करोड़ों लोग बेरोजगारी और महंगाई की चक्की में पिस रहे

2021-06-17T05:05:45.28

इस समय जबकि कोरोना महामारी के दौर में लाखों लोग मारे गए हैं तथा बड़ी गिनती में इस रोग से पीड़ित मरीज जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहे हैं। इस दौर में देश के करोड़ों लोग बेरोजगारी तथा महंगाई की चक्की में पिस रहे हैं। ये दोनों गंभीर समस्याएं आगे चल कर भुखमरी को जन्म देती हैं। 

अफसोस की बात यह है कि देश की मोदी सरकार को इस भयंकर स्थिति का कोई एहसास नहीं हो रहा। टी.वी. पर तथा सोशल मीडिया पर अनेकों तरह के ऐसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं जिससे लोगों का ध्यान इन दो समस्याओं से दूर करने का प्रयत्न किया जा रहा है। ऐसे विषयों का जिक्र करना अब अर्थहीन हो गया है। देश को पेश आ रही बड़ी समस्याओं से निपटने के लिए लोगों के मनों के अंदर विश्वास तथा एकजुटता पैदा करने की जरूरत है। 

बिहार में कोरोना से मरने वालों की गिनती को जिस प्रकार छिपाया गया तथा वास्तविकता सामने आने के बावजूद कोई भी प्रायश्चित किए जाने की जगह  राज्य सरकार की ‘बल्ले-बल्ले’ की जा रही है, उसने मानवीय कीमतों तथा संवेदनशीलता को ही ठेस नहीं पहुंचाई बल्कि आम लोगों के सामने एक सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर वह भरोसा करें तो किस पर करें और कैसे करें? विश्वसनीयता को लग रही यह चोट देश के अंदर लोकतंत्र तथा भाईचारक एकता को तबाह कर सकती है। 

हमारे मीडिया की ओर से बेरोजगारी तथा महंगाई की ओर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा जो इस समय की सबसे बड़ी दुखद घटनाएं हैं। सामाजिक विज्ञान के अनुसार बेरोजगारी तथा महंगाई के मूल कारण अन्य हैं जिनका यहां पर जिक्र करना लाजिमी है। ये दोनों समस्याएं पूंजीवाद की देन हैं। मगर हम कोरोना महामारी के संदर्भ में ही बेरोजगारी तथा महंगाई का जिक्र करेंगे। 

लॉकडाऊन तथा रोजाना के लग रहे क र्यू के कारण लघु तथा मध्यम कारोबार करीब बंद हो गए हैं। इसके नतीजन इन कारोबारों में काम करने वाले करोड़ों श्रमिक काम के बिना खाली बैठ गए हैं। छोटे दुकानदार ग्राहक की तलाश में आंखें बिछाए बैठे हैं। होटल, रेस्तरां, मैरिज पैलेस, सिनेमा हालों के बंद होने के कारण तथा हर खुशी-गमी के मौके पर किए जाने वाले समारोहों में कोरोना के कारण लगे प्रतिबंधों से अकेले पंजाब के भीतर ही लाखों लोग खाली बैठ गए हैं।

हालांकि सरकार ने अब इन पर कुछ पाबंदियां हटाई हैं। खाना बनाने वाले हलवाई, उन्हें परोसने वाले वेटर तथा दूसरे लोगों का रोजगार छिन गया है। जब लोगों के पास न कोई रोजगार और न ही आमदन का कोई जरिया है तब वह मकान बनाने, आवाजाही का साधन खरीदने, ज्यादा कपड़े खरीदने या फिर अपनी जिंदगी को और बेहतर बनाने के लिए किसी नई चीज को खरीदने का जोखिम क्यों लेंगे? 

इस कारण निर्माण में लगे श्रमिक सड़कों पर काम के लिए कुछ समय के इंतजार के बाद मजबूर तथा बेबस होकर घर वापस लौट जाते हैं क्योंकि उनके पास कोई रास्ता ही नहीं। ट्रांसपोर्ट, रिक्शा, आटो रिक्शा तथा टैक्सी इत्यादि का रोजगार करने वाले मेहनती लोगों को ग्राहक या फिर माल ढुलाई की चीजें ही नहीं मिलतीं जिस कारण वह ऐसे ही काम में व्यस्त होने का दिखावा मात्र करते हैं जबकि उनकी जेबें खाली होती हैं। 

बेरोजगार लोगों का सब्जियों तथा फलों को बेचने के धंधे में आने से ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे ऐसे लोगों को कुछ खरीदना ही नहीं आता था। साइकिल या रेहड़ी पर सब्जी तथा फल  बेचने वाले ग्राहकों को गला फाड़-फाड़ कर बुलाते हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने अपने घर के किसी कोने में दुकान खोल रखी है। पता नहीं ऐसे नए दुकानदार घर को चलाने के लिए आमदन जुटा पा रहे हैं या नहीं। 

इसके बारे में भी शंका है मगर आखिर वे लोग करें भी तो क्या करें? बेरोजगारी तथा महंगाई से जूझ रहे लोगों की गिनती बढऩे के कारण समाज के अंदर अफरा-तफरी, अराजकता, लूट-खसूट तथा डकैतियों का बाजार गर्म है। घरेलू हिंसा भी बढ़ रही है। आॢथक तंगी से परेशान लोग अपने ही परिवार के सदस्यों की हत्याएं कर खुद भी आत्महत्याएं कर रहे हैं।
ऐसे घटनाओं में निरंतर बढ़ौतरी हो रही है। बढ़ रहे रोष, अपराध करने की मानसिकता तथा असहनशीलता का बड़ा कारण आम लोगों की आॢथक तथा सामाजिक मुश्किलें हैं जिस कारण हमारे समाज के अंदर ङ्क्षहसक घटनाएं बढ़ गई हैं। ऐसे में नशों का व्यापार करना तथा नशेड़ी बनने की इच्छा भी शामिल हैं। 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमारी सरकार तथा उसका स्थान लेने वाले उत्सुक विरोधी दल भी ऐसी मुश्किलों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहे। झूठे वायदों तथा मनगढ़ंत आंकड़ों के द्वारा लोगों का पेट भरने की कोशिश की जा रही है। नेता लोग तो सत्ता के लिए दल-बदलना तथा एक-दूसरे को गाली-गलौच करने में व्यस्त हैं। बड़बोली अनैतिक भाषा में दूसरे पक्ष की की गई नुक्ताचीनी भी अर्थहीन तथा हास्यास्पद हो चुकी है। बड़े कार्पोरेट घरानों के बढ़ रहे मुनाफों के द्वारा उनकी पूंजी में हो रही बेशुमार बढ़ौतरी बेरोजगार लोगों की सहायता में इस्तेमाल की जा सकती है। सभी फिजूलखर्चे बंद कर जनता की खरीद शक्ति को बढ़ाने के लिए सीधी वित्तीय सहायता आॢथक सरगर्मियों को बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती है। 

सरकार को अपील है कि ऐसी नाजुक स्थिति को संभालने के तुरन्त उपाय किए जाएं। ऐसी अवस्था उस समय जैसी बनी हुई है जब श्री गुरु नानक देव जी ने लोगों की त्रासदी को देखते हुए बुलंद आवाज में परमात्मा को वंगार कर कहा था कि, ‘‘एती मार पई कुरलाने तैं की दर्द न आया।’’-मंगत राम पासला


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Content Writer

Pardeep

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