पैर फैला रही पूंजीवादी व फासीवादी ताकतें

punjabkesari.in Wednesday, Jan 07, 2026 - 05:53 AM (IST)

बंगलादेश में सांप्रदायिक तत्वों द्वारा वहां के धार्मिक अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर किए जा रहे हिंसक हमले और भीड़ द्वारा धार्मिक स्थलों की बेअदबी करना हर पहलू से निंदनीय और बेहद चिंताजनक घटनाक्रम है। धार्मिक अल्पसंख्यक आबादी पर कातिलाना हमलों का यह घिनौना सिलसिला अफगानिस्तान, पाकिस्तान और कई अन्य देशों में भी देखा गया है। अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा आदि देशों के भीतर कुछ सिरफिरे अंधाधुंध गोलियां चलाकर बेगुनाहों की लाशों के ढेर लगा देते हैं। दक्षिणपंथी-पिछड़ी सोच वाले ये कातिल गिरोह अक्सर धर्म-जाति, रंग-नस्ल, प्रवास या क्षेत्रीय मुद्दों को आधार बनाकर अपने उक्त कुकर्मों को सही सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।

भारत के भीतर भी प्रतिक्रियावादी दुिंत्ववादी संगठनों (बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद आदि) के अराजकतावादी कार्यकत्र्ता और इनके द्वारा पाले गए पेशेवर अपराधी तत्व मुस्लिम और ईसाई धार्मिक अल्पसंख्यकों, दलितों, महिलाओं और प्रगतिशील लोगों को हिंसक हमलों का निशाना बनाते हैं। अपने इन अमानवीय कार्यों को उचित ठहराने के लिए अशांति के इन दूतों ने देश की बहुसंख्यक हिंदू आबादी को धार्मिक अल्पसंख्यकों (मुसलमानों, ईसाइयों आदि) से ‘फर्जी खतरे’ का एक काल्पनिक विमर्श (नैरेटिव) गढ़ा हुआ है। पिछले लगभग 11 साल से आर.एस.एस. की सोच और दिशा के अनुसार राज-काज चला रही भाजपा के नेतृत्व वाली मोदी सरकार ने इन्हें पूरी सरपरस्ती ‘बख्शी’ हुई है। पिछले दिनों ईसाइयों के पवित्र त्यौहार क्रिसमस के अवसर पर बजरंग दल और कई अन्य अराजकतावादी संगठनों के हुड़दंगियों ने बेखौफ होकर वहशियाना ढंग से धार्मिक आयोजनों के लिए तैयार किए गए पंडाल तोड़े और ईसा मसीह की मूर्तियां खंडित कीं।

गंगा स्नान करने गए विदेशियों के सिरों से क्रिसमस की झलक देने वाली टोपियों का उतारा जाना और सरङ्क्षहद में श्री गुरु गोदिं सिंह जी के दो छोटे साहिबजादों की याद में मनाए जाने वाले शहीदी जोड़ मेले में निहंग बाणा पहने कम उम्र के 2 बच्चों द्वारा लोगों के सिरों पर पहनी गई टोपियों को जबरन उतारना और नेजों पर टांग कर भद्दी किस्म की संकीर्णता का प्रदर्शन किया जाना, विभिन्न धर्मों के अनुयायियों के भीतर जोर पकड़ रही सांप्रदायिक सोच और कट्टरता को दर्शाता है। 2008 से अमरीका से शुरू हुई ‘पूंजीवादी आॢथक मंदी’, जिसने दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया, ने पूरी दुनिया की राजनीति में घमासान मचा रखा है। इस महामंदी की अभिव्यक्ति बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, तालाबंदी, छंटनी, वित्तीय लेनदेन में बार-बार पैदा हो रही अस्थिरता आदि के रूप में देखी जा सकती है। विभिन्न देशों की पूंजीवादी सरकारें, वहां के कॉर्पोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय निगमों के असीमित मुनाफे में और वृद्धि करने में लगी हुई हैं। दूसरी ओर, संकट की सबसे अधिक मार झेल रहे श्रमिक वर्गों को कोई राहत देने की बजाय उन पर टैक्स आदि का बोझ और अधिक लादा जा रहा है, सुविधाओं और सबसिडी में निरंतर कटौती की जा रही है। 

पूंजीवादी व्यवस्था में पनपे इस आॢथक संकट ने दुनिया के अनेक देशों में तानाशाह प्रवृत्तियों वाली दक्षिणपंथी और फासीवादी ताकतों को अपने पैर पसारने और लोकतांत्रिक व्यवस्था को बलि का बकरा बनाने के लिए बहुत अच्छा अवसर प्रदान किया है। अमरीका, भारत, फ्रांस, इटली, जर्मनी, अर्जेंटीना आदि देशों में दक्षिणपंथी सरकारों का अस्तित्व में आना इस तथ्य की पुष्टि करता है। इन सरकारों द्वारा मेहनतकश वर्गों को मिलने वाली मामूली आॢथक सुविधाएं, कानूनी अधिकार और सामाजिक सुरक्षा वापस लेकर इन वर्गों को गरीबी के जंजाल में फंसाकर गुलामी की जंजीरों में जकड़ा जा रहा है। इन कदमों के विरोध में दुनिया के विकसित पूंजीवादी देशों फ्रांस, इटली, जर्मनी, अमरीका, स्पेन, इंगलैंड, पुर्तगाल, ऑस्ट्रेलिया आदि के लाखों लोग सड़कों पर उतरे हैं और लंबी हड़तालें हुई हैं। भारत की केंद्र सरकार द्वारा भी यही आर्थिक नीतियां लागू की जा रही हैं, जो मजदूर वर्ग के लंबे संघर्षों और भारी कुर्बानियों के फलस्वरूप हासिल किए गए अधिकारों और रियायतों पर प्रहार करती हैं। मोदी सरकार द्वारा क्रांतिकारी कानूनों में से एक गिने जाने वाले ‘मनरेगा’ को खत्म करके रोजगार गारंटी से पूरी तरह भागने वाला नया ‘वीबी जी राम जी’ कानून लाना अत्यंत गरीब लोगों के साथ एक भद्दा मजाक है।

इस बात का संतोष है कि दुनिया के श्रमिकों का एक बड़ा हिस्सा अपने कड़वे अनुभवों से सीखकर पूंजीवादी ढांचे की बेरहम लूट से मुक्ति के लिए ‘समाजवादी व्यवस्था’ के निर्माण की अनिवार्य आवश्यकता को अनुभव करने लगा है। अमरीका, जहां ‘कम्युनिस्ट’ और ‘समाजवाद’ शब्दों को कभी बहुत बड़ा हौव्वा बना दिया गया था, वहां भी अब मजदूर-किसान और युवा हाथों में ‘समाजवाद’ के बैनर और लाल झंडे लिए सड़कों पर जोरदार नारे लगाते अक्सर देखे जा सकते हैं। नए साल के भीतर हम भी प्रयास करें कि भारत भी इस कार्य में पीछे न रहे।-मंगत राम पासला


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