार ने यह मानने के लिए इंकार कर दिया कि मांग में कमी सबसे बड़ा कारण है तथा उसमें कीमती उपायों को करना जारी रखा जिसका हाथ में रखी समस्या के लिए कोई समाधान न था। निश्चित तौर पर इसने कार्य नहीं किया। 

चौथा यह पूरी तरह से स्पष्ट था कि यह परेशानी बिना समझे-विचारे नोटबंदी के कदम को उठाने से आई थी। इसने अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया। सरकार में आज कोई भी उन अजूबों के बारे में बात नहीं करता जिसका इसने निर्माण किया था क्योंकि अपने उद्देश्यों को पाने में सरकार असफल हुई है। नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार जी.डी.पी. रेशो में कैश 15 प्रतिशत तक बढ़ गया। यह स्वतंत्रता के बाद सबसे ऊंची दर है। पांचवां तथ्य यह है कि अर्थव्यवस्था में क्षति बहुत बड़ी नहीं थी। सरकार को गलत परामर्श दिया गया और जी.एस.टी. को बुरी तरह से तैयार किया गया जिसके लिए मैंने राज्य के वित्त मंत्रियों को वैट के लिए सशक्त कर नींव रखी थी। अब केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच खतरनाक रिश्ते बन चुके हैं। 

छठा, अर्थव्यवस्था के लचकीले स्वास्थ्य से भली-भांति जागरूक होने के बावजूद सरकार ने बिना सोचे-समझे लॉकडाऊन को लागू कर दिया। अर्थव्यवस्था में जो थोड़ी-बहुत जान बाकी थी वह लॉकडाऊन ने निचोड़ दी। सातवां, तथ्य यह है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में रिकार्ड की गई वृद्धि दर में गिरावट सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच ऊंची है। आठवीं, बात यह है कि मोदी सरकार दिवालिया हो चुकी है। अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में कमी होने पर भी पैट्रोलियम उत्पादों पर असाधारण उगाही  की गई।  

नौवां, यह कि अच्छे मानसून के नतीजे के तौर पर कृषि के क्षेत्र में अच्छी आऊटपुट देखी गई जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिर किया हुआ है। हालांकि किसान निरंतर ही मुश्किलें झेल रहे हैं।
सरकार अच्छे मानसून तथा वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में कमी के लिए श्रेय नहीं ले सकती। आंकड़ों में हेरफेर, अनिष्ट आंकड़ों को दबाना, पी.एम. 
केयर्स फंड में धुंधलापन, चुनावी बांड तथा राजनीतिक दलों के लिए विदेशी योगदान जैसी बातें सरकार की कसौटी बन गई हैं। 

और अंतिम तौर पर जो चीज बेहद फल-फूल रही है वह है स्टॉक मार्कीट जो महामारी के दौरान सट्टेबाजों के नियंत्रण में है। मगर ये सब बातें लोगों के खाली पेट को नहीं भर सकतीं। यह सत्य है कि सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद भी कुछ बातें छिपाई नहीं जा सकतीं। सबसे बड़ी वास्तविकता इस बात की है कि इस समय लोग एक बुरे वक्त से गुजर रहे हैं और सरकार की नाकामियों के लिए बड़ी कीमत चुका रहे हैं। एक संकट को कभी भी बेकार नहीं जाने दिया जाना चाहिए। अपने आप के निर्माण के लिए यह सबसे बड़ा मौका होता है। जॉन मेनार्ड केन्ज ने सुझाया है कि लोगों को खाइयां खोदने में लगे रहना चाहिए और उसके बाद इसको ऊपर तक भर देना चाहिए? यह बात इस संदर्भ में की गई थी कि लोगों की जेबों में पैसा पहुंचना चाहिए ताकि मांग में तेजी लाई जा सके। आज हमारे देश के संदर्भ में यह बात बनती है कि ज्यादा रोजगार उत्पन्न करना,  ठोस सम्पत्तियों को बढ़ाना तथा एक सशक्त मूलभूत ढांचे की संरचना की जाए। 

अभी भी देश में लाखों की तादाद में ग्रामीण सड़कें बननी हैं, सबको घर उपलब्ध करवाना है, नए शहर विकसित करने हैं तथा आधुनिक सहूलियतों के साथ गांवों का निर्माण करना है। इसके साथ-साथ सरकार को स्वास्थ्य तथा शिक्षा की सहूलियतों को सुधारना है, राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण करना है, रेलवे लाइन, एयरपोर्ट, बंदरगाहों, रक्षा को प्रोत्साहन तथा पर्यटन ढांचे को और ज्यादा सशक्त करना है। ये सब ऐसी खाइयां हैं जिसके लिए हमें आज से ही खुदाई करनी पड़ेगी। इन सब बातों के लिए आखिर संसाधन कहां हैं। एक बार फिर मेरा एक साधारण तर्क यह है कि ऋण लेना कोई बुरी चीज नहीं मगर आपके पास इसकी अदायगी के लिए क्षमता होनी जरूरी है। इसलिए सरकार को आगे बढऩा चाहिए तथा उधार लेना चाहिए।  स्रोतों की उपज के लिए नोटों को प्रिंट भी किया जाना चाहिए। ऐसे पैसे को खर्च करना चाहिए मगर बेफिजूल नहीं बल्कि समझदारी के साथ। 

सत्ताधारी पार्टी चुनाव जीतती जाएगी, चुनी हुई सरकारों को गिराती जाएगी, सरकारी एजैंसियों का दुरुपयोग करती जाएगी ताकि अपने विरोधियों को दबाया जा सके और सत्ता पर अपना एकाधिकार स्थापित किया जा सके। यह सब क्रिकेट से लेकर न्याय की अदालतों तक शामिल है मगर भारत के बारे में सरकार क्या सोचती है?-यशवंत सिन्हा पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री


Pardeep

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