अर्थव्यवस्था ‘रसातल की ओर’ तेजी से अग्रसर

2020-10-18T04:05:29.777

देश में एक ऐसा मुद्दा है जिस पर हम सभी लोग सहमत हो सकते हैं। कोई भी सत्ताधारी पार्टी या सरकार अभी तक इतनी सफल नहीं हुई जितनी भाजपा या फिर मोदी सरकार अपने विचारों के प्रचार, नीतियों तथा कार्रवाइयों के लिए हुई है और ऐसी बातों के लिए वह कैसी भी धन राशि का इस्तेमाल, किसी  को धमकाना या सहयोगी बनाना या फिर किसी भी संस्थान को अपने समक्ष झुका सकती है। इस वर्ष फरवरी तक सरकार यह सोच रही थी कि भारत विश्व में सबसे तेजी से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था है मगर सच्चाई इसके विपरीत है तथा अर्थव्यवस्था रसातल की ओर तेजी से अग्रसर है। 

सरकार का प्रचार करने का असली मकसद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश का सबसे बड़ा नेता साबित करने का है। लोगों द्वारा दशकों तक सबसे बुरी अर्थव्यवस्था को झेलने के आरोप के बाद अब सरकार का प्रयास यह है कि वह मोदी को एक सशक्त आर्थिक सुधारक के तौर पर पेश करना चाहती है। सरकार को इस तरह पेश करने वाले लोगों में अब प्रतिष्ठित शैक्षिक डा. अरविंद पनगढिय़ा का नाम जुड़ा है। 
उनकी बात मूल रूप से इस पर जोर देती है कि मोदी के पास पूर्व दिवंगत प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव तथा अटल बिहारी वाजपेयी के साथ-साथ वह भी अच्छे सुधारक हैं। एक बात यहां नोट करने वाली है कि उनके अनुसार डा. मनमोहन सिंह इस सूची में शामिल नहीं होते। अपने तर्क को समर्थन देने के लिए डा. पनगढिय़ा पांच सुधारों की सूची पेश करते हैं। 

1. इनसॉल्वैंसी एंड बैंक्रप्सी कोड (आई.बी.सी.)
रघुराम राजन रिपोर्ट (2008) द्वारा अंकुरित यह विचार 2013 में सचिवों की समिति द्वारा विकसित हुआ था तथा एक ड्राफ्ट बिल में (2013-14 में) इसका समापन हुआ। इसे पास तथा कानून में परिवर्तित मोदी सरकार द्वारा किया गया। इसमें कई खामियां हैं जिन्हें अनेकों संशोधन विधेयक द्वारा सही करने का प्रयास किया गया है। मगर ‘कार्य अभी भी प्रगति पर है।’ आई.बी.सी. के चार वर्षों के नतीजे    अभी भी संतोषजनक हैं। इसका श्रेय तथा बदनामी का दायित्व मोदी का है। 

2. श्रम कानून सुधार 
कानूनों को कोड करना प्रशासन का कार्य है और यह एक अग्रणी सुधार नहीं है। यहां तक कि पूंजीवादी देशों में जहां पर अनेकों सशक्त यूनियनें हैं वहां किसी भी कर्मचारी को विशेष कारण के बिना उसे बाहर नहीं निकाला जा सकता। मनमानी के खिलाफ यूनियनें लड़ेंगी। भारत जैसे देश में जहां पर कर्मचारियों की बहुत छोटी-सी गिनती यूनियनों से जुड़ी है इसलिए यहां पर उन्हें बचाने के लिए केवल कानून ही है। अभी भी एक कर्मचारी को विशेष कारण के चलते भारत में बाहर निकाला जा सकता है। 

नए कोडों का धन्यवाद हो जिसके तहत श्रम का अस्थायीकरण तथा उसे अनुबंध पर रखना बढ़ेगा। नौकरी की सुरक्षा एक सशक्त दक्षता के लिए प्रोत्साहन है। कर्मचारियों की छोटी-सी सुरक्षा को छांटा जा रहा है और यही कारण है कि भारतीय मजदूर संघ (आर.एस.एस. से संबंधित)  बदलावों के लिए प्रदर्शन कर रहा है। यूनियनों के साथ बातचीत करने के बाद उचित श्रम कानून सुधारों को करने की जरूरत है। 

3. कृषि कानून 
नए कृषि कानूनों के बारे में बहुत कम कहा गया है। उन्हें उचित ठहराया गया है। कृषि उत्पादों की वसूली तथा सुधार उपेक्षित है और ये वर्तमान प्रणाली के साथ समस्याएं हैं। मगर नए कानूनों द्वारा सुझाई गई दवा बीमारी से बुरी है। मैं अपनी बातों को दोहराना चाहता हूं कि अपूर्ण मंडी सिस्टम को दुर्बल बनाना जवाब नहीं है। इसका समाधान है हजारों की तादाद में किसानों की मार्कीटें, वह भी बड़े गांवों तथा छोटे कस्बों में बनाने से जुड़ा है। अधिसूचित एम.एस.पी. से कम किसी भी कीमत पर खरीददार और विक्रेता को लेन-देन के लिए मजबूर न किया जाए। कार्पोरेट के प्रवेश से सुधार नहीं होगा। इससे पहले कि हम डा. पनगढिय़ा के तर्क से सहमत हों उन्हें यह बात पहले बतानी होगी कि पंजाब तथा हरियाणा से संबंधित देश के ज्यादातर उत्पादक किसान सड़कों पर प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? 

4. मैडीकल शिक्षा में सुधार
मुझे यह समझ नहीं आती कि मैडीकल कौंसिल ऑफ इंडिया (एम.सी.आई.) को नैशनल मैडीकल  कमिशन (एन.एम.सी.) से क्यों बदला जा रहा है। कई वर्षों से पहले एम.सी.आई. को एक व्यक्ति द्वारा नियंत्रित किया जाता था जो मोदी का एक निकट दोस्त है। एम.सी.आई. को बदलने का विचार यू.पी.ए. के शासन के दौरान विकसित हुआ। अब यह भी डर है कि एन.एम.सी. को भी भाजपा द्वारा लपक लिया जाएगा और ऐसा सरकार या अन्य माध्यम से हो सकता है क्योंकि ऐसी ही बातें विश्वविद्यालयों से लेकर कई अन्य इकाइयों में हो चुकी हैं। 

5. एफ.डी.आई. का उदारीकरण
नरसिम्हाराव तथा डा. मनमोहन सिंह के कार्यकालों के दौरान भाजपा ने एफ.डी.आई. के उदारीकरण के प्रति प्रत्येक कदम का विरोध किया। प्रथम बिल जिसके तहत विदेशी निवेशकों सहित निजी सैक्टर को खुला भरोसा देना था, मैं ही 1997 में इसे लेकर आया। इसका बुरी तरह से विरोध हुआ था और विपक्ष में बैठ कर भाजपा ने इसे निरस्त किया था। भाजपा ने रिटेल में एफ.डी.आई. का भी विरोध किया था। उस समय वाजपेयी की सरकार थी और अब मोदी सरकार। मगर मैं डा. पनगढिय़ा को मोदी को पूरी तरह से हीरो बनाने के लिए उनका समर्थन नहीं करूंगा। 

मेरे विचारों में प्रधानमंत्री मोदी एक सचेत नेता हैं। वह उत्पन्न होने वाले एकाधिकारों का समर्थन करते हैं। यदि वह एक उचित तथा कठोर सुधार चाहते हैं जिसे कि वह लोकसभा में अपने बहुमत से कर सकते हैं और ऐसा न तो नरसिम्हा राव और न ही मनमोहन सिंह ने किया होगा। सुधारों का सही टैस्ट यह होता है कि क्या इन्होंने जी.डी.पी. की वृद्धि दर को बढ़ाया है। निर्विवाद रूप से डा. मनमोहन सिंह का सुधारों को लेकर कोई सानी नहीं। आर्थिक सुधारकों की सूची में स्थान पाने से पूर्व पी.एम. मोदी को वृद्धि को बढ़ाना होगा।-पी. चिदम्बरम


Pardeep

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