चौराहे पर खड़ी शिक्षा नीति : भाषा विवाद, पेपर लीक, परेशान विद्यार्थी और मस्त सरकार
punjabkesari.in Saturday, May 23, 2026 - 03:48 AM (IST)
आजादी के बाद से भारत की शिक्षा व्यवस्था का नेताओं ने इतना बंटाधार किया है, जितना शायद ही किसी अन्य देश में हुआ होगा। एक प्रकार से शिक्षा को चौराहे पर घसीट कर चीरहरण के लिए लाया जाता रहा है। जो जैसे चाहे लूटे, बदनाम करे, भ्रम का जाल बुने और दूध-मलाई चट करे। विडंबना यह कि जिन बच्चों के भविष्य के लिए ये सारी नीतियां और बहसें होती हैं, वही सबसे अधिक तनाव, अनिश्चितता और प्रयोगों का बोझ झेल रहे होते हैं। शिक्षा नीतियां कभी ईमानदारी से अमल न होने से कचरे के ढेर में फैंक दी गईं क्योंकि वे अधिकतर अव्यावहारिक थीं और युवाओं के लिए नहीं, नेताओं और दलगत राजनीति के अनुसार बनाई गई थीं।
भाषाई झगड़ा : स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ा प्रश्न था कि विशाल और बहुभाषी देश को शिक्षा के माध्यम से कैसे जोड़ा जाए। संविधान सभा में भाषा को लेकर हुई बहसें केवल भाषाई नहीं थीं, वे सत्ता पर कब्जा करने का अवसर थीं। हिन्दी को राजभाषा बनाया लेकिन अंग्रेजी को मालकिन, जिसे हटाना असंभव कर दिया। दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु में हिन्दी विरोध आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का प्रश्न है। ‘तीन-भाषा फार्मूला’ लाया गया लेकिन यह व्यावहारिक न होने से बेकार सिद्ध हुआ। भाषा का प्रश्न भावनाओं से अधिक अवसरों यानी नौकरी या रोजगार से जुड़ा होता है। कुछ नेताओं ने अंग्रेजी को वैश्विक ज्ञान, तकनीक, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भाषा बता कर हमेशा के लिए इसका वर्चस्व स्थापित कर दिया। उल्लेखनीय है कि जापान, चीन, रूस, फ्रांस और जर्मनी तथा अनेक विकसित और विकासशील देशों ने अपनी भाषाओं में आधुनिक शिक्षा देकर विश्व में पहचान बनाई है। भारत में उच्च शिक्षा, न्यायपालिका, कॉर्पोरेट जगत और वैश्विक अवसर मुख्यत: अंग्रेजी के इर्द-गिर्द घूमते हैं।
नकल यानी पेपर लीक उद्योग : शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो, जिसने पढ़ाई-लिखाई के दौरान नकल न की हो। इसका कारण किसी अध्यापक का विशेष स्नेह, उससे ट्यूशन लेना जिसने पेपर बनाया हो या फिर आगे-पीछे बैठे विद्यार्थी के सहयोग से उत्तर टीपना हो। किसे पता था कि हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर होगी कि नंबरों की अहमियत योग्यता को पीछे छोड़कर आगे निकलने का साधन बनेगी। अनेक बैसाखियों पर झूलती परीक्षा प्रणाली में जानबूझकर छोड़ी गई दरारों से घोटाला करने की मानसकिता रखने वालों की नजर पडऩा स्वाभाविक था। देखते-देखते यह हजारों करोड़ का अनैतिक और गैरकानूनी व्यापार बन गया और आज स्थिति यह है कि विद्यार्थी, शिक्षक, प्रश्नपत्र बनाने, जांचने और परिणाम घोषित करने वाले तक इस बहती गंगा में हाथ धोने का काम इतनी सफाई से कर रहे हैं कि किसी को कानोंकान खबर न हो। भर्ती परीक्षाओं, मैडिकल प्रवेश, शिक्षक चयन और पुलिस भर्ती तक में ढोल की पोल खुलने की तरह पेपर लीक की घटनाएं बताती हैं कि देश में वही सब कुछ पाएगा, जिसकी जेब में पैसा और नीयत में बेईमानी हो।
कोचिंग उद्योग, दलाल नैटवर्क, फर्जी अभ्यर्थी और डिजिटल हैकिंग इसी दबाव की उपज हैं। विद्यार्थी ज्ञान से अधिक ‘कटऑफ’ और ‘रैंक’ में फंस गया है। शिक्षा सीखने की प्रक्रिया कम और चयन की मशीन अधिक बन गई है। इसका कारण शिक्षा नीतियों के अतिरिक्त कुछ और नहीं है जिनमें कभी यह सोचा ही नहीं गया कि इसे भविष्य बनाने का आधार बनाया जाए। सोचिए कि पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने समान शिक्षा और विज्ञान पर जोर दिया। 1986 की नीति ने ‘सबके लिए शिक्षा’ का नारा दिया, ताकि ग्रामीण तथा महिला शिक्षा को बढ़ावा मिले। फिर वर्तमान सरकार के समय 2020 में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लाई गई, जिसने मातृभाषा, कौशल विकास, डिजिटल शिक्षा और लचीले पाठ्यक्रम की बात की। नई नीति में 5-3-3-4 संरचना, कौशल आधारित शिक्षा, मल्टीपल एंट्री-एग्जिट सिस्टम और बोर्ड परीक्षा सुधार जैसे कई महत्वाकांक्षी सपने बुने गए। लेकिन भारत की पुरानी समस्या अब भी वही है-नीति बनाना आसान, क्रियान्वयन कठिन। सबसे बड़ी बात यह कि शिक्षा बजट में लगातार कटौती।
शिक्षा का उद्देश्य क्या है : यदि शिक्षा का उद्देश्य सोचने की क्षमता, कौशल, आत्मनिर्भरता और नवाचार है, तो पूरा ढांचा बदलना पड़ेगा क्योंकि दुनिया तेजी से बदल रही है। ए.आई., डिजिटल मीडिया, कंटैंट क्रिएशन, एग्री-टैक, पर्यटन, डिजाइन, एनीमेशन, यू-ट्यूब और ऑनलाइन सेवाओं में नए अवसर बन रहे हैं। आज एक युवा बिना सरकारी नौकरी के भी विश्व स्तर पर पहचान बना सकता है। लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी भी रटने और अंक आधारित प्रतिस्पर्धा में फंसी हुई है। विद्याॢथयों को संवाद कौशल, डिजिटल साक्षरता, वित्तीय समझ, उद्यमिता और मानसिक संतुलन भी सिखाना होगा। भविष्य में वही सफल होगा जो बदलती दुनिया के साथ रहना सीख सके। यदि भारत यह संतुलन बना पाया, तभी शिक्षा वास्तव में राष्ट्र निर्माण का माध्यम बन सकेगी।
भारत आज केवल नई शिक्षा नीति नहीं, बल्कि नई ‘शिक्षा दृष्टि’ की आवश्यकता महसूस कर रहा है। एक ओर लाखों डिग्रीधारी बेरोजगार हैं, दूसरी तरफ उद्योगों को कुशल लोग नहीं मिल रहे। आज सचमुच नई शिक्षा नीति बनानी हो, तो उसका उद्देश्य केवल ‘पढ़ाई’ नहीं बल्कि ‘जीवन के लिए तैयारी’ होना चाहिए। परीक्षा, असफलता और बेरोजगारी का भय जीवन की तैयारी करने ही नहीं देता। विद्यार्थी केवल जुगाड़ या जैसे भी हो, नंबर के खेल में आगे रहना चाहता है क्योंकि यदि यह नहीं कर पाया तो उसका भविष्य अंधकार में है। शिक्षा मंत्री से लेकर एन.टी.ए. निदेशक और एन.सी.ई.आर.टी. से लेकर स्कूलों के प्रिंसिपल और अध्यापक तक सब अपना पल्ला झाडऩे में लगे हैं और युवा विद्यार्थी और उनके अभिभावक चौराहे पर भीख मांगने की मुद्रा में खड़े हैं।-पूरन चंद सरीन
