कांग्रेस का पतन केंद्रीकरण और छूटे अवसरों की कहानी

punjabkesari.in Saturday, Jan 03, 2026 - 06:02 AM (IST)

बिहार विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार और शीतकालीन सत्र के दौरान संसद में प्रियंका गांधी के शानदार प्रदर्शन पर प्रतिक्रिया देते हुए, कई राजनीतिक विश्लेषक और कांग्रेस पार्टी के सदस्य एक बार फिर राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठा रहे हैं। श्री गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा से जो राजनीतिक प्रभाव हासिल किया था, वह अब लुप्त होता दिख रहा है। एक और यात्रा की चर्चा चल रही है, शायद उनकी छवि और राजनीतिक अपील को बनाए रखने के लिए। हालांकि, पार्टी की दयनीय स्थिति के लिए केवल श्री गांधी को दोष देना अनुचित होगा। यूरोपीय उपनिवेशवाद से भारत की स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 1969 में औपचारिक रूप से विभाजित हो गई। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने अपनी काल्पनिक आत्मकथा ‘द इनसाइडर’ में अपने एक पात्र के माध्यम से कहा है कि ‘‘पार्टी एक स्वामित्व वाली संस्था बन गई थी’’। पुस्तक में यह टिप्पणी आपातकाल के समय के आसपास की है। प्रधानमंत्री कार्यालय और परिवार के भीतर राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण के कारण, जिसमें मुख्यमंत्रियों को केवल रबर स्टैंप बनकर रह जाने का दर्जा प्राप्त हो गया था, ने मिलकर पार्टी के संगठनात्मक पतन में योगदान दिया था।

1980 के दशक में पार्टी का थोड़े समय के लिए पुनरुत्थान हुआ, लेकिन यह केंद्रीकृत मॉडल पर आधारित था। इंदिरा गांधी ‘भारत’ बन गईं। इसके बाद हुए पतन को राजनीतिक विश्लेषकों ने बखूबी दर्ज किया है। राव के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान, उन्होंने पार्टी संगठन को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया और कांग्रेस कार्य समिति के चुनाव कराए, लेकिन यह एक असफल प्रयोग साबित हुआ। हालांकि, अगर 1990 के दशक में देश भर में कांग्रेस का नेतृत्व एकजुट होकर पार्टी का जमीनी स्तर से पुनॢनर्माण करता, तो उसके पास एक सामान्य, मुख्यधारा की अखिल भारतीय राजनीतिक पार्टी के रूप में खुद को फिर से स्थापित करने का अवसर था, जो किसी एक परिवार के करिश्मे पर निर्भर न हो। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी शून्य का लाभ सोनिया गांधी और उनके आसपास के सत्ताधारी अभिजात वर्ग ने उठाया। भारतीय जनता पार्टी के उदय ने कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों और कम्युनिस्टों के साथ मिलकर 2004 में गठबंधन सरकार बनाने का अवसर दिया। सत्ता में वापसी के बाद, कांग्रेस पार्टी क्षेत्रीय नेताओं को सशक्त बनाकर राज्य स्तर पर अपने संगठन को पुनर्जीवित कर सकती थी। केवल वाई.एस. राजशेखर रैड्डी ही ऐसा कर पाए और अंतत: आंध्र प्रदेश में उनके द्वारा निर्मित पार्टी संगठन को दिल्ली नेतृत्व ने धोखा देकर त्याग दिया। अन्य क्षेत्रों में, कांग्रेस शरद पवार, ममता बनर्जी, वाई.एस. जगनमोहन रैड्डी और अन्य लोगों को फिर से इसके खेमे में लाकर संगठनात्मक रूप से पुनर्जीवित हो सकती थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

दूसरी ओर, कार्यकाल का उपयोग नेहरू-गांधी परिवार के नेतृत्व को और मजबूत करने के लिए किया गया। यह सर्वविदित था कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी चाहती थीं कि उनका बेटा पार्टी की बागडोर संभाले। जहां कुछ नेताओं, जिनमें मुखर्जी प्रमुख थे, ने इस वंशवादी उत्तराधिकार का विरोध किया, वहीं अन्य, जिनमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह प्रमुख थे, ने इसे स्वीकार कर लिया। सितम्बर 2013 में, राहुल गांधी ने केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पारित अध्यादेश को सार्वजनिक रूप से अस्वीकार करके प्रधानमंत्री पद के अधिकार को चुनौती दी थी। वाशिंगटन डी.सी. से घर लौटते समय सिंह ने इस्तीफा देने की बजाय मीडिया से कहा कि वह कांग्रेस पार्टी में कोई भी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं और राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने में उन्हें बहुत खुशी होगी।  फैसला हो चुका था। इस सोच पर सवाल उठाने वालों को दरकिनार कर दिया गया। पार्टी के क्षेत्रीय नेतृत्व पर 1969 के बाद एक ही व्यक्ति में राजनीतिक और संगठनात्मक शक्ति के केंद्रीकरण का असर पड़ा। 1998 में उस मॉडल पर वापस लौटने से पार्टी के आधार में और अधिक गिरावट आई। राहुल गांधी को यही क्षीण आधार विरासत में मिला।

भाजपा ने जब इस माहौल में एक संगठन और कार्यकत्र्ता-आधारित पार्टी के रूप में कदम रखा, तो एक दशक के भीतर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे एक व्यक्ति-आधारित पार्टी में बदल दिया। भाजपा के भीतर क्षेत्रीय नेताओं को कमजोर कर दिया गया है, जबकि राजनीतिक रूप से कमजोर लोगों को सत्ता के पदों पर बिठा दिया गया है। यदि भाजपा इसी राह पर चलती रही, तो आर.एस.एस. से वर्तमान में मिल रहे समर्थन के बावजूद, संगठनात्मक रूप से उसका भी पतन होगा। व्यक्तित्व-आधारित राजनीति में प्रत्येक राजनेता अपने व्यक्तित्व को प्रदॢशत करके अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए प्रलोभित होता है। भाजपा के मुख्यमंत्री ऐसा करने से डरते हैं, क्योंकि मोदी ने शिवराज सिंह चौहान जैसे क्षेत्रीय नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया है। वहीं, कांग्रेस पार्टी में राष्ट्रीय नेतृत्व की कमजोरी कर्नाटक में सिद्धारमैया और तेलंगाना में रेवंत रैड्डी जैसे क्षेत्रीय नेताओं को मुखर होने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। शशि थरूर, दिग्विजय सिंह, मनीष तिवारी, अश्वनी कुमार और पृथ्वीराज चव्हाण जैसे अन्य नेताओं का हाल ही में अधिक मुखर और सक्रिय होना भी इस बात का संकेत है कि इस केंद्रीकृत मॉडल को चुनौती देने का प्रयास किया जा रहा है। कांग्रेस में नेतृत्व का विकेंद्रीकरण उसके भविष्य के लिए शुभ सिद्ध होगा, ठीक उसी प्रकार जैसे भाजपा में केंद्रीकरण उसके पतन का कारण बन सकता है।-संजय बारू 


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