नीतीश कुमार के बाद बिहार!
punjabkesari.in Sunday, Mar 15, 2026 - 03:31 AM (IST)
‘‘मेरा संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक से है। नीतीश जी हमारे संगठन से नहीं हैं। लेकिन त्याग, ईमानदारी और सामाजिक न्याय के प्रति समर्पण के मामले में वह हममें से कई लोगों से कहीं आगे हैं।’’ बिहार के एक दलित भारतीय जनता पार्टी विधायक ने कहा। लेकिन अन्य विचार भी हैं। ‘‘हम नीतीश जी की प्रशंसा करते हैं। लेकिन हम बिहार में आधुनिकीकरण और विकास भी चाहते हैं। जब भी हम औद्योगीकरण और भूमि के मुद्दे पर चर्चा करते, वह हमेशा हमें रोकते थे। उनका हमेशा यही कहना होता था-अगर किसान से जमीन छीन ली जाए, तो वह अपना जीवन यापन कैसे करेगा? अगर बिहार शहरीकरण में भारत के सबसे निचले 3 राज्यों में से एक है, तो इसका दोष उन्हीं पर जाता है। यह बेहद निराशाजनक था।’’ बिहार सरकार के एक पूर्व मंत्री और अब भाजपा के एक शीर्ष पदाधिकारी ने बताया।
अब जबकि नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में अपने अंतिम दिनों में, राज्य के समीकरण से बाहर हो चुके हैं और भाजपा विधानसभा की 243 सीटों में से 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार में प्राथमिक निर्णय लेने वाली होगी, यह विचार करना उचित है कि आने वाले वर्षों में बिहार का स्वरूप कैसा हो सकता है और क्या राज्य के विकास के प्रति श्री कुमार का दृष्टिकोण भाजपा द्वारा सांझा किया जाएगा?
तथ्यों से इंकार नहीं किया जा सकता। नीति आयोग (2025) और बिहार सरकार (आर्थिक सर्वेक्षण, 2025) के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि 2022-23 तक, कामकाजी आबादी, बिहार में जनसंख्या का अधिकांश हिस्सा कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन (49.6 प्रतिशत), सेवा क्षेत्र (28.9 प्रतिशत) और निर्माण क्षेत्र (18.4 प्रतिशत) में केंद्रित था। विनिर्माण क्षेत्र में केवल 5.7 प्रतिशत लोग कार्यरत थे। राज्य के लिए राहत की बात यह हो सकती है कि उसने पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने पर अवसंरचना निवेश किया है-केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित राजमार्ग उन्नयन में 33,000 करोड़ रुपए, रेल क्षमता परियोजनाओं में 1 ट्रिलियन रुपए, और जिला सड़कों में सुधार आदि।
दुविधा यह है कि बिहार को इस सारी अवसंरचना का क्या करना चाहिए? क्या उसे औद्योगिक निवेश में तेजी लानी चाहिए, जिसके लिए व्यापक (और महंगी) भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता होगी और जिससे केवल नाममात्र का अतिरिक्त रोजगार ही मिलेगा? या फिर उसे औद्योगिक संपदाओं के निर्माण को प्रोत्साहित करना चाहिए, जिनमें लघु और मध्यम इकाइयां स्थापित की जा सकें, जैसे कि हाजीपुर औद्योगिक क्षेत्र। कृषि के बाद सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एम.एस.एम.ई.) सबसे अधिक रोजगार सृजित करते हैं। बिहार की सभी औद्योगिक इकाइयों में से 95 प्रतिशत और विनिर्माण उत्पादन का 65 प्रतिशत लघु एवं मध्यम उद्यमों से आता है। 2023 में जब जनता दल (यूनाइटेड), या जद (यू) फिर से राष्ट्रीय जनता दल का सहयोगी बना, बिहार के उद्योग विभाग ने एक रणनीतिक व्यापार योजना के साथ केंद्र से जोरदार अपील की, जिसमें उसने तर्क दिया कि ऋण तक पहुंच और बाजार संपर्क एम.एस.एम.ई. के लिए 2 सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।
अधिकारियों का कहना है कि मदद की गुहार पर मिली प्रतिक्रिया उम्मीदों से कम रही। मुख्यमंत्री के गठबंधन सहयोगी गलत तरह के थे। जब सहयोगी बदले, तो भाजपा के नीतीश मिश्रा, जिन्हें राज्य के उद्योग जगत का रक्षक माना जाता था, को मंत्री बनाया गया। हालांकि, 2025 में नीतीश कुमार की सरकार में उनकी कोई भूमिका नहीं रही, क्योंकि भाजपा ने जातिगत समीकरणों के आगे घुटने टेक दिए। उसने मधुबनी के एक ब्राह्मण को अपनी सूची से हटाने का विकल्प चुना। इन सब बातों से यह स्पष्ट होता है कि यदि भाजपा बिहार में औद्योगीकरण और शहरीकरण को सामाजिक न्याय के साथ जोडऩा चाहती है, तो उसके समर्थकों और पैरवीकत्र्ताओं का एक ही सामाजिक आधार से होना आवश्यक है। भाजपा के लिए यह एक अनिवार्य विकल्प है। राज्य सरकार की जाति जनगणना का उसका विरोध स्वयं ही सब कुछ बयां करता है। और फिर, दूसरा विकल्प भी है, जो अपने आप में बेहद समस्याग्रस्त है। 2022 में, जब भाजपा और जद (यू) सहयोगी थे, तब नीतीश कुमार ने सार्वजनिक रूप से भाजपा के उस आह्वान को ठुकरा दिया था, जिसमें उत्तर प्रदेश में लागू योगी आदित्यनाथ मॉडल का अनुसरण करने और मस्जिदों से सभी लाऊडस्पीकर हटाने की बात कही गई थी।
‘‘इस बेतुकी बात को छोड़ दें। बिहार में हम किसी भी व्यक्ति के धार्मिक रीति-रिवाजों में दखल नहीं देते। बिहार के हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने का पूरा अधिकार है।’’ उन्होंने पूर्णिया में भाजपा सहयोगी शाहनवाज हुसैन के साथ एक जनसभा में कहा। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। भाजपा के पुराने नेता ऐसे कई मौकों को याद करते हैं, जब उन्होंने भाजपा के सहयोगी रहते हुए भी उसका डटकर मुकाबला किया। साथ ही, उन्होंने भाजपा के वक्फ कानून का समर्थन किया और मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन(एस.आई.आर.) पर बिल्कुल भी कुछ नहीं कहा। उनकी पार्टी ने 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव भाजपा के साथ गठबंधन में लड़े और मुस्लिम वोटों का क्रमश: 6 प्रतिशत और 12 प्रतिशत हासिल किया। आंकड़े बताते हैं कि जब तक भाजपा के साथ जद (यू) है, वह मुस्लिम वोटों का भरपूर लाभ उठा सकती है। यह कहना मुश्किल है कि अगर कुमार सत्ता से बाहर हो जाते हैं तो क्या स्थिति वैसी ही रहेगी। तो अहम सवाल यह है-उनकी अनुपस्थिति में क्या भाजपा जद (यू) की तरह हो जाएगी? या जद (यू) भाजपा की तरह हो जाएगी? विपक्ष भी खुद से यही सवाल पूछ रहा है।-अदिति फडणीस
