कॉक्रोच जनता पार्टी : सरकार को किस बात का डर?

punjabkesari.in Wednesday, May 27, 2026 - 03:25 AM (IST)

‘पहले से ही ऐसे परजीवी हैं जो व्यवस्था पर हमला करते हैं और आप भी उनमें शामिल होना चाहते हैं। कॉक्रोच जैसे कुछ युवा हैं जिन्हें कोई रोजगार नहीं मिलता... उनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया, कुछ सूचना के अधिकार और वे हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं’, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेरोजगार युवाओं के बारे में इस टिप्पणी से सोशल मीडिया पर हलचल मच गई, विवादों का अंबार लग गया, और एक नई पार्टी का जन्म हुआ-कॉक्रोच जनता पार्टी (सी.जे.पी.)।

30 वर्षीय संस्थापक अभिजीत दिपके, जो आम आदमी पार्टी के पूर्व सामाजिक कार्यकत्र्ता हैं, के लिए यह एक व्यंग्यात्मक मीम के तौर पर शुरू हुआ था। बाद में यह एक व्यंग्यात्मक आंदोलन/समूह में बदल गया, जिसे उन्होंने ‘आलसी, बेरोजगार और उन भूले-बिसरे नागरिकों के लिए भारत की सबसे ईमानदार पार्टी’ बताया, जिन्हें व्यवस्था ने गिनना ही भूल दिया था। 21 मई तक, सी.जे.पी. के इंस्टाग्राम अकाऊंट पर 16 मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स हो गए थे-जो महज एक दिन में 1,400 प्रतिशत की जबरदस्त बढ़ोतरी थी और भाजपा तथा कांग्रेस के कुल फॉलोअर्स से भी ज्यादा।

जैसी कि उम्मीद थी, हालिया चुनावी जीत का जश्न मना रही घबराई हुई सत्ता ने इंटैलीजैंस ब्यूरो से मिली जानकारी के आधार पर राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए सी.जे.पी. के एक्स हैंडल को रोक दिया और उसके इंस्टाग्राम पेज को ब्लॉक कर दिया। भाजपा कार्यकत्र्ताओं ने इसे ‘डीप स्टेट’ द्वारा चलाया गया एक ‘पॉलिटिकल लैब जेन जी प्रोजैक्ट’ करार दिया। इसे ‘विदेशी हाथ’ बताया और कहा कि यह अमरीका या पाकिस्तान द्वारा रची गई कोई ‘ट्रोजन हॉर्स’ जैसी साजिश है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने युवाओं के दमन पर अपनी नाराजगी जाहिर की, हालांकि उन्होंने सक्रिय रूप से सुनने और पीढ़ीगत सहानुभूति रखने का सतर्क रवैया अपनाया। आलोचकों का कहना है कि दिपके अपनी वैबसाइट खुद ही बंद करके ‘विक्टिम कार्ड’ खेल रहे हैं, जबकि कुछ अन्य लोग ‘देखो और इंतजार करो’ का रवैया अपनाए हुए हैं।

फिर भी, वे असली बात समझने से चूक रहे हैं। एक लोकतंत्र में सत्ता पर व्यंग्य करना और उसे जवाबदेह ठहराना एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है। यह एक ऐसी पीढ़ी की मानसिकता है जो संस्थाओं द्वारा अपमानित महसूस करती है, पाॢटयों द्वारा नजरअंदाज की जाती है और इसे उन नेताओं द्वारा संरक्षण दिया जाता है, जो केवल आज्ञापालन की भाषा बोलते हैं। इस तरह, राजनीतिक भागीदारी के लिए जगह सिकुड़ती जा रही है, जबकि एक मजबूत लोकतंत्र के लिए सभी दृष्टिकोणों की भागीदारी बेहद जरूरी है। यह एक सवाल है कि उस संस्था से डरने की क्या जरूरत है, जिसका अभी-अभी जन्म हुआ है और जो मुख्यधारा की पार्टियों का मजाक उड़ाने की एक व्यंग्यात्मक कोशिश ज्यादा लगती है? निश्चित रूप से, हमारे राजनीतिक तंत्र से नाखुश, भले ही मोदी सबसे लोकप्रिय नेता हों, आर्थिक संकट, बेरोजगारी, नए स्नातक, जो चपरासी की नौकरी के लिए भी पात्रता प्राप्त नहीं कर पाते और इन सबके ऊपर नीट पेपर लीक, जिसमें किसी की कोई जवाबदेही तय नहीं हुई-इन सबने मिलकर सी.जे.पी. को जेन जी (1995-2007) के साथ जोड़ दिया है। जेन जी बेसब्री से ऐसे नए नेताओं की तलाश में है, जो उन्हें नई उम्मीद दे सकें। हालांकि इसकी शुरुआत एक मजाक के तौर पर हुई थी, लेकिन सी.जे.पी. अब उससे कहीं ज्यादा बड़ी चीज बन गई है। बार-बार दोहराए जाने से इसे वैधता मिली है, मीडिया ने इसे खूब उछाला है और विपक्षी समूह इसे अपने संक्षिप्त संदेशों के तौर पर अपनाकर खूब फायदा उठा रहे हैं, जो कहीं न कहीं जनता के मन, उनकी मंजूरी या उनकी चिंताओं को दिखाता है।

फिर भी, सी.जे.पी. ज्यादातर एक वैचारिक घटना है, जनमत में उठी एक कहानी की लहर। बेशक, इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि सी.जे.पी. की लोकप्रियता तेजी से बढ़ेगी और फिर अचानक खत्म हो जाएगी, या यह पूरे मतदाताओं की बजाय सिर्फ कुछ ‘ईको चौंबर्स’ (अपनी ही सोच वाले लोगों के समूह) का ही प्रतिनिधित्व करेगी। हो सकता है कि यह सिर्फ राजनीतिक संदेश देने का एक जरिया बनकर रह जाए, क्योंकि चुनाव आज भी सरकारी योजनाओं के लाभ, नेता की छवि, जाति/समुदाय के समीकरणों और स्थानीय प्रशासन के आधार पर ही तय होते हैं, न कि मीम वाले नारों के आधार पर। यह साफ है कि सी.जे.पी. के अकाऊंट को ब्लॉक किया जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि असली समस्या इस देश के बेचैन युवाओं में नहीं है, चाहे वे रोजगारशुदा हों या बेरोजगार और चाहे उनके पास संदिग्ध डिग्रियां हों या न हों। इसकी बजाय, असली समस्या तो ‘मजबूत’ कही जाने वाली सरकार की उस आदत में है, जिसके तहत वह अक्सर ही व्यंग्य और हास्य की आवाजों को मतभेदों और असहमति को दबाने के लिए अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करती है। वे यह भूल जाते हैं कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा गुण यही है कि वह जनता की भावनाओं, उनकी कुंठाओं और उनकी शिकायतों को व्यक्त करने के लिए एक मंच उपलब्ध कराता है। 

नि:संदेह, सी.जे.पी. से कुछ अहम सबक मिलते हैं। अगर हमारे नेता इन्हें नजरअंदाज करेंगे, तो इसका खामियाजा उन्हें खुद ही भुगतना पड़ेगा। बेरोजगारी, बढ़ती कीमतें और हर तरफ फैला भ्रष्टाचार-ये न सिर्फ एक विस्फोटक स्थिति पैदा करते हैं, बल्कि असमानता और लोगों को दुख-तकलीफ देने वाले लोगों के खिलाफ एक जायज गुस्सा भी जगाते हैं। यह आॢथक शिकायतों, बढ़ती बेरोजगारी और राजनीतिक जवाबदेही की मांगों का एक बेहद खतरनाक और जोरदार मेल है। साथ ही, यह हमारे नेताओं के लिए एक चेतावनी भी है-उन नेताओं के लिए, जो यह भूल जाते हैं कि वे आम आदमी के बेहतर जीवन के सपनों को पूरा करने की उम्मीदों की वजह से ही उस पद पर हैं, यानी रोजगार, शिक्षा और गरिमा। बेहतर होगा कि वे इस बात पर ध्यान दें और किसी मकसद और सोच-समझ के साथ काम करें। 
आगे क्या? भारत को पारदॢशता, सहिष्णुता और समावेशिता-राजनीतिक और आर्थिक के प्रति प्रतिबद्धता की जरूरत है। निष्पक्षता की भावना को एक आवाज चाहिए, जो केवल सार्वजनिक संवाद और ईमानदार चर्चा के माध्यम से ही हासिल की जा सकती है, न कि केवल दिखावटी इशारों और बेतुकी बयानबाजी से, जिनका कोई मतलब नहीं होता। हमारी राजनीति को यह सुनने की जरूरत है कि जेन जी क्या कह रही है। यही कारण है कि सी.जे.पी. उनके मिजाज को पकड़ती है और उनसे जुड़ाव महसूस करती है। याद रखें, व्यंग्य वहां पहुंचता है, जहां राजनीति अपनी विश्वसनीयता खो चुकी होती है।

उन युवा मतदाताओं के लिए, जो एल्गोरिदम की मनमानी के बीच पले-बढ़े हैं, विरासत कोई करिश्मा नहीं है और खानदानी उपनाम उन्हें प्रभावित नहीं करते। वे हर चीज पर सवाल उठाते हैं। यहां तक कि ‘आधिकारिक’ कही जाने वाली पतली सी परत पर भी। तमिलनाडु में विजय का उदय इसका एक जीता-जागता उदाहरण है। नि:संदेह, सी.जे.पी. की ताकत इस बात में निहित है कि वह हास्य को एक समुदाय में बदल देती है, आलसी को अति-सक्रिय, बेरोजगार को संवाद करने वाला, जुझारूपन को जीवित रहने की वृत्ति में बदल देती है और इस तरह एक मजाक एक सामूहिक आवाज बन जाता है। यह आवाज है - रोजगार के लिए, निष्पक्ष परीक्षाओं के लिए, एक किफायती भविष्य के लिए, अभिव्यक्ति की आजादी के लिए, स्वच्छ संस्थाओं के लिए और बिना किसी खानदानी उपनाम के राजनीति में प्रवेश के लिए।
अब समय आ गया है कि हमारे नेता यह समझें कि सबसे बेहतरीन राजनीतिक व्यवस्थाएं ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और निष्पक्षता के सर्वोच्च सिद्धांतों पर आधारित होती हैं। जब लंबे समय से दबी हुई, उभरती हुई जेन जी और उत्सुक जेन वाई की आवाज मुखर होगी, तो यह भारतीय राजनीति के पतन की घंटी बजा देगी। अब समय है-लोकतंत्र की रक्षा करने का। अन्यथा, दीवार पर लिखी इबारत पढ़ लें-या तो सुधर जाओ, या फिर बाहर का रास्ता देखो।-पूनम आई. कौशिश
 


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