भाजपा का लंबा सफर : ‘पार्टी विद डिफरैंस’ से ‘पार्टी ऑफ वन’
punjabkesari.in Wednesday, Sep 23, 2026 - 03:24 AM (IST)
17 सितम्बर भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन उस व्यक्ति का जन्मदिन मनाया गया, जो आज भाजपा का पर्याय बन चुका है। मोदी के सम्मान में हजारों आशीर्वाद के दीप जलाने, भव्य महाआरती आयोजित करने और देशभर में ‘सेवा संकल्प अभियान’ के कार्यक्रमों की धूम के बीच, पार्टी की उपलब्धियों और नेता की सफलता को इस तरह एकाकार किया गया कि प्रधानमंत्री का 76वां जन्मदिन व्यक्तिगत जीवन की उपलब्धि से अधिक एक राजनीतिक उत्सव प्रतीत हुआ।
नि:संदेह, लोकप्रिय नेता का जन्मदिन मनाने में कोई बुराई नहीं है। किसी नेता के 25 वर्ष के सार्वजनिक जीवन को सम्मानित करना भी अपराध नहीं है। लेकिन जब भाजपा, जिसने कभी स्वयं को ‘पार्टी विद ए डिफरैंस’ कहकर अपनी पहचान बनाई थी, उसी व्यक्ति केंद्रित राजनीति का रूप लेने लगे, जिसकी वह कभी आलोचना करती थी, तो एक सवाल का जवाब जरूरी हो जाता है-क्या भाजपा इतनी अधिक मोदी-केंद्रित हो गई है कि धीरे-धीरे पार्टी ही व्यक्ति का रूप लेती जा रही है? क्या वह उन विशेषताओं में से एक को छोड़ रही है, जो कभी उसे कांग्रेस से अलग करती थीं?
जरा भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उस वैचारिक सफर पर गौर कीजिए, जिसमें उन्होंने दशकों तक स्वयं को कांग्रेस मॉडल से बुनियादी तौर पर अलग बताया। संगठन को व्यक्तित्व से ऊपर, कार्यकत्र्ता को करिश्माई नेतृत्व और परिवार से ऊपर, विचारधारा को व्यक्ति से ऊपर तथा सामूहिक नेतृत्व को वंशवादी राजनीति से ऊपर रखा गया। पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण अडवानी ने एक बार पार्टी की आंतरिक पंक्तियों से नेताओं को तैयार करने की क्षमता को वह विशेषता बताया था, जो भाजपा को अन्य दलों से अलग करती थी। उन्होंने लिखा था कि पार्टी की शक्ति अगली पीढ़ी को तैयार करने में निहित है और यही बात भाजपा को ‘पार्टी विद ए डिफरैंस’ बनाती है।
आज भाजपा में मोदी का चेहरा हर जगह दिखाई देता है-पार्टी, सरकार और नेता को बढ़ा-चढ़ाकर एक ही आवाज और एक ही राजनीतिक ब्रांड के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। वे पार्टी की राजनीतिक पहचान का सबसे प्रमुख संक्षिप्त प्रतीक बन गए हैं। निश्चित रूप से, उनका चुनावी आकर्षण एक राजनीतिक वास्तविकता है, जो पार्टी के राजनीतिक संचार पर हावी है। उनकी सरकार ने ऐसी नीतियां और निर्णय लागू किए हैं, जिन्हें उनके समर्थक परिवर्तनकारी मानते हैं। अनुच्छेद 370, डिजिटल बुनियादी ढांचे का विस्तार, कल्याणकारी योजनाओं का वितरण और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती प्रतिष्ठा जैसी उपलब्धियां उनके नेतृत्व से जुड़ी हैं। लेकिन जब राजनीतिक प्रकाश पूरी तरह एक व्यक्ति पर केंद्रित हो जाए और संगठन केवल सहायक भूमिका में सिमटने का जोखिम उठाने लगे, तब क्या होता है?
विडंबना स्पष्ट है। भाजपा का कहना है कि ये समारोह ‘सेवा’, जनसेवा और प्रधानमंत्री के 25 वर्ष के सार्वजनिक जीवन को समॢपत हैं। वास्तव में, महीने भर चलने वाले इन कार्यक्रमों में स्वास्थ्य शिविर, स्वच्छता अभियान, रक्तदान और सरकारी योजनाओं के संबंध में जनसंपर्क जैसी गतिविधियां शामिल हैं। लेकिन राजनीति में प्रतीकों का महत्व होता है। जब किसी एक नेता के जन्मदिन पर लाखों दीप जलाए जाएं, जब मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेता भव्य आयोजनों में भाग लें और राजनीतिक संचार का केंद्रबिंदू उसी नेता की छवि बन जाए, तो यह प्रतीकात्मकता सामान्य जन्मदिन की शुभकामनाओं से कहीं आगे निकल जाती है। यह एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति को जन्म देती है, जिसमें नेता स्वयं आयोजन का केंद्र बन जाता है। और यही बात भाजपा की पुरानी पीढ़ी को असहज कर सकती है।
भाजपा की पुरानी पीढ़ी-अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण अडवानी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज आदि, एक सामूहिक राजनीतिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती थी। वे असहमति व्यक्त कर सकते थे, प्रतिस्पर्धा कर सकते थे और कभी-कभी सार्वजनिक रूप से अलग विचार भी रख सकते थे, बिना इस आभास के कि पूरा संगठन किसी एक व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूम रहा है। लेकिन मोदी-शाह युग ने नि:संदेह भाजपा को एक शक्तिशाली चुनावी मशीन में बदल दिया है। फिर भी सत्ता पाॢटयों को बदल देती है और लंबे समय तक सत्ता में बने रहना उन्हें और भी अधिक बदल सकता है। किसी भी सफल पार्टी के लिए खतरा तब पैदा होता है, जब चुनाव जिताने वाला नेता धीरे-धीरे उस संगठन से भी बड़ा हो जाता है, जिसने उसे तैयार किया है।
अब आईना भाजपा के सामने है। मोदी का सम्मान करना अनुचित नहीं। उनकी असाधारण राजनीतिक दीर्घायु को स्वीकार करना भी अनुचित नहीं। पार्टी कार्यकत्र्ताओं का अपने नेता के प्रति प्रशंसा या श्रद्धा रखना भी स्वाभाविक है लेकिन लोकतंत्र प्रशंसा और संस्थागत निर्भरता के बीच अंतर बनाए रखने की मांग करता है। एक स्वस्थ पार्टी को यह कहने में सक्षम होना चाहिए, ‘हम अपने नेता का सम्मान करते हैं लेकिन पार्टी नेता से बड़ी है।’ इसलिए भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती शायद विपक्ष से नहीं, बल्कि स्वयं मोदी की सफलता से उत्पन्न हो सकती है। असाधारण चुनावी सफलता असाधारण केंद्रीयकरण को जन्म दे सकती है और असाधारण केंद्रीयकरण अंतत: उसी सामूहिक संस्कृति को कमजोर कर सकता है, जिसने संगठन को लचीला और मजबूत बनाया है। भाजपा कभी कहा करती थी ‘पार्टी पहले, स्वयं सबसे बाद में।’ आज सवाल यह है कि क्या यह प्राथमिकता अब भी स्पष्ट रूप से कायम है?
क्या भाजपा मोदी से बड़ी पार्टी बनी रह सकती है? इसका उत्तर तब मिलेगा, जब अंतत: मोदी युग समाप्त होगा। क्या भाजपा तब भी भाजपा बनी रहेगी? या उसे यह एहसास होगा कि कहीं रास्ते में ‘पार्टी विद ए डिफरैंस’ एक ऐसे दल में बदल गई, जो एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द निर्मित है। यही जन्मदिन का असली सवाल है। और दीपों के विपरीत, इसका कोई अनुष्ठानिक उत्तर नहीं है।-पूनम आई. कौशिश
