नक्सलवाद से मुक्ति लेकिन उसके शुरुआती कारण अभी मौजूद

punjabkesari.in Saturday, Apr 04, 2026 - 02:49 AM (IST)

नक्सल शब्द का इस्तेमाल अक्सर उनके लिए किया जाता रहा है, जो विदेशी सोच के साथ तालमेल रखकर किसी भी तरह की असमानता को खत्म करने के लिए हथियार उठाने का आह्वान करते हैं। प्रश्न यह नहीं कि नक्सलवाद समाप्त हो गया तो इसके लिए जश्न जैसा कोई आयोजन हो और सरकार की उपलब्धियों पर गर्व हो, बल्कि यह है कि क्या प्रशासन अपने रवैये से उस सोच को जड़ से समाप्त करने में सफल हुआ या होता दिख रहा है, जो विदेशों, विशेषकर उन देशों से, जिनका हमारी संस्कृति, सभ्यता और गौरवशाली विरासत से कोई तालमेल ही नहीं है, वहां से आयातित होती रही है।

कुछ हकीकत, कुछ अफसाना : कुछ तो होगा कि आजादी के 20 वर्ष बाद 2 युवकों चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने एक बड़े प्रदेश के छोटे से अंचल नक्सलबाड़ी में हथियार के बल पर क्रांति करनी चाही। यह किसके विरुद्ध था, यह समझना आसान है क्योंकि आज भी देश में अनेक स्थानों पर उसी तरह के हालात हैं, जैसे तब थे। जो समाज परंपरागत रूप से गरीब की मेहनत और अस्मत पर अपना एकाधिकार समझता रहा हो, उसके खिलाफ विद्रोह करने और शोषित की आवाज उठाने का संकल्प उन्होंने लिया। तर्क था कि हर जोर-जुल्म से टक्कर लेने के लिए बगावत ही नही, उसके प्रतिशोध के लिए पलटवार जरूरी है। 

एक जिले से निकलकर देश के उन सभी प्रदेशों में इसकी पैठ बनती गई, जो शोषण की कहानियों से भरे थे। व्यवस्था के प्रति भरोसा और हुक्मरानों के प्रति विश्वास का नामोनिशान न रहा। सरकार ने भी अपनी दमनकारी नीतियों से इस तेजी से उभर रहे वंचित और शोषित समाज को किसी भी तरह से कुचलने का काम किया। देखा जाए तो जो लोग आंदोलन कर रहे थे, वे सिवाय इसके और कुछ नहीं चाहते थे कि उनकी बात सुनी जाए, उन पर जो जुल्म हो रहा है, रोका जाए, उनकी बेरोजगारी की समस्या का हल निकाला जाए और सबसे बड़ी बात कि उनके लिए शैक्षणिक व्यवस्था और रहने को पर्याप्त सुविधाओं सहित आवास मुहैया कराए जाएं क्योंकि उनकी जमीन का अधिग्रहण कर उन्हें केवल आश्वासन के भरोसे छोड़ दिया गया था। हठधर्मी ही सरकार की कार्यशैली: यह बहुत बाद में समझ आया कि आदिवासी क्षेत्रों की समस्याएं सामान्य प्रदेशों जैसी नहीं होतीं, इसलिए उनका निदान भी एक ही लकड़ी से हांकने की तरह नहीं हो सकता। उन्हें अपने रीति-रिवाजों और पारिवारिक मूल्यों के साथ जीने की आजादी चाहिए होती है। उनकी स्त्रियों को दबंगों की गंदी मानसिकता का शिकार न होने देने से होती है। उनके लिए भी सड़क और आवागमन के साधन उपलब्ध किए जाने से होती है। उनके त्यौहारों पर लोगों को समुचित सुविधाएं उपलब्ध कराने से होती है ताकि वे उन्हें आसानी से मना सकें। 

सरकारों ने अपनी विकास परियोजनाओं के नाम पर उनसे जल, जमीन और उनके जीवन की मूलभूत संरचना जंगल छीन कर उन्हें बाहर निकाल दिया था। निर्वासित होने के दर्द में जीने की घुटन भी शामिल थी। जरा सोचिए कि उनके जल संसाधनों, खनिज संपदा से भरपूर भूमि और वन्य प्राणियों से गुंजायमान प्रदेशों को बलपूर्वक हथिया लेंगे तो वे अपनी रक्षा के लिए हथियार भी न उठाएं, यह कैसे संभव है? असंतोष अपनी सीमा पार करने लगता है और उसके उग्र होने से आतंकवाद या उग्रवाद से ग्रसित होना मान लिया जाता है। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि जिन स्थानों पर शिक्षक, डॉक्टर, न्यायविद और स्वास्थ्य केंद्र होने चाहिएं, वहां पुलिस और सुरक्षाबल ही तैनात रहते हैं। इससे जो भय और असुरक्षा का वातावरण बनता है, उसके कारण स्थायी रूप से कभी शांति स्थापित हो ही नहीं सकती। यही कारण है कि किसी क्षेत्र में दबाव कम होते ही फिर से पहले जैसी गतिविधियां शुरू हो जाती हैं।

यह कहना कि अब नक्सलवाद नहीं रहा, अपने आप में एक भ्रामक तथ्य है। इसलिए इसकी समाप्ति की घोषणा भी वास्तविकता से कोसों दूर है। जो लोग इन क्षेत्रों में, जहां आदिवासी रहते हैं, कभी गए हैं तो उन्हें अवश्य यह अनुभव हुआ होगा कि इनका रहन-सहन, खानपान और दिनचर्या बिल्कुल अलग है और जब ऐसा है तो उनकी जरूरतें भी अलग हैं लेकिन इस बात को समझे बिना और उन्हें अपनी बात डंडे के जोर से मनवाने की नीति पर चलते हुए उनसे यह अपेक्षा रखना कि वे आपका साथ देंगे, गलतफहमी है। महाश्वेता देवी का उपन्यास और उस पर बनी फिल्म से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह केवल कुछ लोगों का जीवन नहीं, बल्कि एक प्रबुद्ध समाज की कहानी है, जिसमें शोषण से मुक्ति की दास्तान सुनाई देती है। चीन में भी माओवाद कोई विद्रोही आंदोलन नहीं था जो किसी को सत्ता से उखाडऩे के लिए किया गया हो। यह विशेषकर महिलाओं को घर की चारदीवारी में रहकर उनके साथ हो रहे घिनौने व्यवहार का प्रतिकार करने का प्रयास था। भारत में आज भी महिलाओं को उनके अधिकार कहां मिले हैं, उनके साथ हो रहे अपराधों पर चुप्पी साध ली जाती है और संसद में महिलाओं के आरक्षण का प्रस्ताव आज तक अधूरा है।

मुख्यधारा में शामिल कीजिए : भारत एक लोकतांत्रिक देश है, इसलिए यहां चीन जैसा नियंत्रण संभव नहीं। अक्सर हमारा लोकतंत्र हमारे लिए एक चुनौती बन जाता है। हम असंतोष को हिंसा से दबा नहीं सकते। उसके लिए उसकी जड़ पर प्रहार करना होता है, जो जीवन की सभी सामान्य सुविधाओं का प्रत्येक नागरिक के लिए समान रूप से उपलब्ध किया जाना है। यह संभव नहीं कि किसी के पास इतना कि विलासिता कहलाए और किसी के लिए दो समय का भोजन भी न हो और उसे परिवार सहित आत्महत्या करनी पड़े। जो समझते हैं कि हिंसक होने को क्रांति मान लिया जाएगा तो वह भी मुगालते में जीने जैसा है। मतलब यह है कि विकास का जो भी मॉडल हो, उसका सामाजिक न्याय और स्थानीय भागीदारी पर आधारित होना अनिवार्य है।-पूरन चंद सरीन 


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