‘फंड की कमी से जूझ रही कांग्रेस पार्टी’

2021-02-23T02:00:55.36

एक राजनीतिक दल के लिए धन बहुत महत्वपूर्ण है और यह उस पार्टी के लिए और भी महत्व रखता है जो सत्ता में नहीं है। कांग्रेस पार्टी एक गम्भीर वित्तीय संकट से गुजर रही है और उसने अपने मुख्यमंत्रियों को एस.ओ.एस. भेजा है। पदाधिकारियों की बैठक में यह एक प्रमुख मुद्दा था। केरल, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में आगामी विधानसभा चुनावों के चलते पार्टी पर बेहद दबाव नजर आ रहा है। दुर्भाग्य से ग्रैंड ओल्ड पार्टी कांग्रेस का केवल पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और पुड्डुचेरी में ही शासन है। पुड्डुचेरी में कांग्रेस की सरकार ने विश्वासमत खो दिया है। 

आजादी के बाद 73 वर्षों में से 56 साल तक कांग्रेस सत्ता में रही। आज पार्टी को विभिन्न कारणों से अभूतपूर्व धन संकट का सामना कर पड़ रहा है। पिछले 6 वर्षों के दौरान पार्टी ने बहुत कम धन प्राप्त किया है। इसकी प्रधानता फिर से शुरू होने की सम्भावना नहीं है। दूसरी बात यह है कि 2014 के बाद से भाजपा कांग्रेस से आगे निकल गई है। कांग्रेस के लिए तीसरा संकट नेतृत्व को लेकर है। चौथा, क्षेत्रीय दल भी चंदे के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। पांचवां, निजीदाताओं से किसी भी पार्टी का धन उसके सार्वजनिक विश्वास पर निर्भर करता है। पहले कांग्रेस के पास प्रत्येक राज्य में फंड मैनेजर हुआ करते थे लेकिन केन्द्रीय नियंत्रण के कारण अब यह प्रणाली ध्वस्त हो गई है। 

किसी पार्टी को धन की आवश्यकता क्यों है? इसे राज्य इकाई, मुख्यालयों, कर्मचारियों के वेतन, चुनावी चुनौतियों, नए पार्टी कार्यालय बनाने इत्यादि के लिए धन की आवश्यकता होती है। 2018 में यह निचले स्तर पर पहुंच गया था। पार्टी ने 40 दिवसीय बूथ कमेटी फंड रेजिंग कार्यक्रम अक्तूबर में शुरू किया था और फंड के लिए अपील की थी। कांग्रेस ने अपील करते हुए कहा कि ‘‘पार्टी को आपके समर्थन और मदद की जरूरत है। हमें उस लोकतंत्र को बहाल करने में मदद करें जिसे भारत ने छोटे से योगदान को देकर 70 साल से इसे गले लगाया है।’’ सबसे लोकप्रिय तरीके व्यक्तिगत और कार्पोरेट फंडिंग हैं। 

कांग्रेस पार्टी किसी समय जन आधारित पार्टी थी लेकिन 2014 के बाद से यह एक राज्य के बाद दूसरे राज्य को खोती गई और इस वजह से इसकी तिजोरी खाली हो गई। कुल कार्पोरेट दान के 90 प्रतिशत से अधिक पर कब्जा करने में भाजपा की अभूतपूर्व वृद्धि कांग्रेस की तेज मंदी से जुड़ी हुई है। लम्बे समय से भाजपा कार्पोरेट योगदान के दोहन पर कब्जा जमाए हुए है। ऐसा उस समय भी था जब कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी। 

हाल की के वर्षों में मोदी सरकार ने राजनीतिक फंडिंग में तीन महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। सबसे पहला, राजनीतिक दल अब विदेशी धन प्राप्त कर सकते हैं। दूसरे, कोई भी कम्पनी किसी भी राजनीतिक दल को किसी भी राशि का दान कर सकती है। तीसरा, कोई भी व्यक्ति, लोगो या कम्पनियों का समूह चुनावी बांड के माध्यम से किसी भी पार्टी को गुमनाम तरीके से धन दान कर सकता है। जनवरी 2018 से चुनावी बांड उपलब्ध है। भाजपा तथा कांग्रेस के बीच कार्पोरेट दान में अंतर व्यापक हो रहा है। जो भी कारण हो सत्तारूढ़ दल और प्रमुख विपक्षी दल के बीच राजनीतिक योगदान में इतना महत्वपूर्ण अंतर लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। 

चुनाव आयोग की योगदान रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस पार्टी को 2019-20 के दौरान दान के रूप में 139 करोड़ रुपए मिले थे। पार्टी अभी भी दूसरी सबसे समृद्ध पार्टी है लेकिन वह भाजपा से बहुत पीछे है। पार्टी के संविधान के अनुसार कानून निर्माताओं को कर्मचारियों के अलावा पार्टी को अपनी आय का 1 प्रतिशत देना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं होता है। पार्टी को अपने सदस्यों को और अधिक दान करने और कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल का अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। 2020 में कपिल सिब्बल जो सबसे अधिक व्यक्तिगत दान देने वाले थे, ने पार्टी फंड में 3 करोड़ रुपए दिए जबकि पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने 1 लाख 8 हजार का योगदान दिया। कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी तथा उनके बेटे राहुल गांधी ने 1 अप्रैल 2019 से 31 मई 2020 के बीच 50 हजार और 54 हजार क्रमश: दान दिए। 

कांग्रेस ने आई.टी.सी. और उसकी सहयोगी कम्पनियों से भी 19 करोड़ रुपए प्राप्त किए जबकि प्रूडैंट इलैक्टोरल ट्रस्ट ने 31 करोड़ रुपए का महत्वपूर्ण योगदान दिया। एक राजनीतिक पार्टी रैलियों के दौरान राहत फंड, कूपनों की बिक्री तथा अन्य विविध आबंटन के रूप में धन प्राप्त कर सकती है। अगर चुनाव खर्च कम हो जाता है तो  भारी धन इकट्ठा करने की जरूरत नहीं होती। 

चुनाव आयोग के पास सुझावों की एक लम्बी सूची है जिसमें राजनीति का विकेन्द्रीकरण, राजनीतिक दलों का सुधार, पाॢटयों के खातों का लेखा-जोखा, चुनावों में काले धन की जांच, चुनावों में काले धन पर अंकुश लगाना, पेड न्यूज को एक चुनावी अपराध समझना तथा उम्मीदवारों द्वारा झूठे हलफनामों पर सजा शामिल है। कई पैनलों ने चुनाव सुधारों की सिफारिश की है जिसमें गोस्वामी समिति (1990), बोहरा समिति (1993) तथा विधि आयोग शामिल हैं। इनके अलावा स्टेट फंङ्क्षडग का भी सुझाव है। समय की आवश्यकता चुनावी सुधार है और चुनावी प्रणाली को साफ करने के लिए इन सुधारों को आगे बढ़ाने का समय है ताकि धन शक्ति कम हो। राजनीतिक इच्छा शक्ति और सुधारों पर आम सहमति की जरूरत है।-कल्याणी शंकर
 


Content Writer

Pardeep

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