अब चुनाव में भ्रष्टाचार हमारी आदत बन चुकी है
punjabkesari.in Wednesday, Mar 18, 2026 - 03:36 AM (IST)
‘‘सर, मैं आपको 200 परसैंट बता सकता हूं। चुनाव की घोषणा 14 मार्च से पहले नहीं होगी। और ये भी बता दूं, बाकी राज्यों में चाहे जब हों, असम में चुनाव 14 अप्रैल से पहले हो जाएंगे। आप लिख लीजिए।’’ यह बात कोई 2 सप्ताह पहले की है। हम असम में सड़कों की खाक छान रहे थे। मैं सोच रहा था कि पिछली बार की तरह 4 राज्यों में चुनाव की घोषणा फरवरी के अंत या मार्च के पहले 1-2 दिन में हो जाएगी। जब नहीं हुआ तो असम के एक राजनीतिक कार्यकत्र्ता को फोन किया।
उसने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिए। ‘‘देखिए सर, पी.एम. असम में 13 या 14 तारीख को आने वाले हैं। वह आकर कोई बड़ी घोषणा करेंगे। चुनाव आयोग उनका इंतजार करेगा, उसके बाद आचार संहिता लगाएगा। लेकिन उसके बाद असम में जल्दी से चुनाव करवाए जाएंगे। चूंकि इस बार बिहू के दौरान हर जगह जुबिन गर्ग की फोटो लगेगी, उसके गाने बजेंगे, जो लोगों को याद दिलाएंगे कि सरकार ने जुबिन की मौत की जांच नहीं करवाई। इसलिए भाजपा चाहती है कि 14 अप्रैल को बिहू शुरू होने से पहले-पहले चुनाव पूरे हो जाएं।’’
और हुआ भी वही जो उसने कहा था। प्रधानमंत्री मोदी 13 और 14 मार्च को असम आए। दो दिन में उन्होंने असम के विकास के लिए दर्जनों योजनाओं की घोषणा की। किसान सम्मान निधि की अगली किस्त प्रदान की, चाय बागान के मजदूरों को जमीन का पट्टा बांटा, 3 नई रेलगाडिय़ां शुरू कीं, सिल्चर से शिलोंग के एक्सप्रैस-वे का भूमि पूजन किया, एक नई जल-विद्युत परियोजना का समर्पण किया। कुल मिलाकर चुनाव की घोषणा से पहले 47,800 करोड़ रुपए बांटे। और हर भाषण में कांग्रेस की पिछली सरकार को कोसा। उसके ठीक अगले दिन, यानी 15 मार्च को, चुनाव आयोग ने 4 राज्यों में चुनाव की घोषणा कर दी और आचार संहिता लागू हो गई। खबर है कि चुनाव आयोग ने आदर्श आचार संहिता को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए हैं। इस जुगलबंदी पर किसी को हैरानी नहीं हुई। इतना तो चलता ही है। हमें आदत पड़ चुकी है।
हमें आदत इस बात की भी पड़ चुकी है कि चुनाव से ठीक पहले सीधे वोटर के खाते में रिश्वत भेजी जाएगी। इस नई परंपरा का पालन करते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को भी चुनाव से ठीक पहले महिलाओं के कल्याण की चिंता सताई। राज्य सरकार की अरुणोदय योजना के तहत स्वयं सहायता समूह की 40 लाख महिलाओं को प्रति माह 1,250 रुपए मिलते हैं। लेकिन इस बार महिला कल्याण की विशेष ङ्क्षचता के चलते उन सभी महिलाओं के खाते में एकमुश्त 9,000 रुपए डाल दिए गए, 6 महीने का अग्रिम भुगतान और साथ में बिहू का बोनस भी। जाहिर है इस साल का बिहू कुछ विशेष है। साथ ही पिछले महीने बेरोजगार युवाओं को ‘जीवन प्रेरणा’ देने के लिए एकमुश्त 2,500 रुपए दिए गए। इस प्रेरणा के पीछे क्या प्रेरणा थी, इस पर किसी ने ध्यान भी नहीं दिया। रेवड़ी संस्कृति पर नाक-भौं सिकोडऩे वाले मीडिया ने नहीं, इस प्रवृति पर चिंता व्यक्त करने वाले सुप्रीम कोर्ट ने भी नहीं। इतना तो चलता ही है। हमें आदत पड़ चुकी है।
आजकल हमें इस बात की आदत भी पड़ चुकी है कि चुनाव आएंगे तो झूठ की आंधी लाएंगे, नफरत बरसाएंगे, खून के छींटे आएंगे। इस मामले में इस बार हिमंत बिस्वा सरमा ने योगी आदित्यनाथ को भी मात दे दी। सरमा ने खुल कर अपनी पार्टी के कार्यकत्र्ताओं से वोटर लिस्ट पुनरीक्षण के दौरान ‘मियां’ लोगों का वोट कटवाने का आह्वान किया, यह दावा भी किया कि उनकी पार्टी ने 5 लाख मियां के खिलाफ आपत्ति दायर की है। यही नहीं, राज्य के मुख्यमंत्री ने अपने राज्य के बंगला भाषी मुस्लिम नागरिकों का आॢथक बायकॉट करने की अपील की। कहा कि मियां रिक्शा वाले को 5 रुपए की जगह 4 रुपए दो, उन्हें हर तरह से तंग करो। एक टी.वी. चैनल के प्रोग्राम में मुख्यमंत्री ने खुलासा किया कि उन्हें पता है कि वह कानूनी तरीके से बंगाली मुसलमान को असम से डिपोर्ट नहीं कर सकते। ‘‘इसलिए मैं प्रैशर बनाता हूं ताकि वे खुद-ब-खुद चले जाएं।’’ अगर इतने से भी किसी को समझ ना आया तो असम भाजपा ने एक वीडियो बनाया, जिसमें सरमा के हाथ में पिस्तौल है और निशाना मियां नुमा मुसलमान और उसके साथ बैठे कांग्रेस नेता पर है। कुछ लोगों को अभी इतनी नंगई की आदत नहीं पड़ी थी, इसलिए उन्होंने क्षोभ व्यक्त किया तो वीडियो को चुपचाप हटा लिया गया। घृणा फैलाने के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। असम के कुछ बुद्धिजीवियों को अभी आदत नहीं पड़ी थी। नादान थे, इसलिए मुख्यमंत्री के बयानों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चले गए। दिन-रात हर छोटे-बड़े मामले में हाथ डालने को तत्पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बैरंग गुवाहाटी हाईकोर्ट वापस भेज दिया। उन्हें भी आदत पड़ जाएगी।
एक आदत अभी हमें नहीं पड़ी है। अमरीका में उसे जेरीमैंडरिंग कहते हैं। यानी चुनाव क्षेत्र की सीमाएं ऐसी बनाई जाएं कि एक पार्टी की विजय पक्की हो जाए। हमने अमरीका से सब कुछ सीख लिया था, लेकिन अभी विकास के इस पायदान तक नहीं पहुंचे थे। असम ने इस बंधन को भी तोड़ दिया। वर्ष 2023 में असम के लोकसभा और विधानसभा चुनाव क्षेत्रों का परिसीमन हुआ। आदेश लिखा चुनाव आयोग ने लेकिन उसका भावार्थ समझाया मुख्यमंत्री ने। उन्होंने शुरू में ही कह दिया था कि इस परिसीमन के माध्यम से मियां मुसलमान का चुनावी असर कम किया जाएगा। और वही हुआ। चुनाव आयोग ने अजीबो-गरीब तरह के क्षेत्र बनाए, कोई सांप जैसा तो कोई केंकड़े के आकार का।
नतीजा यह हुआ कि पहले असम की 126 सीटों में से 29 पर मुस्लिम बाहुल्य था और इस बार उसके बढऩे की संभावना थी। लेकिन अंतत: ऐसे क्षेत्र घटकर 22 रह गए। अभी बाकी देश को इसका पता नहीं है, आदत नहीं पड़ी है। लेकिन आदत का क्या है, पड़ जाएगी! हिंदी के कालजयी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध ने ‘अंधेरे में’ जीने का असर समझाया था-अंधेरे में, सब कुछ जैसे स्वाभाविक लगता है-अन्याय भी, अत्याचार भी, शोषण भी, भ्रष्टाचार भी। अंधेरे में, आदमी धीरे-धीरे सब कुछ सहने का अभ्यास कर लेता है और फिर, उसे लगता है ‘कि यही जीवन है।’ अगर मुक्तिबोध आज होते तो अंत में दो पंक्ति और जोड़ देते-यही चुनाव है, यही लोकतंत्र है।-योगेन्द्र यादव
