शिक्षा नीति: बेरहम सिस्टम और कितनों की जान लेगा?
punjabkesari.in Saturday, Aug 01, 2026 - 03:59 AM (IST)
कोई भी परीक्षा होती है, तो देश छात्र-छात्राओं को एक ही संदेश देता है—"मेहनत करो, ईमानदारी से परीक्षा दो, तुम्हारा भविष्य सुरक्षित है।'' लेकिन 2026 में उन्होंने पहली बार एक अलग सवाल पूछा—क्या हमारी मेहनत सच में सफल हुई थी क्योंकि सिर्फ एक प्रश्नपत्र लीक नहीं हुआ था, उस दिन लाखों का भरोसा टूटा था। जांच, गिरफ्तारियां, परीक्षा रद्द, दोबारा हुई, विरोध प्रदर्शन, संसदीय बहस, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, नया कानून और देश आगे बढ़ गया...लेकिन कुछ घर ऐसे थे, जहां समय वहीं रुक गया।
ऋतिक मिश्रा, अंशिका पांडेय, समीक्षा दीपक पवार, अंकिता सांग, सना और न जाने कितने ऐसे नाम, जो शायद कभी इतिहास की किताबों में बड़े अक्षरों में नहीं लिखे जाएंगे। उनके सपने दफन हुए। कुछ घरों में आज भी किताबें वहीं खुली रखी हैं, उन्हें पढऩे वाले लौटकर नहीं आए। तैयारी में परिवार का संघर्ष, पिता की जमा पूंजी, मां की अधूरी इच्छाएं, बेची जमीन, लिया कर्ज, छूटे त्यौहार, रुकी हुई खुशियां और एक उम्मीद— ''इस बार सब ठीक हो जाएगा।ज्ज् लेकिन कुछ नहीं बदलता। बच्चों को बताया कि डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनना है... लेकिन नहीं सिखाया कि मंजिल थोड़ी देर से मिले, तो जिंदगी वहीं खत्म नहीं होती। एक पिता ने कहा — ''इसे किसी ने नहीं मारा...परीक्षा के डर ने मार दिया।ज्ज् बच्चों को रोज थोड़ा-थोड़ा टूटते देख रहे थे। सबसे बड़ा सवाल कि क्या जिम्मेदार सिर्फ वह है जिसने प्रश्नपत्र लीक किया? क्या हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल नहीं है ? अगर भविष्य इसी परीक्षा पर निर्भर है...यह भी पूछा जाना चाहिए था—बच्चे मानसिक रूप से दोबारा परीक्षा देने की स्थिति में हैं भी ! अपराध होने के बाद जागना कुंभकर्णी नींद है। हर बार सजा की बात पहले, सुरक्षा भाड़ झोंकने चली जाती है।
सिंगापुर में परीक्षा प्रक्रिया में एक मछली सिस्टम को गंदा नहीं कर सकती। जापान में हर स्तर पर जवाबदेही तय होती है। दक्षिण कोरिया में प्रवेश परीक्षा का राष्ट्रीय महत्व और गलती की संभावना कतई नहीं। फिनलैंड की ताकत उसकी परीक्षा प्रणाली और संस्थानों पर भरोसा और छात्र निश्चिंत कि प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष है। यूनाइटेड किंगडम में परीक्षा बोर्ड सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा करते हैं। अमरीका सहित कोई भी विकसित देश इसे हल्के में नहीं लेता। तकनीक बदलती है, तो सुरक्षा भी। एक देश में तो परीक्षा की तैयारी ऐसे होती है जैसे देश का बजट बनता है। कुछ माह तक इससे जुड़ा व्यक्ति न घर जा सकता है, न किसी से बाहर बात कर सकता है और परिणाम आने तक वहीं रहता है। सवाल यह है कि भारत इन देशों जैसा क्यों नहीं है जबकि डिजिटल पेमैंट, अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक में दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है तो इसमें पीछे क्यों?
बैंकिंग सिस्टम में कुछ सैकंड करोड़ों के लेन-देन में धोखाधड़ी पहचानने के लिए काफी, साइबर हमलों का अनुमान, ट्रैफिक नियंत्रण, भूकम्प और मौसम की सटीक भविष्यवाणी या कोई अन्य जानकारी लेकिन वही तकनीक प्रश्नपत्रों की सुरक्षा नहीं कर सकती, जिन पर करोड़ों छात्रों का भविष्य निर्भर है और वही सवाल—नए कानून में सजा का रोडमैप तो है... लेकिन रोकथाम निल बटा सन्नाटा। स्पैशल टास्क फोर्स का काम अपराध होने के बाद शुरू होगा या परीक्षा से पहले सुरक्षा की कमजोरियों की पहचान होगी और संभावित जोखिमों का आकलन ताकि प्रश्नपत्र तक अनधिकृत पहुंच न हो सके और अगर नहीं तो क्या हम फिर वही गलती दोहराने की तैयारी कर रहे हैं क्योंकि भरोसा कानून से नहीं, व्यवस्था से बनता है और व्यवस्था तब मजबूत होती है, जब अपराधी से पहले कमजोरी पकड़ी जाए।
बच्चों को आरोपी बनाना बंद करो : बच्चे व्यवस्था के बीच नहीं बड़े होते, घरों में होते हैं, स्कूलों, शिक्षकों, कोचिंग संस्थानों और फिर समाज की उम्मीदों के साथ बड़े होते हैं। यही वजह है कि इस कहानी में हम सभी हैं। लेकिन अगर हम पूरी जिम्मेदारी सरकार पर डाल दें, तो सबसे कठिन सच से बचना होगा। माता-पिता को क्या जरूरत है कि वे अपनी महत्वाकांक्षाओं का बोझ बच्चों पर डालें और शिक्षा संस्थान अपने रिजल्ट को बेहतर बनाने के लिए उन्हें सताने की हद तक प्रताडि़त करें। दुर्भाग्य से, आज बोझ किताबों का नहीं, दूसरों के सपने पूरे करने का है और यही उनकी हीनता और अनजान भय से ग्रस्त रहना है। प्रतियोगिता का माहौल ऐसा कि एक रैंक, एक नंबर और एक सीट ही पहचान है। विज्ञापनों और होर्डिंग्स पर टॉपर्स की तस्वीरें लेकिन क्या उनके लिए जगह है, जो पूरी मेहनत के बाद भी सफल नहीं हुए और पोस्टर पर यह लिखा गया—अगर इस बार नहीं हुआ... तो भी तुम असफल नहीं हो। यही वह खामोशी है, जिस पर बात होना बाकी है। शिक्षा नीति पर बहस कोई क्यों नहीं करता जो बाबू बनाती है लेकिन आत्मविश्वास से भरी युवा पीढ़ी तैयारी करने से चूक जाती है।
प्रश्न उठना चाहिए : ऐसी शिक्षा नीति क्यों बनी जो विद्यार्थी की वर्षों की मेहनत का आकलन करने के बजाय कुछ घंटों की परीक्षा से उसका भविष्य तय कर देती हैं। ऐसे हजारों उदाहरण हैं कि इम्तिहान से पहले गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया, दुर्घटना के कारण या साधन न होने से समय पर केंद्र न पहुंच पाए और डिप्रैशन में चले गए और आत्महत्या कर ली। हजारों परिवार बच्चों को टूटते हुए देखते हैं और हाथ मलते रह जाते हैं। अपनी ही बात करूं तो पचास साल पहले ग्रेजुएशन के तीन वर्ष फस्र्ट क्लास नंबर आते रहे लेकिन फाइनल ईयर में टॉयफॉइड होने से बीमारी की हालत में इम्तिहान दिया और थर्ड डिग्री हासिल हुई जो पुलिस के टॉर्चर की तरह जीवन भर साथ रही। यह बात और है कि हार नहीं मानी और एक जिद पकड़ ली कि कुछ तो कर गुजरना है। लेकिन सब ऐसे नहीं होते और अफसोस यह कि अब तक वही चल रहा है।-पूरन चंद सरीन
