बॉलीवुड भी पुलिस को बदनाम करने में पीछे नहीं रहा

2021-06-25T06:10:50.307

पुलिस को विरासत में अपने चेहरे पर ऐसे गहरे दाग मिले हैं जो मिटाने के बावजूद भी मिटते नहीं। अंग्रेजी हकूमत व हुक्मरानों द्वारा बनाए गए कायदे व कानून अभी तक पुलिस के चेहरे को किसी न किसी रूप में दागदार बनाए जाते आ रहे हैं। पुलिस को हर तरह से अविश्वास और संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। वर्तमान भारतीय पुलिस संगठन औपनिवेशवादी शासन प्रणाली की ही देन है तथा शायद यही कारण है कि अधिकतर बालीवुड फिल्म इंडस्ट्री भी आज तक नकारात्मक चेहरा प्रस्तुत करती आ रही है।

यह ठीक है कि पुलिस की छवि पर एक छोटी-सी घटना भी बहुत दूरगामी प्रभाव डालती है तथा एक कर्मी की गलती पूरे विभाग को कलंकित कर देती है। शायद यही कारण है कि पुलिस चाहे कितना भी अच्छा कार्य कर ले उसकी धूमिल छवि की परछाईयां पुलिस जनों का उनके मरने  तक भी पीछा नहीं छोड़तीं। सभी प्रकार के अपराधों चाहे हत्या हो, बलात्कार या फिर युवकों द्वारा नशीली वस्तुओं का सेवन करने के दोष भी पुलिस के सिर ही मढ़ दिए जाते हैं। 

जनता द्वारा या आतंकवादियों द्वारा किए गए पथराव से चाहे कितने भी जवान घायल हो जाएं मगर उसकी कोई चर्चा भी नहीं होती, जबकि आततायियों के 2 सदस्य यदि घायल भी हो जाएं तो पुलिस को अत्याचारी एवं तानाशाह का नाम दे दिया जाता है। इसी पृष्ठभूमि का अनुचित सहारा लेकर भारतीय फिल्म इंडस्ट्री (बालीवुड) ने भी पुलिस की छवि को धूमिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिल्म निर्माता पुलिस का ऐसा हैवानियत भरा चेहरा दर्शाते हैं कि उसका सीधा प्रभाव दर्शकों व बच्चों तक पड़ता है तथा समाज के लोग पुलिस को बेईमान, भ्रष्ट, अभद्र व्यवहार करने वाला ही मानने लग जाते हैं। 

पुलिस को जोकर के रूप में ढीला-ढाला, बढ़ी हुई तोंद वाला, शराबी व महिलाआें के साथ अभद्र व्यवहार करने वाला तथा घटनास्थल पर बहुत देरी से पहुंचने वाले के रूप में दर्शाया जाता है। राजनेताओं व रसूखदारों के साथ तालमेल रख कर गरीबों पर अत्याचार करने वाले के रूप में उनका चित्रण किया जाता है। विड बना यह है कि आज तक किसी भी पुलिस संस्था या पुलिस अधिकारी ने इन तथाकथित उच्च श्रेणी के स मानीय लोगों के विरुद्ध कभी भी आवाज नहीं उठाई और न ही न्यायालय में अवमानना की गुहार लगाई। 

बॉलीवुड वाले खुद भी दूध के धुले नहीं हैं तथा वे न जाने कितने बड़े सामाजिक अपराध करते रहते हैं। कुछ समय पहले ही फिल्म जगत के काफी अभिनेता व अभिनेत्रियां मादक पदार्थों के उपभोग में संलिप्त पाई गईं तथा जब मीडिया ने उनके विरुद्ध आवाज उठाई तो संपूर्ण फिल्म जगत मीडिया के विरुद्ध खड़ा हो गया था। यह ठीक है कि कुछ फिल्मों में पुलिस वालों को निष्ठावान, निडर व ईमानदार भी दर्शाया जाता है। 

समाज को और विशेषकर फिल्म जगत के बुद्धिजीवियों को नहीं भूलना चाहिए कि पुलिस दिन-रात इनकी सुरक्षा के लिए ड्यूटी पर तैनात रहती है तथा इनके वर्तमान व भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए अपना वर्तमान न्यौछावर करती रहती है। वर्तमान समय में यदि हम कोरोना काल की ही बात करें तो लगभग 1000 पुलिस जवान अपनी जान गंवा चुके हैं तथा लगभग 1,35,000 पुलिस जवान व अधिकारी इस घातक रोग से संक्रमित हुए। 

पुलिस वाले किन विकट परिस्थितियों में अपना कार्य करते हैं शायद इसका किसी को अनुभव नहीं है। एक आकलन के अनुसार 70 प्रतिशत कर्मचारी किसी न किसी बीमारी, जैसे उच्च रक्तचाप, शूगर व तनाव इत्यादि से ग्रस्त हैं। पुलिसकर्मियों को औसतन दिन में 14 घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है तथा लगभग 10 प्रतिशत कर्मियों को तो 24 घंटे ड्यूटी करनी पड़ती है तथा सप्ताह में कोई भी छुट्टी नहीं मिलती। ऐसे में जरा सोचिए कि उन पर मानसिक व शारीरिक स्तर पर क्या प्रभाव पड़ता होगा। आज पुलिसकर्मियों को अपराध रोकने से भी बढ़कर अपने मानसिक व शारीरिक सुरक्षा की चुनौती है। पुलिस की गाडिय़ों में व दफ्तरों में अक्सर लिखा होता है आपकी सेवा के लिए सदैव तत्पर। यह केवल वाक्य ही नहीं बल्कि सच्चाई भी यही है। 

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए फिल्म निर्माताओं को पुलिस की नकारात्मक छवि ही नहीं दिखानी चाहिए बल्कि उनके जोखिम भरे कत्र्तव्यों को भी दर्शाना चाहिए, जिससे बच्चों व आम दर्शकों के मन पर पुलिस के प्रति अच्छा संदेश जाए। फिल्म बोर्ड को भी ऐसी फिल्मों को मान्यता नहीं देनी चाहिए जिसमें पुलिस को उपहास के रूप में दर्शाया गया हो।
इनके अतिरिक्त पुलिस नेतृत्व को भी आवश्यकता अनुसार एेसे फिल्म निर्माताओं के विरुद्ध इकट्ठे होकर आवाज उठानी चाहिए, जो पुलिस की अवांछित नकारात्मक छवि को दर्शाते रहते हैं। फिल्म जगत के लोगों को समाज को तोडऩे का नहीं बल्कि जोडऩे का प्रयास करना चाहिए।-राजेंद्र मोहन शर्मा डी.आई.जी.(रिटायर्ड)


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Content Writer

Pardeep

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