गड़बड़ाता लिंगानुपात : उभरती समस्याएं
punjabkesari.in Sunday, Aug 30, 2026 - 02:44 AM (IST)
भारतीय समाज में सदियों तक व्याप्त रहा कन्या भ्रूण-हत्या का प्रचलन वर्तमान में एक चिंताजनक समस्या बन कर उभर रहा है। विशेषकर, पंजाब के अनेक गावों में 30 साल पार कर चुके अनेक युवकों को दुल्हनें नहीं मिल पा रहीं। विदेश पलायन के प्रति बढ़ता रुझान हालांकि एक कारण माना जा सकता है, किंतु इसमें प्रमुख वजह है असंतुलित लिंगानुपात। 1990 के दशक के बाद अल्ट्रासाऊंड तकनीक का बड़े पैमाने पर अनुचित इस्तेमाल होने से लड़कियों की संख्या में काफी गिरावट आई। विगत वर्षों के दौरान परंपरागत सोच में परिवर्तन आया तो है, मगर इतना नहीं कि बेटियों को गर्भ में मारने की प्रथा पूर्णत: समाप्त हो पाए। कड़े कानूनी प्रतिबंधों तथा भ्रूण-हत्या विरोधी प्रचार-प्रसार के बावजूद देश में लिंग जांच एवं गर्भपात का सिलसिला बदस्तूर जारी है।
गत दिनों राज्यसभा में प्रदत्त जानकारी के अनुसार, 2025 के दौरान देश भर में लिंग जांच के कुल 83 मामले दर्ज किए गए। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की शुरूआत करने वाला प्रांत भी इसमें अपवाद नहीं, ऐसे 64 मामले अकेले हरियाणा से संबद्ध हैं, जोकि कुल मामलों का 77 प्रतिशत हैं, यानी 2025 में हर छठे दिन लिंग जांच का एक रैकेट पकड़ा गया। विगत 3 वर्षों (2023-2025) में यहां भ्रूण के लिंग की जानकारी देने संबंधी 106 मामले दर्ज किए गए। किसी भी राज्य के लिए सर्वाधिक संख्या होने के साथ, यह देश भर में दर्ज कुल 184 मामलों का 57.6 प्रतिशत बनता है। पिछले 3 सालों में दर्ज 28 मामलों सहित गुजरात दूसरे स्थान पर आता है, जबकि 11 मामले दर्ज करने वाला राजस्थान तीसरे नंबर पर है। हरियाणा सरकार के अनुसार जनवरी, 2024 तथा मार्च, 2026 के बीच राज्य ने लिंग जांच टैस्ट के खिलाफ 84 छापे मारे, जिनमें उत्तर प्रदेश में किए गए 37 ऑप्रेशन भी शामिल हैं।
नैशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक, 2022 से 2024 के बीच हरियाणा में कन्या भ्रूण हत्या के 19 मामले उजागर हुए, राष्ट्रीय स्तर पर यह चौथा सबसे खराब आंकड़ा है। छत्तीसगढ़ में सबसे अधिक मामले (41) दर्ज किए गए। मध्य प्रदेश में 31 तथा महाराष्ट्र में 28 मामले प्रकाश में आए। पंजाब में ज्ञात मामलों की संख्या 12 रही। भारत में ‘गर्भधारण पूर्व और प्रसव निदान तकनीक अधिनियम’ के तहत लिंग परीक्षण पूर्णत: गैर-कानूनी तथा दंडनीय अपराध है, बावजूद इसके आज भी बड़े स्तर पर इस अमानवीय कृत्य को बेखौफ अंजाम दिया जाता है। पोर्टेबल अल्ट्रासाऊंड मशीनों जैसी नई तकनीकों के दुरुपयोग ने स्थिति अपेक्षाकृत शोचनीय बना डाली। अवैध परीक्षण पारंपरिक क्लीनिकों के बजाय किराए के कमरों अथवा मोबाइल गाडिय़ों में किया जाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। कई चिकित्सक लिंग परीक्षण तथा गर्भपात एक साथ उपलब्ध कराने का अवैध गोरखधंधा चला रहे हैं।
विभिन्न अध्ययनों तथा रिपोट्स के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष लगभग 5 लाख लड़कियां भ्रूण हत्या की शिकार होती हैं। केंद्र सरकार के आंकड़ों पर आधारित प्यू रिसर्च सैंटर का एक शोध वर्ष 2000-2019 में कम से कम 9 मिलियन महिलाओं के भ्रूण-हत्या का संकेत देता है। विश्व के अधिकतर देशों में 100 पुरुषों के पीछे लगभग 105 स्त्रियों का जन्म होता है, जबकि भारत की जनसंख्या में प्रति 100 पुरुषों के पीछे 93 से कम स्त्रियां हैं। संयुक्त राष्ट्र के कथनानुसार, भारत में अवैध रूप से अनुमानत: प्रतिदिन 2,000 अजन्मी कन्याओं का वध किया जाता है। भ्रूण हत्या जैसी कुप्रथाएं दरअसल उन क्षेत्रों में बलवती होती हैं, जहां सांस्कृतिक मूल्य नर को नारी की तुलना में अधिक महत्व देते हैं। वंशबेल बढ़ाने तथा वृद्धावस्था में संबल की चाह पुत्रमोह में प्रमुख कारण है।
भारतीय समाज में आमतौर पर पुरुषों को उत्पादक एवं परिवार के लिए योगदान देने वाला माना जाता है। आज भी बहुतेरे लोगों के विचार में, पुत्र के हाथों मुखाग्नि मिले बगैर सद्गति मिलनी संभव नहीं! बेटियों को आॢथक-सामाजिक बोझ मानने में दहेज-प्रथा एवं असामाजिक वातावरण मुख्य कारक हैं। कानूनन निषेध होने पर भी हमारा समाज दहेज के कोढ़ से मुक्त नहीं हो पाया। बेटी की सुरक्षा के मद्देनजर कुलबुलाते संशय, किशोरवय नादानी के बहाव में सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल होने का भय, जन्म लेते ही दहेज जुटाने की ङ्क्षचता आदि से ग्रसित सोच, उचित-अनुचित विचारे बिना गर्भपात को छुटकारे का एकमात्र उपाय समझने लगती है।
प्यू रिसर्च सैंटर के शोध तथा सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले 2 दशकों में लाखों की तादाद में कन्या भ्रूण हत्याएं होने से देश के कई हिस्सों में लिंगानुपात प्रभावित हुआ है, जिसके दुष्परिणाम भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। लड़कियों का अनुपात घटने के कारण विवाह योग्य युवकों के लिए दुल्हन तलाशना मुश्किल हो गया है, दूरस्थ राज्यों से दुल्हनों की ‘खरीद-फरोख्त’ बढ़ी है, ‘लुटेरी दुल्हनों’ के गिरोह सक्रिय हो रहे हैं।
यद्यपि केंद्र तथा अनेक राज्य सरकारों ने बेटियों के हितार्थ अनेक योजनाएं चलाई हैं, तथापि मौजूदा स्थिति अधिक कठोर क्रियान्वयन की आवश्यकता दर्शाती है। प्रत्येक दोषी की धर-पकड़ के साथ, कड़ा दंड भी सुनिश्चित होना चाहिए। व्यापक दृष्टिकोण कुरीतियों के शमन में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। तकनीकी प्रगति में ‘जगत-कल्याण’ की भावना निहित है, इसका प्राणघातक उपयोग सृष्टि में असंतुलन पैदा सकता है, जोकि कुदरती नियमों के सर्वथा विरुद्ध होगा। बेटियां कोख में दफन करने की बजाय क्यों न रूढि़वादी सोच तथा तमाम सामाजिक बुराइयों को दफनाया जाए, जो कन्या-वध में मूल कारण बनती रही हैं? बेटियां हों या बेटे, ‘जीवन का अधिकार’ सभी को मिलना चाहिए। पशु-पक्षी नर-मादा के तौर पर संतान से कतई भेदभाव नहीं करते, तो क्या ‘मनुष्य’ उनसे भी गया-गुजरा है?-दीपिका अरोड़ा
