‘अफसरशाही’ बनाम ‘नौकरशाही’

2020-10-13T02:16:57.357

वैसे तो यह कोई नया विषय नहीं है। जबसे हमें अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति मिली है, तबसे यह चर्चा का विषय रहा है कि देश का ‘स्टील फ्रेमवर्क’ मानी जाने वाली कार्यपालिका किसके प्रति जवाबदेह है? उस जनता के प्रति जिसके कर के पैसे से इसे वेतन और सुविधाएं मिलती हैं या राजनेताआें के प्रति जो हर चुनाव में बदलते रहते हैं? 

आम व्यवहार में देखने में यह आता है कि जिस जनता की सेवा के लिए इस तंत्र को खड़ा किया गया है और पाला-पोसा जाता है, उस जनता के प्रति इन तथाकथित जनसेवकों का व्यवहार बहुत निराशाजनक और सामंतवाद की दुर्गंध लिए होता है। एेसा नहीं है कि इसके अपवाद नहीं हैं पर उनका प्रतिशत लगातार घटता जा रहा है। कार्यपालिका के इस तंत्र को नौकरशाही कहा जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, नौकर यानी सेवक, जो अपने मालिक की विनम्रता से और ईमानदारी से सेवा करे। इस परिभाषा के अनुसार हर नौकरशाह को आम जनता यानी गरीब से गरीब आदमी की सेवा करने, उसकी फरियाद सुनने और उसकी समस्याओं का हल करने के लिए 24 घंटे खुले दिल से तत्पर रहना चाहिए जबकि होता इसका उल्टा है। 

नौकरशाहों के सरकारी बंगलों पर प्राय: गरीब या आम आदमी को फटकार, तिरस्कार या उपेक्षा मिलती है। जबकि भ्रष्ट, अपराधी या माफिया किस्म के लोगों को, उनके राजनीतिक सम्पर्कों के कारण, विशिष्ट व्यक्तियों का सा सम्मान मिलता है। जबकि दुत्कारा जाने वाला व्यक्ति अपने खून-पसीने की कमाई से नौकरशाही का भरण-पोषण करता है और सार्वजनिक संसाधनों और बैंकों को अवैध तरीके से लूटने वाला तथाकथित बड़ा आदमी समाज पर जोंक की तरह होता है। फिर भी नौकरशाही अपने असली मालिकों की उपेक्षा करके इन नकली मालिकों के आगे झुकती है। उसके इसी रवैये के कारण देश तरक्की नहीं कर पा रहा और लुटता रहता है। 

जिन राजनीतिक आकाआें के सामने इस तंत्र को अफसरशाही दिखानी चाहिए, वहां ये दुम दबाकर नौकरशाह बन जाते हैं। अफसरशाही मतलब हर मुद्दे को कानून के दायरे में समझ कर और उसके व्यावहारिक हल ढूंढ कर मंत्री के आगे प्रस्तुत करना अफसरशाही का कत्र्तव्य होता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि बिना राग द्वेष के हर मुद्दे पर अफसर अपनी निष्पक्ष राय प्रस्तुत करेगा, जिससे मंत्री को सही निर्णय लेने में सुविधा होगी। 

इतना ही नहीं, अगर मंत्री अपने दल या स्वयं के लाभार्थ अफसर पर अनुचित दबाव डालकर कुछ अवैध या अनैतिक काम करवाना चाहता है तो अफसर का फर्ज होता है कि वह उसे एेसा करने से रोके या उसे फाइलों के पेचों में उलझाकर उसके इरादों को कामयाब न होने दे जिससे जनता और देश का भला हो। पर होता इसका उल्टा है। अपने राजनीतिक आकाआें को खुश करने के लिए अफसरशाही झुकना तो छोटी बात है, उनके आगे साष्टांग लेटने में भी संकोच नहीं करती। स्पष्ट है कि एेसा अनैतिक कृत्य करने के पहले अफसर को यह विश्वास होता है कि इस ‘सेवा’ का उसे अपेक्षा से ज्यादा व्यक्तिगत लाभ मिलेगा। इसलिए वह लालच के अंधे कुएं में डूबता चला जाता है। एेसा कम ही होता है कि इस तरह का भ्रष्ट आचरण करने वाला अफसर कभी कानून के शिकंजे में फंसता हो। 

हास्य कवि काका हाथरसी की एक मशहूर कविता है, ‘क्यों डरता है बेटा रिश्वत लेकर-छूट जाएगा तू भी रिश्वत देकर’। अच्छी और कमाऊ पोस्टिंग के लालच में अफसरशाही अपने राजनीतिक आकाआें के आगे दुम हिलाती हुई नौकरशाह बनी सेवा को तत्पर खड़ी रहती है। इसीलिए देश में आए दिन हजारों बड़े-बड़े घोटाले होते रहते हैं। और किसी का कुछ नहीं बिगड़ता। एक बार फिर मध्य प्रदेश की आई.ए.एस. अधिकारी दीपाली रस्तोगी की इस स्वीकारोक्ति को यहां लाना सार्थक होगा। अपने एक लेख में दीपाली लिखती हैं : 

हम अपने बारे में, अपनी बुद्धिमता के बारे में और अपने अनुभव के बारे में बहुत ऊंची राय रखते हैं और सोचते हैं कि लोग इसीलिए हमारा सम्मान करते हैं। जबकि असलियत यह है कि लोग हमारे आगे इसलिए समर्पण करते हैं क्योंकि हमें फायदा पहुंचाने या नुक्सान करने की ताकत दी गई है। पिछले दशकों में हमने एक आदत डाल ली है कि हम बड़ी तादाद में खैरात बांटने के अभ्यस्त हो गए हैं, चाहे वह वस्तु के रूप में हो या विचारों के रूप में। असलियत यह है कि जो हम बांटते हैं वह हमारा नहीं होता। 

हमें वेतन और सुविधाएं इसलिए मिलती हैं कि हम अपने काम को कुशलता से करें और ‘सिस्टम’ विकसित करें। सच्चाई यह है कि हम कुप्रबंध और अराजकता फैला कर पनपते हैं क्योंकि एेसा करने से हम कुछ को फायदा पहुंचाने के लिए चुन सकते हैं और बाकी की उपेक्षा कर सकते हैं। हमें भारतीय गणतंत्र का ‘स्टील फ्रेम’ माना जाता है। सच्चाई यह है कि हममें दूरदृष्टि ही नहीं होती। हम अपने राजनीतिक आकाआें की इच्छा के अनुसार औचक निर्णय लेते हैं। 

हम पूरी प्रशासनिक व्यवस्था का अपनी जागीर की तरह अपने फायदे में या अपने चहेते लोगों के फायदे में शोषण करते हैं। हम काफी ढोंगी हैं क्योंकि  यह सब करते हुए हम यह दावा करते हैं कि हम लोगों की ‘मदद’ कर रहे हैं। हम जानते हैं कि अगर हम एेसी व्यवस्था बनाएं जिसमें हर व्यक्ति आसानी से हमारी सेवाआें का लाभ ले सके, तो हम फालतू हो जाएंगे। इसलिए हम अव्यवस्था को चलने देते हैं। हम अपने कार्यक्षेत्र को अनावश्यक विस्तार देते जाते हैं। बिना इस बात की चिंता किए कि हमारे द्वारा बनाई गई व्यवस्था में कुशलता है कि नहीं। सबसे खराब बात यह है कि हम बहुत दिखावटी, दूसरों को परेशान करने वाले और बिगड़ैल लोगों का समूह हैं।

बावजूद इसके हम यह कहने में संकोच नहीं करते कि हम इस देश की जनता के लिए काम करते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि इस देश से हमें कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि हमारे बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं और हमने जो भी सुख-सुविधाएं, जो व्यवस्था में मिल सकती हैं उन्हें अपने लिए जुटा कर अपने सुखी जीवन का प्रबंध कर लिया है। हमें आम जनता के लिए कोई सहानुभूति नहीं होती हालांकि हम सही प्रकार का शोर मचाने के लिए सतर्क रहते हैं। अगर इस देश में न्याय किया जाता तो हम बहुत पहले ही लुप्त हो जाते। पर हम इतने ज्यादा ताकतवर हैं कि हम अपने अस्तित्व को कभी समाप्त नहीं होने देते क्योंकि हम भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं।-विनीत नारायण
 


Pardeep

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