सी.बी.आई. : अपने आका की आवाज, सांठगांठ का ब्यूरो
punjabkesari.in Wednesday, Mar 04, 2026 - 03:39 AM (IST)
मध्य -पूर्व में ईरान के विरुद्ध अमरीका और इसराईल द्वारा युद्ध छेडऩे के बाद सारे विश्व में हाहाकार मचा हुआ है, तो भारत में भाजपा और ‘आप’ सी.बी.आई. की विशेष अदालत द्वारा दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित 23 आरोपियों को दिल्ली आबकारी नीति 2021 के मामले में अनियमितता और रिश्वतखोरी में भूमिका के लिए उन्हें बरी करने से एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।
स्पष्ट रूप से सी.बी.आई. इस निर्णय से असहमत है और वह अपील करेगी किंतु अभी तक 2009 के 2जी घोटाले में अंतिम निर्णय नहीं आया और यह अभी उच्च न्यायालय में ही पड़ा है। किंतु यह महत्वपूर्ण नहीं है। कोई भी समाज षड्यंत्र, अपराध और भ्रष्टाचार से ऊपर नहीं है। अमरीका ने एपस्टीन फाइल खोली। इस मामले में केजरीवाल की ‘आप’ कठघरे में थी, जिससे उनकी पार्टी को सत्ता से हाथ धोना पड़ा। पद पर रहते हुए किसी मुख्यमंत्री को जेल भेजा गया और यही पिछले वर्ष दिल्ली विधानसभा चुनावों में मुख्य मुद्दा बना, जिसमें भाजपा की जीत हुई। इससे स्पष्ट होता है कि हमारे राजनेता हमेशा सी.बी.आई. जांच की मांग क्यों करते हैं। जो नेता सत्ता में होते हैं वे एजैंसी को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं। यह एक दंतविहीन शेर है जो अपने मित्रों की सहायता करता है और विरोधियों के साथ राजनीतिक हिसाब चुकता करता है, क्लीन चिट देता है, राजनीतिक लीपापोती करता है और कानून प्रवर्तकों को कानून तोडऩे वाला और अपराध तथा भ्रष्टाचार को वैध बनाता है।
ऐसे अनेक आरोप हैं कि एजैंसी का उपयोग किस तरह राजनीतिक विरोधियों को धमकाने और दबाने के लिए किया जाता है, चाहे कांग्रेस की सरकार में हो या मोदी सरकार में। राजनीतिक विरोधियों पर छापे डाले जाते हैं और इसमें प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग एजैंसी के सहयोगी बन जाते हैं। प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जाती है, घंटों तक पूछताछ की जाती है, चार्जशीट बनाई जाती है। महत्वपूर्ण मामले में धीमी कार्रवाई की जाती है, जांच में गड़बड़ी की जाती है या उसे अधूरा छोड़ दिया जाता है या बिल्कुल नहीं की जाती। परिणामस्वरूप होता यह है कि अंतत: सी.बी.आई. मामले को सिद्ध नहीं कर पाती। यदि ऐसे मामले में आरोपी मान जाता है तो दबाव कम कर दिया जाता है और यदि नहीं मानता तो दबाव बढ़ा दिया जाता है।
दुखद तथ्य यह है कि आज व्यवस्था ऐसी हो गई है कि जो भी दल सत्ता में आता है, सी.बी.आई. उसकी कठपुतली बन जाती है। अपने विरोधियों को दबाने के लिए सी.बी.आई. का दुरूपयोग किया जाता है, चाहे कोई भी दल सत्ता में हो। देश के 19 राज्यों में विभिन्न अदालतों में सांसदों और विधायकों के विरुद्ध 3211 मामले लंबित हैं। इनमें कुछ ऐसे मामले भी हैं, जिनकी जांच सी.बी.आई. द्वारा की जा रही है। इससे एजैंसी की प्रतिष्ठा खराब हुई है क्योंकि वह आरोपों के समर्थन में अपेक्षित साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाती। इससे भ्रष्टाचार को समाप्त करने की उसकी ईमानदारी और विश्वसनीयता पर भी आशंकाएं पैदा होती हैं।
सी.बी.आई. जांच में मुख्य बात यह होती है कि हमेशा कहा जाता है कि उचित प्रक्रिया का पालन किया जाएगा, किंतु सत्तारूढ़ वर्ग द्वारा अपने राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध सी.बी.आई. को एक औजार बनाया जाता है। जब एजैंसी धनशोधन निवारण अधिनियम के कठोर प्रावधानों को लागू करती है तो यह अपेक्षा की जाती है कि ठोस साक्ष्य होंगे और मामला भी ठोस बनाया जाएगा। किंतु जब ये मामले न्यायालय में विचारण से पहले ही गिर जाते हैं तो इससे राजनीतिक उद्देश्यों के बारे में प्रश्न उठते हैं। समय आ गया है कि सी.बी.आई. जांच के उच्च मानक स्थापित करे। उसे यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उसे न केवल कानून से, अपितु जनता के विश्वास से भी शक्ति मिलती है और जब वह गलत या स्वार्थ प्रेरित जांच करती है तो इससे संस्थागत विश्वसनीयता भी समाप्त होती है।
इसका तात्पर्य यह नहीं है कि भ्रष्टाचार के मामलों की जांच नहीं होनी चाहिए या हमारे नेताओं को विशेष छूट मिलनी चाहिए। वास्तविकता यह है कि जवाबदेही अपरिहार्य है। किंतु इसके लिए सी.बी.आई. को पारदर्शी ढंग से कार्य करना होगा और कानूनी रूप से उचित प्रमाण और साक्ष्य जोडऩे होंगे। उसे अपने राजनीतिक माई-बाप के इशारों पर न तो कार्य करना चाहिए और न ही ऐसा दिखना चाहिए कि वह उसके इशारे पर कार्य कर रही है क्योंकि ऐसी धारणा से जनता का कानून के शासन में विश्वास कमजोर होता है और भ्रष्टाचारियों के हौसले बुलंद होते हैं।
गत वर्षों में विभिन्न सरकारें सी.बी.आई. को स्वायत्तता देने और उसके कार्यकरण में सुधार की बात करती रही हैं, किंतु दुर्भाग्यवश अभी तक ऐसा नहीं हो सका। ऐसी स्थिति बन गई है कि जवाबदेही सुनिश्चित करने की बजाय सी.बी.आई. को राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया है। प्रधानमंत्री मोदी अक्सर शासन में पारदॢशता की बातें करते हैं। समय आ गया है कि अब इन बातों को लागू किया जाए और सी.बी.आई. को स्वतंत्र एजैंसी बनाया जाए, जहां पर वह अपने आका की आवाज न बने और शक्ति का दुरूपयोग न करे। न्यायालय का संदेश स्पष्ट है कि न्याय में देरी हो सकती है, किंतु इससे वंचित नहीं रखा जाना चाहिए। अब गेंद सरकार के पाले में है। क्या सी.बी.आई. सरकार द्वारा निर्देशित होगी या कानून द्वारा?-पूनम आई. कौशिश
