देश में विभाजनकारी ताकतों का बोलबाला
punjabkesari.in Saturday, May 23, 2026 - 04:13 AM (IST)
इस समय भारत के भीतर एक तरफ उन विभाजनकारी ताकतों का बोलबाला है, जो देश के वर्तमान संविधान और धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, संघीय ढांचे को तबाह करके यहां एक धर्म आधारित, कट्टर, गैर-लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रही हैं। दूसरी तरफ, वे ताकतें भी हैं, जो महान भारत को अलग-अलग धर्मों, जातियों, राष्ट्रीयताओं, क्षेत्रों, संस्कृतियों से संबंधित, अपनी-अपनी मातृभाषा बोलने वाले लेकिन सभी धर्मों का सम्मान करने वाले देशवासियों का सांझा देश मानती हैं, देश के संविधान की रक्षा और सांप्रदायिक सद्भाव मजबूत करने के लिए प्रयासरत हैं।
अंधकारवादी और प्रतिक्रियावादी ताकतों के हाथों में सत्ता की बागडोर होने के कारण, नि:संदेह वे अपना मकसद हासिल करने के लिए हर हथकंडा अपना रही हैं। परंतु संतोष की बात यह है कि भारत के बहुसंख्यक लोग वर्तमान संविधान के दायरे में रहते हुए देश के तेज आर्थिक विकास और धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, संघीय ढांचे के अस्तित्व को कायम रखने के समर्थक हैं। इन सकारात्मक ताकतों में बहुसंख्यक हिंदू समुदाय शामिल है, जो सदियों से अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच सद्भाव और शांति कायम रखने का पुरजोर समर्थन करता आ रहा है।
भगवान कृष्ण द्वारा ‘श्रीमदभगवद्गीता’ के माध्यम से न्याय-अन्याय के बीच चलने वाले किसी भी युद्ध में सामाजिक और पारिवारिक संबंधों को नजरअंदाज करके सत्य के साथ खड़े होने की जो शिक्षा दी गई है, वह पूरे हिंदू समुदाय की सांझी, गौरवमयी विरासत है। देश के स्वतंत्रता संग्राम में भी हिंदू समुदाय के लाखों लोगों ने मुसलमानों, सिखों और अन्य धार्मिक मान्यताओं के लोगों के साथ मिलकर अंग्रेजी साम्राज्य की गुलामी की जंजीरें काटने के लिए अपनी जान न्यौछावर की और अनेक अन्य यातनाएं झेलीं।
गदर पार्टी की स्थापना करने वालों में हालांकि सिख धर्म से संबंधित नेताओं की संख्या और भूमिका बहुत बड़ी थी लेकिन इसके संस्थापकों में लाला हरदयाल, पंडित राम किशन मड़ौली, सोहन लाल पाठक आदि का भी शानदार योगदान था, जो हिंदू धर्म की प्रगतिशील विरासत को दर्शाता है। शहीद-ए-आजम भगत सिंह खुद वैज्ञानिक विचारधारा के समर्थक, यानी नास्तिक थे, परंतु उनके संगी साथियों की बड़ी संख्या हिंदू-सिख और मुस्लिम धर्म को मानने वालों की थी। परंतु कमाल की बात यह है कि देशभक्तों की इस टोली के सदस्यों के बीच धर्म के आधार पर कभी कोई विवाद या मतभेद खड़ा नहीं हुआ।
इसलिए यह हकीकत स्वीकार करनी होगी कि हर हिंदू आर.एस.एस. की सांप्रदायिक-फासीवादी विचारधारा (हिंदुत्व) से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि हिंदू समुदाय के भारी बहुसंख्यक लोग प्रगतिशील विचारों के धारक हैं और सभी धर्मों के सह-अस्तित्व की गारंटी देने वाले धर्मनिरपेक्ष सरोकारों और लोकतांत्रिक ढांचे के समर्थक हैं। इसी तरह सभी सिखों व मुसलमानों को अलग देश की मांग करने वाले ‘खालिस्तानियों’ और ‘इस्लामिक राज्य’ की स्थापना के लिए लड़ रहे कट्टर जेहादियों की सूची में जबरन शामिल करना न केवल चरम संकीर्णता है, बल्कि अत्यंत शरारतपूर्ण और गैर-जिम्मेदाराना सोच का भद्दा प्रदर्शन भी है। आज भी संकीर्ण विचारधारा वाले मुट्ठी भर लोग और सत्ता व धन के लोभी लोग हिंदू-सिखों, मुसलमानों के विशाल हिस्सों को गुमराह करके अपने साथ चलाने के प्रयास कर रहे हैं। वर्तमान शासक इस अमानवीय कार्य के मुख्य सूत्रधार हैं। इसलिए वर्तमान समय में सांप्रदायिक-फासीवादी ताकतों, जो देश को धर्म आधारित गैर-लोकतांत्रिक ढांचे में बदलना चाहती हैं, को शिकस्त देने के लिए देश के वर्तमान संविधान, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों तथा भाईचारक सांझ को कायम रखने वाली सभी ताकतों को एकजुट होना होगा।
यह तभी संभव है, जब देश का बहुसंख्यक हिंदू समुदाय, मुसलमान, सिख और ईसाई धार्मिक अल्पसंख्यक, कथित निचली और पिछड़ी जातियों से संबंधित जनसमूह अपनी सहनशीलता, सांप्रदायिक सद्भाव, देशभक्ति और दुखी लोगों के कष्ट निवारण के लिए अपनी जान कुर्बान करने की महान परंपराओं से अवगत हों। यह हमारी बुद्धिमत्ता की कठिन परीक्षा है कि क्या हम देश के सभी धर्मों के करोड़ों लोगों को सांप्रदायिक-फासीवादी ताकतों और संकीर्ण सोच वाले लठैत संगठनों के प्रभाव से मुक्त रखकर प्रगतिशील धारा के साथ जोड़ सकते हैं? ऐसा सही दृष्टिकोण न अपनाने के परिणामस्वरूप देश और पंजाब के सामने भारी मुसीबतें खड़ी हो सकती हैं।-मंगत राम पासला
