हमारी आस्था के प्रतीक हैं धर्मस्थल

punjabkesari.in Monday, Aug 22, 2022 - 07:22 AM (IST)

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन वृंदावन के सुप्रसिद्ध श्री बांके बिहारी मंदिर में मंगला आरती के समय हुई भगदड़ में दो लोगों की जान गई और कई घायल हुए। इस दुखद हादसे पर देश भर के कृष्ण भक्त सदमे में हैं और जम कर निंदा भी कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो भी देखे जा सकते हैं जहां श्रद्धालुओं की भीड़ किस कदर धक्का-मुक्की का शिकार हो रही है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पर्व पर भक्तों को अव्यवस्था के चलते जिन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है उनसे शायद मथुरा प्रशासन को भविष्य के लिए सबक सीखने की आवश्यकता है। 

मंदिरों की अव्यवस्था के चलते हुई मौतों की सूची छोटी नहीं है। 2008 में हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में भगदड़ में डेढ़ सौ से अधिक जानें गई थीं। महाराष्ट्र के पंडरपुर में भी ऐसा ही हादसा हुआ था। बिहार के देवघर में शिवजी को जल चढ़ाने गई भीड़ की भगदड़ में मची चीत्कार हृदय विदारक थी। 

कुंभ के मेलों में भी अक्सर ऐसे हादसे होते रहते हैं। जब से टैलीविजन चैनलों का प्रचार-प्रसार बढ़ा है तब से भारत में तीर्थस्थलों और धार्मिक पर्वों के प्रति भी उत्साह बढ़ा है। आज देश के मशहूर मंदिरों में पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा भीड़ जाती है। जितनी भीड़ उतनी अव्यवस्था। उतना ही दुर्घटना का खतरा। पर स्थानीय प्रशासन प्राय: कुछ ठोस नहीं करता या वी.आई.पी. की व्यवस्था में लगा रहता है या साधनों की कमी की दुहाई देता है। हमेशा हादसों के बाद राहत की अफरा-तफरी मचती है। 

मथुरा हो या काशी उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार ने इन तीर्थों के विकास के लिए पैसे की कोई कमी नहीं होने दी। वृंदावन के जिस बांके बिहारी मंदिर में यह दुखद हादसा हुआ उस मंदिर की गली के विकास के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो कुबेर का खजाना खोल दिया। विश्व बैंक से 27 करोड़ की मोटी रकम स्वीकृत करवाकर दी थी। परंतु वहां सुविधा के नाम पर भक्तों को क्या मिला यह सबके सामने है। वहां के निवासी और दुकानदार बताते हैं कि उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद ने योगी जी द्वारा दिए गए इस धन को हजम कर लिया या बर्बाद कर दिया। इतने पैसे से तो बिहारी जी के मंदिर और उसके आस-पास के इलाके में भक्तों की सुविधा के लिए काफी कुछ किया जा सकता था। परंतु ऐसा नहीं हुआ।

ऐसा नहीं है कि वृंदावन में ऐसे हादसे पहले नहीं हुए। ऐसा भी नहीं है कि इससे पहले बिना हादसों के बड़े-बड़े त्यौहार शांतिपूर्वक सम्पन्न नहीं हुए। मुझे याद है जब 2003 में मुझे माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देश पर इसी बांके बिहारी मंदिर का रिसीवर नियुक्त किया गया था। तो मेरे रिसीवर बनते ही कुछ ही सप्ताह बाद हरियाली तीज का त्यौहार आ रहा था। उस दिन बिहारी जी के दर्शनों के लिए लाखों की भीड़ आती है। मेरे लिए यह पहला मौका था और काफी चुनौती पूर्ण था।

लाखों लोगों ने दर्शन किए पर नतीजा यह हुआ कि बिहारी जी मंदिर के इतिहास में पहली बार न तो किसी की जेब कटी, न किसी को कोई चोट आई और न ही किसी की चप्पल चोरी हुई। बिहारी जी की कृपा से पूरा पर्व शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुआ। ऐसा केवल इसलिए हुआ क्योंकि समस्या का हल खोजने में सभी का योगदान था। कुछ धार्मिक स्थलों की व्यवस्था उस समाज के लोगों ने स्वयं सुधारी है। चाहे वह दक्षिण हो या उत्तर भारत। अब जहां पर इन स्थलों के खुलने का समय भिन्न होता है तो वहां अधीरता, भीड़ और जल्दी दर्शन करने की लालसा बढ़ती है। नतीजा अव्यवस्था फैलती है और दुर्घटनाएं होती हैं। 

धार्मिक स्थल को भी यह आदेश दिए जाएं कि अपने स्थल के इर्द-गिर्द तीर्थयात्रियों द्वारा फैंका गया कूड़ा उठवाने की जिम्मेदारी उसी मठ की होगी। यदि ऐसे नियम बना दिए जाएं तो धर्मस्थलों की दशा तेजी से सुधर सकती है। इसी तरह धार्मिक संपत्तियों के अधिग्रहण की भी स्पष्ट नीति होनी चाहिए। अक्सर देखने में आता है कि धर्मस्थान बनवाता कोई और है पर उसके कुछ सेवादार उसे निजी संपत्ति की तरह बेच खाते हैं। धर्मनीति में यह स्पष्ट होना चाहिए कि यदि किसी धार्मिक संपत्ति को बनाने वाले नहीं रहते हैं तो उस संपत्ति का सरकार अधिग्रहरण करके एक सार्वजनिक ट्रस्ट बना देगी। इस ट्रस्ट में उस धर्मस्थान के प्रति आस्था रखने वाले लोगों को सरकार ट्रस्टी मनोनीत कर सकती है। 

देश में अनेक धर्मों के अनेकों पर्व सालभर होते रहते हैं। इन पर्वों पर उमडऩे वाली लाखों-करोड़ों लोगों की भीड़ को अनुशासित रखने के लिए एक तीर्थ रक्षक बल की आवश्यकता होगी। इसमें ऊर्जावान युवाओं को तीर्थ की देखभाल के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे जनता से व्यवहार करते समय संवेदनशीलता का परिचय दें। यह रक्षा बल आवश्यकतानुसार देश के विभिन्न तीर्थस्थलों पर बड़े पर्वों के दौरान तैनात किया जा सकता है। ये धर्मस्थल हमारी आस्था के प्रतीक हैं और हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं। इनके बेहतर रख-रखाव से देश में पर्यटन भी बढ़ेगा और दर्शनार्थियों को भी सुख मिलेगा।-विनीत नारायण


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