‘राजद्रोह कानून’ पर उच्चतम न्यायालय की अच्छी पहल

2021-07-22T05:14:45.557

पिछले कुछ वर्षों से वर्तमान सरकार द्वारा मानवीय अधिकारों की अवहेलना तथा कानूनों के दुरुपयोग विशेषकर यू.ए.पी.ए. तथा राजद्रोह पर उच्चतम न्यायालय आंख मूंदे हुई थी। दुर्भाग्यवश अंतिम चार मु य न्यायाधीश मानवीय अधिकारों के मूल मुद्दे को विस्तृत रूप से नहीं देख पाए। हालांकि उन्होंने कुछ मुद्दों से चुनिंदा तरीके से निपटा।  

उम्मीद की रोशनी की किरण अब दिखने लगी है जोकि वर्तमान भारत के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमन्ना ने दिखाई है। इससे पहले भी उन्होंने मानवीय अधिकारों की अवहेलना के खिलाफ आवाज उठाई थी तथा इसके अलावा रमन्ना ने तुच्छ मामलों पर लोगों की स्वतंत्रता को छीनने की बात पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी। हालांकि वे पूरी तरह इन मुद्दों को उठाने में कामयाब नहीं रहे क्योंकि उनके पूर्ववर्तियों ने इन मामलों को लेकर अनभिज्ञता जताई। 

रमन्ना के नेतृत्व वाली एक पीठ ने अब धारा 124 ए आई.पी.सी. जोकि राजद्रोह के कानून के साथ निपटती है, की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका को सुनना स्वीकार किया था। इस पीठ में जस्ट्सि ए.एस. बोपन्ना तथा ऋषिकेश राय भी शामिल हैं। उन्होंने निर्देश दिया है कि याचिका की एक प्रति भारत के अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल को भेजी जाए। आजादी को दबाने के लिए सरकार द्वारा राजद्रोह कानून का इस्तेमाल किया जाता है। मुख्य न्यायाधीश ने पूछा है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तथा बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ इस्तेमाल किया गया उपनिवेशक कानून आजादी के 75 वर्षों के बाद भी कानून की किताब में जिंदा क्यों है? 

मुख्य न्यायाधीश रमन्ना ने कहा कि सरकार द्वारा राजद्रोह कानून का दुरुपयोग आमतौर पर किया जाता है। उन्होंने कहा कि, ‘‘राजद्रोह का इस्तेमाल उसी तरह है जैसे एक तरखान को लकड़ी का टुकड़ा काटने के लिए आरा दिया जाता है और वह पूरे जंगल को काटने के लिए इसका इस्तेमाल करता है।’’ रमन्ना ने आगे कहा कि, ‘‘अदालत में यह एक असामान्य रूप से कठोर स्वर है।’’

राजद्रोह कानून को लेकर केंद्र तथा राज्य सरकार के प्रति उठ रही सार्वजनिक आलोचना को लेकर मु य न्यायाधीश की यह व्या या आई है। सरकार राजद्रोह का इस्तेमाल मतभेद को दबाने, अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने तथा जेलों में भेजे गए कार्यकत्र्ता, पत्रकार, छात्र तथा सिविल सोसायटी के सदस्यों के खिलाफ करती है। 16 जुलाई को पीपल्ज यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज द्वारा दायर याचिका सहित राजद्रोह कानून के दुरुपयोग को उजागर करने वाली कई याचिकाएं दायर की गई हैं। आशा है कि अब इन सबकी सुनवाई होगी। 

हाल ही में उच्चतम न्यायालय के एक और न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ जो अपने कार्य के लिए बेहद प्रशंसनीय हैं, ने भी कहा था कि आतंक विरोधी विधेयक सहित आपराधिक कानूनों का इस्तेमाल मतभेद को दबाने तथा नागरिकों के उत्पीडऩ के लिए नहीं किया जाना चाहिए। न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने यह भी कहा था कि संविधान की संरक्षक कहलाने वाली न्यायपालिका को उन कदमों पर ब्रेक लगानी चाहिए जो कार्यकारी  तथा विधायी कार्य द्वारा मौलिक मानवीय अधिकारों के उल्लंघन करने के लिए आगे बढ़ाए जाते हैं। 

कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों सहित पूर्व की सरकारों द्वारा भी ऐसे कानूनों का दुरुपयोग किया गया है। ऐसे कानूनों का इस्तेमाल आलोचना को दबाने के लिए किया जाता रहा है मगर मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से इनमें बढ़ौतरी हुई है। 2019 के लिए आपराधिक सांख्यिकी पर नैशनल क्राइम रिकाडर््स ब्यूरो की रिपोर्ट से प्राप्त आधिकारिक आंकड़ों ने उस तथ्य की पुष्टि की है कि इन कानूनों के तहत लोगों पर दर्ज किए जाने वाले मामलों में तेजी से वृद्धि हुई है।

2019 में राजद्रोह के 93 मामले दर्ज हुए जोकि 2016 के मुकाबले बहुत ज्यादा हैं। 2016 में इनकी गिनती 35 थी जबकि वर्तमान आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। ऐसे कानूनों को लागू करने की अनेकों हालिया मिसालें हैं। पिछले वर्ष राजद्रोह के लिए 49 प्रख्यात व्यक्तियों के खिलाफ मामले चलाए गए। इनमें इतिहासकार रामचंद्र गुहा, अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा तथा फिल्म निर्माता मणिरत्नम तथा अपर्णा सेन भी शामिल हैं। 

राजद्रोह के मामले में एक 22 वर्षीय युवती को गिर तार किया गया था और इस कानून का इस्तेमाल अग्रणी पत्रकार आनंत शाह, राजदीप सरदेसाई तथा मृणाल पांडे सहित वरिष्ठ कांग्रेसी नेता शशि थरूर के खिलाफ भी किया गया था। इसकी हालिया मिसाल एक रोमन कैथोलिक पादरी तथा मानवीय अधिकार कार्यकत्र्ता स्टेन स्वामी की हिरासत में हुई मौत भी है। इस कारण मुख्न्य न्यायाधीश रमन्ना द्वारा उठाए गए पग सराहनीय हैं तथा स्वागत योग्य हैं। भारत की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसे कानूनों पर एक अंतिम निर्णय का इंतजार आजादी के सभी प्रेमी उत्सुकता से कर रहे हैं।-विपिन पब्बी
 


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Content Writer

Pardeep

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