संघ के प्रचारक बनने वाले पंजाब के पहले सिख चिरंजीव सिंह

punjabkesari.in Saturday, Dec 02, 2023 - 05:41 AM (IST)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 1925 में स्थापना के बाद से ही इसके कार्य के विस्तार और मजबूती के लिए सुख सुविधाओं और परिवार को त्याग कर अपना जीवन संघ को समॢपत करने वाले युवाओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है। ऐसे युवाओं को संघ की भाषा में प्रचारक कहा जाता है। ऐसे ही थे पंजाब के सरदार चिरंजीव सिंह, जिन्होंने केवल 23 वर्ष की आयु में भरी जवानी में 1952 में अपना परिवार छोड़ कर संघ कार्य को अपना लिया और अंतिम सांस तक संघ कार्य के लिए समर्पित रहे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बनने वाले पंजाब के पहले सिख थे। उन्होंने देश की एकता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

चिरंजीव सिंह जी का जन्म 1 अक्तूबर, 1930 को पटियाला में एक किसान श्री हरकरण दास (तरलोचन सिंह) एवं श्रीमती द्वारकी देवी (जोगेंद्र कौर) के घर हुआ। मां सरकारी विद्यालय में पढ़ाती थीं। इनसे पहले दो भाई और भी थे पर वे जीवित नहीं रहे। मां द्वारकी देवी ने मंदिरों और गुरुद्वारों में खूब पूजा अर्चना के बाद वरदान स्वरूप जन्मे इस बालक का नाम चिरंजीव रखा। 1952 में उन्होंने राजकीय विद्यालय, पटियाला से बी.ए. किया। वे बचपन से ही सब धर्मों और पंथों के संतों के पास बैठते थे। 1944 में कक्षा सात में पढ़ते समय वे अपने मित्र रवि के साथ पहली बार शाखा गए। वहां के खेल, अनुशासन, प्रार्थना और नाम के साथ ‘जी’ लगाने से वे बहुत प्रभावित हुए। शाखा में वे अकेले ही केशधारी सिख थे। 

1946 में वे संघ के प्राथमिक वर्ग और फिर 1947, 50 और 52 में तीनों वर्ष के संघ शिक्षा वर्गों में गए। 1946 में गीता विद्यालय, कुरुक्षेत्र की स्थापना पर संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी के भाषण ने उनके मन पर अमिट छाप छोड़ी। 1948 के प्रतिबंध काल में वे सत्याग्रह कर 2 मास जेल में रहे। बी.ए. के बाद वे अध्यापक बनना चाहते थे; पर विभाग प्रचारक बाबू श्रीचंद जी के आग्रह पर 1953 में वे प्रचारक बन गए। वे मालेरकोटला, संगरूर, पटियाला, रोपड़, लुधियाना में तहसील, जिला, विभाग व सह संभाग प्रचारक रहे। लुधियाना 21 वर्ष तक उनका केन्द्र रहा। संघ शिक्षा वर्ग में वे 20 वर्ष शिक्षक और चार बार मुख्य शिक्षक रहे। 1984 में उन्हें विश्व हिन्दू परिषद, पंजाब का संगठन मंत्री बनाया गया। इस दायित्व पर वे 1990 तक रहे। 

इससे पूर्व ‘पंजाब कल्याण फोरम’ बनाकर सभी पंजाबियों में प्रेम बनाए रखने के प्रयास किए जा रहे थे। इसी प्रयास के अंतर्गत 1982 में अमृतसर में एक सर्व धर्म सम्मेलन भी करवाया गया। 1987 में स्वामी वामदेव जी व स्वामी सत्यमित्रानंद जी के नेतृत्व में 600 संतों ने हरिद्वार से अमृतसर तक यात्रा की और अकाल तख्त के जत्थेदार दर्शन सिंह जी से मिलकर एकता का संदेश गुंजाया। गुरु नानकदेव जी के प्रकाश पर्व पर 24 नवम्बर, 1986 को  अमृतसर में ‘राष्ट्रीय सिख संगत’ का गठन किया गया। स. शमशेर सिंह गिल इसके अध्यक्ष तथा चिरंजीव जी महासचिव बनाए गए। 1990 में शमशेर जी के निधन के बाद चिरंजीव जी इसके अध्यक्ष बने। संघ के आजीवन प्रचारक सरदार चिरंजीव सिंह जी ने दशकों तक पंजाब में काम किया। अपने अथाह प्रयास एवं परिश्रम, पंजाब की गुरु-परंपरा के गहन अध्ययन तथा उत्कृष्ट संगठनात्मक कौशल के कारण उन्होंने असंख्य लोगों को राष्ट्रवाद की धारा में शामिल किया। सरदार चिरंजीव सिंह जी के स्नेह और मधुर व्यक्तित्व ने सभी का दिल जीत लिया था। 

चिरंजीव जी ने संगत के काम के लिए देश के साथ ही साथ विदेशों इंगलैंड, कनाडा, जर्मनी, अमरीका आदि में प्रवास किया। उनके कार्यक्रम में हिन्दू और सिख दोनों आते थे। 1999 में ‘खालसा सिरजना यात्रा’ पटना में सम्पन्न हुई। वर्ष 2000 में न्यूयार्क के ‘विश्व धर्म सम्मेलन’ में वे 108 संतों के साथ गए जिनमें आनंदपुर साहिब के जत्थेदार भी शामिल थे। ऐसे कार्यक्रमों से सिख संगत का काम विश्व भर में फैल गया। इसे वैचारिक आधार देने में 5वें सरसंघचालक सुदर्शन जी का भी बड़ा योगदान रहा। वर्ष 2003 में वृद्धावस्था के कारण उन्होंने अध्यक्ष पद छोड़ दिया। 

20 नवम्बर 2023 को प्रात: 08:30 बजे 93 वर्ष की आयु में लुधियाना में सरदार जी अपने श्वासों की पूंजी को समेटते हुए प्रभु चरणों मे जा विराजे। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 21 दिसंबर, 2015 को दिल्ली के मावलंकर ऑडिटोरियम में अपने 85 वें जन्मदिन का जश्न मनाने के लिए एक विशेष समारोह में चिरंजीव सिंह को सम्मानित किया था और लगभग 85 लाख रुपए दिए थे, हालांकि, चिरंजीव सिंह ने तुरंत पूरी राशि केशव स्मारक समिति को दान कर दी थी। उनकी श्रद्धांजलि सभा 2 दिसम्बर 2023 पटियाला में आयोजित होगी।-सुरेश कुमार गोयल 
     


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