सांप्रदायिक तत्व देश की शांति में आग लगाने पर तुले
punjabkesari.in Tuesday, Feb 24, 2026 - 05:19 AM (IST)
अलग -अलग तरह के सांप्रदायिक तत्व अपनी जहरीली बातों और हिंसक कामों से देश के शांत माहौल को खराब करने पर तुले हुए हैं। केंद्र सरकार, न्यायपालिका, कार्यपालिका और देश की पूरी नौकरशाही यह सब चुपचाप तमाशबीन बनकर देख रही हैं। यह साफ है कि इनका एक बड़ा हिस्सा संघ के सांप्रदायिक फासीवाद से प्रभावित होकर या डर के मारे हिंसा फैलाने वाले संगठनों और गुंडों का मददगार बन गया है। विज्ञान के जमाने में हम कैसी युवा पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जो उत्तराखंड राज्य में सूफी फकीर बाबा बुल्ले शाह की मजार पर हथियार लेकर तोड़-फोड़ कर रही है और वहां गंदी भाषा बोलते हुए पेशाब करके गर्व महसूस कर रही है।
ऐसी हरकतें उन शब्दों का नतीजा हैं, जो देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने युवाओं के नाम एक भाषण में कहे थे, ‘‘अब मुगल बादशाहों के जुल्मों का बदला लेने का समय आ गया है।’’ अब ङ्क्षहदुओं के पवित्र स्थलों, धार्मिक और सामाजिक आयोजनों में मुसलमानों के शामिल होने पर रोक लगाने का आदेश जारी किया गया है। जिन नौजवान लड़के-लड़कियों के हाथों में साइंस की किताबें होनी चाहिएं, जबान पर प्यार होना चाहिए, भाईचारे और एक-दूसरे की धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करने वाले शब्द होने चाहिएं, वे ‘जय श्री राम’ का नारा लगाकर दूसरे धर्मों को मानने वालों को मारने और उनका अपमान करने में गर्व महसूस करते हैं।
जब कोई धार्मिक जलूस दूसरे धर्म के धार्मिक स्थल के सामने से गुजरता है, तो शरारती लोग जानबूझकर भड़काऊ नारे लगाते हैं और कुछ ही पलों में शांतिपूर्ण माहौल को जंग के मैदान में बदल देते हैं। कानून और व्यवस्था की मशीनरी समय पर कोई कदम नहीं उठाती। और जब कानूनी कार्रवाई करती भी है, तो वह निष्पक्षता के आधार पर नहीं होती। हिंदू गुरु शंकराचार्य (अविमुक्तेश्वरानंद) के साथ ‘हिंदूवादी’ संगठनों के कार्यकत्र्ताओं ने जो बुरा बर्ताव किया, उसने हिंदू धर्म के कीमती इंसानी मूल्यों को चकनाचूर कर दिया है। ऐसा ही बर्ताव संघ परिवार के लोगों ने क्रिसमस के धार्मिक त्यौहार के मौके पर ईसाइयों के साथ किया।
शिक्षण संस्थानों में लगने वाले ‘वामपंथ तुम्हारी कब्र खुदेगी भारत में’ जैसे भद्दे और भड़काऊ नारे देश में भाईचारे की लड़ाई शुरू करने की एक बड़ी साजिश का हिस्सा हैं। इतिहास से मुगल राज को हटाने और मुस्लिम धर्म से जुड़े धार्मिक स्थलों, शहरों, सड़कों, इंस्टीच्यूशंस और इमारतों के नाम बदलने से भले ही मुस्लिम धर्म को कोई नुकसान न हो लेकिन इससे भारत की ‘अनेकता में एकता’ की सोच जरूर खत्म हो जाएगी। जिस गलत परंपरा (धर्म के आधार पर दो राष्ट्रों की थ्योरी) के आधार पर 1947 में मुस्लिम लीग और ब्रिटिश साम्राज्य की सोची-समझी साजिश के तहत भारत को 2 हिस्सों में बांटकर धर्म के आधार पर एक देश ‘पाकिस्तान’ बनाया गया था, हमारे आज के हुक्मरान 21वीं सदी में भी वही बड़ी गलती दोहराना चाहते हैं। यह कैसी देशभक्ति की भावना है?
अपने धर्म के प्रति समर्पण से किसी दूसरे धर्म के लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन जब धर्म का ‘धंधा’ करने वाले ‘तत्व’ अपने धर्म का गुणगान करते हैं और दूसरे धर्मों के लोगों को ‘काफिर’ कहते हैं, तो ये शब्द बहुत बुरा और दुश्मनी पैदा करने वाला है। लखनऊ में मुस्लिम युवाओं को यह कहकर ‘पतंगबाजी’ के खेल में हिस्सा न लेने का आदेश देना कि ‘यह त्यौहार मुसलमानों का नहीं है’, असल में खेल और सामाजिक त्यौहारों जैसे विषयों और रीति-रिवाजों में कड़वाहट और नफरत पैदा करने का खेल है।
वोट पाने के लिए सत्ताधारी दलोंं द्वारा धर्म और धार्मिक पंथों का गलत इस्तेमाल न सिर्फ धर्मों की इंसानी परंपराओं को खत्म कर रहा है, बल्कि मौजूदा लोकतांत्रिक प्रणाली भी खोखली होती जा रही है। पैसे, पावर और ताकत के इस्तेमाल से डैमोक्रेटिक सिस्टम पहले ही अमीर लोगों की ‘रखैल’ बन चुका है। साम्राज्यवादी ताकतें हमेशा ऐसे मौके की तलाश में रहती हैं जब वे देश की संकटग्रस्त आॢथक स्थिति का फायदा उठाकर अपने हितों को बढ़ावा दे सकें। साथ ही, वे विभाजनकारी, सांप्रदायिक और देश-विरोधी तत्वों को बढ़ावा देकर भारत की एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने का पूरा प्रयास करती हैं। भारत की आॢथक और भौगोलिक मजबूती के लिए विभिन्न धर्मों, जातियों, भाषाओं, संस्कृतियों और सामाजिक परिस्थितियों के लोगों की आपसी एकता और सद्भाव बहुत जरूरी है।-मंगत राम पासला
