दिल्ली गुरुद्वारा चुनाव : ‘उदासीनता की सोच बदलनी होगी’

2020-10-15T02:37:25.59

दिल्ली उच्च न्यायालय की ओर से दिल्ली गुरुद्वारा चुनावों से संबंधित पिछली मतदाता सूचियों के साथ नए बनने वाले मतदाताओं को शामिल कर, बनने वाली मतदाता सूचियों के आधार पर अगले वर्ष की पहली तिमाही तक गुरुद्वारा चुनाव की प्रक्रिया पूरी कर लिए जाने के दिए गए आदेश के साथ ही दिल्ली गुरुद्वारा चुनावों के लिए सक्रियता बढ़ गई है। 

आने वाले समय में गुरुद्वारा चुनावों को लेकर राजनीतिक समीकरण बड़ी तेजी से बनते-बिगड़ते दिखाई देने लगेंगे। जिन पर तीखी नजर रखते हुए उन्हें पाठकों के साथ लगातार साझा करते रहने का हमारा दावा है। इस समय सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा जो सामने है, वह गुरुद्वारा चुनावों में सिखों में मतदाता बनने और मतदान करने के प्रति चली आ रही उदासीनता है, जिसे दूर करने की अति आवश्यकता है। 

मतदान के प्रति उदासीनता :बीते समय लम्बे समय से होते चले आ रहे दिल्ली गुरुद्वारा चुनावों में हो रही हार-जीत के सिवा, एक और पक्ष उभर कर सामने आता चला जा रहा है जिसकी ओर संभवत: अब तक किसी का ध्यान नहीं गया, जबकि यह पक्ष बहुत ही गंभीर और चिंताजनक है। 

समय के साथ जिसके और भी गंभीर होते चले जाने की संभावना है। जिस कारण इसे बहुत ही गंभीरता से लिए जाने की आवश्यकता है। वह पक्ष यह है कि इन चुनावों में चाहे एक पक्ष अपनी जीत को लेकर खुश हो और दूसरा अपनी हार से निराश परन्तु सिख जगत का एक बड़ा हिस्सा इस बात को लेकर बहुत परेशान और ङ्क्षचतित है कि आम सिख गुरुद्वारों जोकि सिखी के मूल स्रोत हैं, के प्रबंध में भागीदार बनने की ओर से क्यों उदासीन होता चला जा रहा है? बीते समय में दिल्ली में सिखों की जो आबादी 15 लाख मानी जाती चली आ रही थी, उसे कुछ समय से सिख बुद्धिजीवियों द्वारा 12 लाख माना जाने लगा है। 

यदि दिल्ली में सिख आबादी 12 लाख ही मान ली जाए तो भी यह सवाल वहीं का वहीं बना रहता है कि इतनी (12 लाख) आबादी में से दिल्ली गुरुद्वारा चुनावों के लिए केवल 3.8 लाख मतदाता ही क्यों बनते हैं? जबकि यह संख्या 7 से 8 लाख के बीच होनी चाहिए। बात यहीं तक सीमित नहीं रहती। देखने वाली बात यह भी है कि पिछले गुरुद्वारा चुनावों में इन 3.8 लाख मतदाताओं में से भी केवल 1.75 लाख मतदाता ही मतदान करने के लिए निकले। 

हालांकि गत में गुरुद्वारा चुनाव क्षेत्रों का पुनर्गठन हुआ है उसके अनुसार हर क्षेत्र 7 हजार से 10 हजार मतदाताओं पर आधारित है परन्तु इन चुनावों में एकाध सीट पर ही मतदान का आंकड़ा 5 हजार और कुछ एक सीटों पर 4 हजार का आंकड़ा छू पाने में सफल रहा, अधिकांश सीटों पर तो शायद ही किसी सीट पर मतदान का आंकड़ा 3 हजार को पार कर पाया हो? मतदान के जो आंकड़े सामने आए हैं यदि उन आंकड़ों को आधार बना, मतदान का प्रतिशत निकाला जाए तो दिल्ली की कुल सिख आबादी 12 लाख के मुकाबले 10 प्रतिशत से भी कम सिख मतदाताओं ने इन चुनाव में भाग लिया है, जिसका स्पष्ट मतलब यह है कि 90 प्रतिशत से भी अधिक सिख गुरुद्वारा चुनावों के प्रति उदासीन होने का एहसास करवाते हुए चुनावों से दूरी बना कर चल रहे हैं। आखिर यह स्थिति क्यों बनती चली आ रही है? इस सवाल पर उच्च स्तरीय विचार-विमर्श कर आम सिखों को जागरूक कर, उन्हें गुरुद्वारा प्रबंध में अपनी भागीदारी बढ़ाने को उत्साहित किए जाने की आवश्यकता है।

वरिष्ठ बादल आए बचाव में : इधर शिरोमणि अकाली दल (बादल) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने हरसिमरत कौर से केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिलवा, घोषणा की कि उन्होंने भाजपा के साथ लम्बे समय से चले आ रहे गठजोड़  को खत्म कर दिया है। संभवत: उन्होंने ऐसा कह यह संकेत देने की कोशिश की कि पंजाब विधानसभा के अगले चुनाव बादल अकाली दल अपने बूते पर लड़ेगा। उधर पंजाब भाजपा के नेतृत्व ने पंजाब विधानसभा की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का दावा कर, सुखबीर सिंह बादल पर जवाबी हमला बोल दिया।

दोनों के बयान देख, प्रकाश सिंह बादल तुरन्त ही हरकत में आए और उन्होंने जोर देकर कहा कि उनके जीते-जी अकाली-भाजपा गठजोड़ नहीं टूट सकता, यह अटूट है। उनका मानना है कि पंजाब के राजनीतिक समीकरण ऐसे हैं जिनके चलते न तो बादल अकाली दल और न ही भाजपा अकेले चुनाव लड़, पंजाब की सत्ता के गलियारों तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने हरसिमरत कौर के इस्तीफे को हालात की मजबूरी करार दे, उसका भी बचाव किया। 

भोगल नहीं माने : बीते दिनों दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष मनजिंद्र सिंह सिरसा और महासचिव हरमीत सिंह कालका ने अखिल भारतीय दंगा पीड़ित राहत कमेटी  के अध्यक्ष कुलदीप सिंह भोगल को जी.एच.पी.एस. हेमकुंट कालोनी के चेयरमैन के पद की जिम्मेदारियां सौंप, उनकी अपने साथ लम्बे समय से चली आ रही नाराजगी को दूर करने की कोशिश की थी। उधर मिली जानकारी के अनुसार स्कूल के चेयरमैन पद की जिम्मेदारियां संभालने के बाद वह एक बार भी स्कूल नहीं गए। इसका कारण यह बताया जाता है कि उन्होंने प्रबंधकों को स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उनके स्कूल स्टाफ की मांगें मान, उसे संतुष्ट नहीं किया जाता, तब तक उनका स्कूल जाकर  चेयरमैन की कुर्सी पर बैठना कोई अर्थ नहीं रखता? 

स. सरना ने उठाया सवाल : शिरोमणि अकाली दल (बादल) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल द्वारा संसद में साझा मोर्चा बनाए जाने के उद्देश्य से क्षेत्रीय  पाॢटयों से बात करने के लिए बलविंद्र सिंह भूंदड़, नरेश गुजराल, प्रेम सिंह चंदूमाजरा और मनजिंद्र सिंह सिरसा पर आधारित चार सदस्यीय कमेटी बनाए जाने को हास्यास्पद करार देते हुए कहा कि जिस पार्टी का मुखी केंद्रीय मंत्रिमंडल में एक ‘कुर्सी’ हासिल करने के लिए अपनी कौम और प्रदेश के हितों और अधिकारों के चार्टर को रद्दी टोकरी में फैंक सकता है, उसके साथ साझा मोर्चा बनाने के लिए कोई कैसे तैयार हो सकेगा? 

स.सरना ने पूछा कि क्या क्षेत्रीय पाॢटयों के मुखी यह नहीं जानते कि जिस पार्टी के मुखी मंत्रिमंडल की बैठकों और संसद में कृषि अध्यादेश और बिलों का समर्थन करते रहे, बाहर किसानों के रोष का सामना न कर पाने के चलते पाला बदलने में उन्होंने कोई शर्म महसूस नहीं की, उसके नेतृत्व पर कैसे विश्वास किया जा सकता है कि क्षेत्रीय पाॢटयों के हितों के लिए अपने स्टैंड पर कायम रहेगा? 

...और अंत में : दिल्ली भाजपा के सूत्रों की मानें तो बादल अकाली दल की उच्च कमान के आदेश के बावजूद दिल्ली गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष मनजिंद्र सिंह सिरसा और महासचिव हरमीत सिंह कालका ने भाजपा की अपनी सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है। उन्होंने बताया कि इन दोनों ने भाजपा के टिकट पर दिल्ली विधानसभा का चुनाव लडऩे के लिए भाजपा की सदस्यता ली थी।-न काहू से दोस्ती न काहू से बैर जसवंत सिंह ‘अजीत’
 


Pardeep

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