इस अत्यंत कठिन दौर में भी सच के बीज लगातार अंकुरित हो रहे

punjabkesari.in Thursday, Aug 20, 2026 - 05:29 AM (IST)

सच -झूठ, अमीरी-गरीबी, उसूलपरस्ती और बेउसूली के दरमियान युद्ध युगों-युगों से जारी है। मानवीय इतिहास के समूचे कैनवस पर नजर मारने से यह भी स्पष्ट पता लग जाता है कि अनेकों सामयिक हारों और पिछडऩे के बावजूद इतिहास का पहिया हमेशा आगे की ओर ही बढ़ता रहा है। यह भी सच है कि हुक्मरानों ने सत्ता-विरोधी आवाजों को सदा ही जुल्म-ज्यादती से दबाना चाहा है। परंतु हक-सच के लिए लड़े जाने वाले युद्ध की महानता जब लोगों की सोच का स्थायी हिस्सा बन जाती है, तो अवाम हर कठिनाई और मुसीबत का सामना करते हुए सच की जीत का डंका बजाकर नया इतिहास रचने का कार्य सिरे चढ़ाती आ रही है।

ऐसी ही स्थिति आजकल भारत की राजनीति और सामाजिक घटनाक्रमों में भी बनी हुई है। साल 2014 में अपनी कठपुतली भाजपा के नेतृत्व वाली मोदी सरकार के जरिए देश की केंद्रीय सत्ता पर काबिज होने के बाद आर.एस.एस. ने भारत को तानाशाही तर्ज का, धर्म आधारित, रूढि़वादी ‘हिंदुत्व’ राष्ट्र बनाने का अपना एक सदी पुराना लक्ष्य साकार करने के लिए हर हथकंडा अपनाया है। भारतीय सत्ता के सभी अंगों, विशेषकर पुलिस और नौकरशाही यानी कार्यपालिका, न्यायपालिका, सेना और अर्धसैनिक बलों आदि का बड़ा हिस्सा आर.एस.एस. ने काबू कर लिया है।

देश के ज्यादातर जज और आला अधिकारी संघ के इस अनुचित कार्य में इसका पूरा-पूरा हाथ बंटा रहे हैं। मीडिया, विशेषकर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया का बड़ा हिस्सा, सरकारों से सवाल करने वाले ‘पहरेदार’ की अपनी भूमिका को त्यागकर आज के हुक्मरानों का ‘पालतू’ बन गया है। प्रतिष्ठित संवैधानिक संस्थाओं पर आर.एस.एस. के समर्थक बिठा दिए गए हैं। देश के इतिहास और शैक्षणिक पाठ्यक्रम का आर.एस.एस. की विचारधारा और उद्देश्य के अनुकूल पुनर्लेखन किया जा रहा है। कला और संस्कृति को भगवा रंग चढ़ाने के हर-संभव प्रयास किए जा रहे हैं। सड़कों, रेलवे स्टेशनों, शहरों और ऐतिहासिक स्मारकों के नाम बदलकर इन्हें सांप्रदायिक रंगत दी जा रही है। यहां तक कि भारतीय हॉकी टीम की वर्दी का नीला रंग भी हॉकी फैडरेशन के अध्यक्ष और खिलाडिय़ों की सलाह लिए बिना ही भगवा कर दिया गया है। 

स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अब तक कानूनी दायरे में रहकर काफी हद तक निष्पक्षता से काम करती आ रही एजैंसियां और स्वायत्त लोकतांत्रिक संस्थाएं देश के संविधान का खुलेआम उल्लंघन करते हुए, आज अपनी जिम्मेदारी संघी हुक्मरानों के इशारे पर पूरी तरह से पक्षपाती ढंग से निभा रही हैं। सरकारी मशीनरी, विपक्षी दल को दबाने और तंग-परेशान करने का कोई मौका नहीं छोड़ती। रही-सही कसर भारत के चुनाव आयोग, जिसकी ‘निष्पक्षता’ पर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था टिकी हुई है, ने पूरी कर दी है।  याद रहे ई.सी.आई. पूरी तरह से भाजपा की झोली में जा चुका है। इसने एस.आई.आर. के जरिए लाखों जायज मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए हैं। चुनाव आयोग ने संवैधानिक मर्यादा और लोकतांत्रिक मान्यताओं की धज्जियां उड़ाकर बेशुमार धन और धर्म के अंधाधुंध दुरुपयोग द्वारा और गुंडागर्दी की सहायता से हर हाल में चुनाव जीते जाने के भाजपा के ‘फॉर्मूले’ को ‘कानूनी मान्यता’ दे दी है। 

परंतु इतिहास के इस अत्यंत कठिन दौर में भी सच के बीज लगातार अंकुरित हो रहे हैं। सत्ता का विरोध करने की सजा के तौर पर जेलों, पुलिस के अत्याचारों, झूठे मुकद्दमों सहित हर तरह का डर लोगों के मन से दिन-प्रतिदिन पूरी तरह गायब होता जा रहा है। इसकी पहली मिसाल तब सामने आई थी, जब संसद सदस्य एम.जे. अकबर को एक सैक्स स्कैंडल में फंसे होने के कारण जन-दबाव के तहत इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद पंजाब के किसानों द्वारा शुरू किए गए आंदोलन से हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी यू.पी. और देश के अन्य हिस्सों के किसानों ने अपना नाता जोड़कर, मोदी सरकार द्वारा लाए गए कृषि से संबंधित 3 काले कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर एक साल से अधिक समय तक लगातार शांतिपूर्ण मोर्चा संभाले रखा था। इस अनुशासित आंदोलन को देश-विदेश से मिले अभूतपूर्व जन-समर्थन का तो कभी किसी ने अंदाजा भी नहीं लगाया होगा! सरकारी दमन और साजिशों के परिणामस्वरूप तथा मोर्चों पर प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण महिलाओं सहित 750 से अधिक मजदूर-किसान शहीद हुए थे। 

इसी साल जून में पेपर लीक घोटाले के मुख्य आरोपी देश के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर हफ्तों तक लड़ा गया जन आंदोलन देश के जागरूक युवाओं की सक्रिय भागीदारी और दृढ़ नेतृत्व की बदौलत उपरोक्त संघर्षों का चरम ङ्क्षबदू साबित हुआ। जंतर-मंतर के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी लाखों युवाओं-छात्रों ने सरकार विरोधी प्रदर्शन किए और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की थी। दिल्ली में इस आंदोलन में शामिल लोगों को पैलेट गनों के कहर का निशाना बनाया गया, जिससे कुछ की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए छिन जाने का खतरा पैदा हो गया है। बिहार में पुलिस बल द्वारा भीड़ को तितर-बितर करने के लिए ए.के.-47 का भी इस्तेमाल किया गया। 

इस आंदोलन के विजयी बिगुल की आवाज तब दुनिया भर के लोगों के कानों तक पहुंची, जब आंदोलनकारियों के प्रतिनिधियों और सरकार के बीच हुए समझौते के तहत धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया। साथ ही आंदोलनकारियों पर बनाए गए झूठे केस वापस लेने और शिक्षा प्रणाली में कड़े सुधार करने पर भी सहमति बनी थी। अफसोस, मोदी सरकार की खुफिया एजैंसियां और दिल्ली पुलिस आंदोलन में कूदे युवाओं-छात्रों को विभिन्न तरीकों से परेशान करने तथा गिरफ्तारियों व फर्जी मुकद्दमों का दमन-चक्र अभी भी जारी रखे हुए हैं। संतोष की बात यह है कि केंद्र सरकार के इन दमनकारी कदमों का आम लोग देश भर में डटकर विरोध कर रहे हैं।

यह जीत अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ रहे आम लोगों और मोदी सरकार के साम्राज्यवादियों के आगे घुटने टेकने वाले रवैये व उसकी सांप्रदायिक-फासीवादी नीतियों के खिलाफ पूरे देश में संघर्ष कर रही सशक्त ताकतों को राह दिखाने वाली ऐसी ‘जलती मशाल’ बन गई है, जिसकी रोशनी चारों दिशाओं में फैल गई है। भविष्य में इसके निश्चित रूप से और भी सार्थक परिणाम सामने आएंगे। इससे देश को साम्राज्यवाद की ‘नव-औपनिवेशिक’ गुलामी के जुए में जकडऩे के संघ-भाजपा और शासक वर्गों के हर हथकंडे को मात देने का माहौल भी तैयार हुआ है।-मंगत राम पासला


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