लोकतंत्र पर हावी चुनावतंत्र
punjabkesari.in Wednesday, Apr 29, 2026 - 04:18 AM (IST)
यह आलेख लिखे जाने तक बंगाल के अंतिम चरण का चुनाव प्रचार रुक चुका है। चुनाव हर बार ज्यादा दिलचस्पी जगाते हैं, उनके नतीजों का असर सामान्य दिखने की तुलना में ज्यादा गहरा होता है लेकिन बंगाल का इस बार का चुनाव पड़ोस के असम या साथ चुनाव में उतरे तमिलनाडु और केरल से कहीं ज्यादा दूरगामी असर वाला है, इसकी विकृतियां ज्यादा बड़ी हैं। यह सब कहने का मतलब यही है कि बंगाल चुनाव के नतीजों के बाद वहां जो कोई सत्ता में आए या केंद्र में बैठे बड़े लोग हों, सबको बहुत ठंडे मन से चुनाव के पूरे क्रम और अपने कामों पर भी गंभीरता से सोचना होगा और चीजें सुधारने की तरफ कदम बढ़ाने होंगे। लेकिन यह भी लगता है कि अगर एक दशक तक गंभीरता से काम हो, तब शायद सुधार हो पाएगा। इसमें लोगों की मुस्तैदी भी जरूरी है। लेकिन आज चुनाव ऐसा बन चुका है कि चीजें कहां से संचालित होती हैं, कहना मुश्किल है और लोगों के पास एक बटन दबाने में विवेक दिखाने के अलावा ज्यादा कुछ बचा नहीं है। शायद उससे ही चमत्कार हो जाए।
चुनावी खर्च मुद्दा नहीं रह गया है और बंगाल चुनाव में भी ज्यादा बड़ा मुद्दा हो, लगा नहीं। अदने से विधायक हुमायूं कबीर को हजार करोड़ रुपए देने की पेशकश और उनका कबूलनामा भी मुद्दा नहीं बन पाए। बाकी कितना पैसा पकड़ा गया, कितनी शराब जब्त हुई, टाइप सूचनाओं से तो अब खर्च का हिसाब नहीं लगता। सभी दलों के मंडराते दर्जनों हैलीकाप्टर या चार्टर्ड विमानों का चुनावों पर कितना खर्च आया होगा, यह सोचा जा सकता है। हां इस बार बंगाल में बाहर से बड़े पैमाने पर दूसरे राज्यों में गए वोटर ढोकर लाए गए, उसकी चर्चा जरूर हुई। पर हिंसा के मामले में तृणमूल कमजोर पड़ी हो, यह कहना मुश्किल है। भाजपा ने अपने भर प्रयास किया। और चाहे केन्द्रीय बलों की ताकत से हो या जैसे भी, लेकिन चुनाव अगर हिंसा से मुक्त हों, या इस बार पहले की तुलना में कम हिंसा हुई हो तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। टिकट बाहुबलियों को दिए गए। यह क्या है और इसके पीछे की मंशा क्या है, यह समझना आसान नहीं है। पर बंगाल चुनाव में हिंसा की परंपरा बनाने में वाम दलों की भी भूमिका रही है। और अगर कभी बिहार के चुनाव हिंसा के लिए बदनाम थे तो आज वह बदल चुका है। लेकिन बंगाल में चुनाव देश भर में सबसे ज्यादा हिंसक क्यों हैं, इस पर ममता बनर्जी और अधीर रंजन चौधरी को भी सोचना होगा।
इस बार बंगाल चुनाव मतदाता सूची के विशेष संशोधन अभियान को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा में रहा और आखिरी दिन तक अदालती आदेश से वोट का हक पाने की उम्मीद लगाए लाखों वोटर मायूस हुए। योगेंद्र यादव का कहना है कि अक्तूबर 2025 को, अर्थात इस अभियान के शुरू होने से पहले राज्य की वयस्क आबादी 7.67 करोड़ थी और राज्य में मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़। साफ है कि यहां ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं थी। लेकिन चुनाव आयोग ने पहले 58 लाख नाम काटे और फिर 60 लाख नामों पर ‘लाजिकल डिस्क्रिपैंसी’ का लाल झंडा गाड़ दिया गया। इनमें से ज्यादातर वोट के अधिकार से वंचित हुए।
किस-किस तरह की गलतियां सामने आईं, यह गिनवाना बहुत होगा लेकिन जब लोग कलैक्टर को घेरने तक पहुंच गए, तब भी मामले को एकतरफा रखा गया। अदालती दखल भी चुनाव आयोग की तरफ झुका था। और जब इसी क्रम में ई.डी. के इस्तेमाल और सीधे मुख्यमंत्री द्वारा हंगामा करने का मामला सामने आया तो फिर इस सारे शुद्धिकरण अभियान की गंदगी जिसे न दिखी हो, वही अंधा कहलाएगा। हर राज्य में नामों में कतर-ब्योंत हुई, लेकिन बंगाल की तरह कहीं नहीं हुई। और यही कारण रहा कि ममता शासन के 15 साल का रिकार्ड और उससे पैदा नाराजगी के मुख्य चुनावी मुद्दा बनने की जगह मतदाता सूची का शुद्धिकरण ही मुख्य मुद्दा बन गया। पता नहीं इससे ममता को लाभ होगा या भाजपा की मंशा इस बार पूरी हो जाएगी, यह 4 मई को साफ होगा।
बंगाल जीतने की तमन्ना भाजपा के नेताओं के अंदर इस कदर हावी रही है कि उन्होंने सब कुछ किया और ममता बनर्जी ने भी जवाब देने में कमी नहीं की। इससे पहले चुनाव में मातुआ के नाम पर बंगाल के शांत समाज में जाति की फूट पैदा करने की कोशिश हुई तो उससे पहले हिन्दू-मुसलमान ध्रुवीकरण का प्रयास हुआ। इन दोनों से नुकसान हुआ और अभी तक उसका असर है। लेकिन इस बार संसाधनों की बर्बादी और हिंसा के साथ एस.आई.आर. के नाम पर जो हुआ, वह लोकतंत्र पर तो कहीं भारी नहीं है। नाम काटना सिर्फ किरानीगीरी वाली भूल नहीं है। और जो यह कर-करा रहे हैं, उनको यह सब मालूम है। फिर भी यह हो रहा था, यही सबसे दुखद है। काश चुनाव के बाद चीजें सुधरें।-अरविंद मोहन
