अपराधी बनने की शुरूआत ‘घर से ही होती है’

2020-10-17T02:10:09.327

अक्सर जब यह देखने, सुनने, पढऩे को मिलता है और आपसी बातचीत में चर्चा का विषय बनता है कि समाज में अपराध बढ़ रहे हैं, लोग जरा-सी बात पर मारपीट, हत्या कर देते हैं, जो बच्चे अभी वयस्क भी नहीं हुए, इन कामों में शामिल हैं, बड़ों की बात मानना या उनका आदर करना तो दूर, उनका अपमान करने से लेकर उनके साथ भी दुश्मन जैसा व्यवहार करने से नहीं चूकते तो सोचना जरूरी हो जाता है कि आखिर गलती कहां हुई है? 

युवा वर्ग और अपराध
दौर चाहे वर्तमान हो या पिछले कुछ वर्षों का इतिहास हो, आंकड़े इसी बात की गवाही देते मिलेंगे कि युवा वर्ग में अपराध करने और इसमें औरों को भी शामिल करने की प्रवृत्ति का सबसे बड़ा कारण उनका अनपढ़ या मामूली पढ़ा-लिखा होना और किसी भी तरह का काम करने के कौशल का न होना है। निर्भया, निठारी से लेकर हाथरस या किसी भी स्थान पर किसी भी एेसे जघन्य अपराध की खोजबीन कर लीजिए जिसमें 15 से 25 साल तक का युवा वर्ग सम्मिलित पाया जाता हो तो लगभग शत-प्रतिशत वे एेसे मिलेंगे जिन्होंने स्कूल का मुंह नहीं देखा या छोड़ दिया या निकाल दिए गए हों। यही कारण है कि बहुत से विकसित और विकासशील देशों में अगर स्कूल जाने की उम्र का कोई लड़का या लड़की पढ़ता-लिखता नहीं तो उसके लिए माता-पिता को जिम्मेदार मानकर उनसे अपने बच्चों के पालन-पोषण का अधिकार छीन लिया जाता है।

जहां तक हमारे देश की बात है, यहां इस तरह का कोई कानून बनाने की कौन कहे, सोचा भी नहीं  जा सकता क्योंकि राजनीतिक दलों, सरकारों के मंत्रियों और सांसद तथा विधायकों में अनपढ़ों, मामूली पढ़े-लिखे और अपराध की दुनिया की सीढ़ी पर चढ़कर सत्ताधारी बने लोगों की तादाद उनसे कहीं ज्यादा है जो राजनीति को देश के विकास और समाज कल्याण के लिए  सेवा का मार्ग समझते हैं। 

अपराध की मानसिकता
यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि क्या पढ़े-लिखे और बड़ी-बड़ी डिग्रियां रखने वाले तथा विदेशों से शिक्षा प्राप्त लोग अपराध करते नहीं पाए जाते तो आंकड़े कहते हैं कि इनका प्रतिशत पूरी आबादी के शून्य और एक प्रतिशत के बीच रहता है। मिसाल के तौर पर माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, सुब्रत राय, हर्षद मेहता जैसे अपराधी उंगलियों पर गिने जा सकते हैं और इन्होंने जो अपराध किए वे आॢथक अपराध हैं और वे हमारे सिस्टम की खामियों का फायदा उठाते हुए करने में कामयाब हुए। इसके अतिरिक्त जो इनके चंगुल में फंसकर अपना बहुत कुछ लुटा बैठे उनमें ज्यादातर अशिक्षित लोग थे। मिसाल के तौर पर सहारा और हर्षद घोटाले जैसे कांड इसलिए सफल हो पाए क्योंकि उन्होंने ऐसे लोगों को अपना निशाना बनाया जो पढ़े-लिखे न होने के कारण इनके जाल में आसानी से फंस गए। 

अपराध और रोजगार
अपराधी बनने के लिए शिक्षा के बाद जिस कारण की सबसे बड़ी भूमिका है, वह है रोजगार और जो अंतत: शिक्षा से ही जुड़ा हुआ है। बेरोजगारी का सबसे बड़ा कारण शिक्षा का अभाव, कार्य कुशलता यानी स्किल का न होना और संसाधनों का सीमित होना तो है ही, साथ में इसके राजनीतिक और सामाजिक कारण भी हैं। इनमें सबसे पहले जब साधारण व्यक्ति यह देखता है कि कुछ लोग अनपढ़ या मामूली शिक्षा की ही बदौलत केवल अपने रुतबे और दबंगई के आधार पर नेतागिरी का पेशा अपनाकर अकूत धन और ताकत के मालिक बन रहे हैं तो उन्हें भी पढऩे-लिखने की क्या जरूरत है? 

इस तरह इन नेताआें को अपने समर्थक मिल जाते हैं जो जरा से लालच में आकर कहीं भी धरना, प्रदर्शन, तोडफ़ोड़, हिंसा, आगजनी से लेकर कुछ भी अनैतिक और गैर कानूनी काम करने को तैयार हो जाते हैं। विडंबना यह है कि इसे ही ये लोग अपना रोजगार मान लेते हैं। यदि देश में बचपन से ही अपराधी बनने की राह को रोकना है तो उसके लिए माता-पिता और अभिभावकों को यह तय करना होगा कि वे बच्चों को उनके बचपन से ही पैसा बनाने की मशीन यानी ए.टी.एम. बनाना चाहते हैं और अपराध की दुनिया में कदम रखने की पहल करते हुए देखना चाहते हैं या फिर कुछ वर्षों का इंतजार करते हुए उनके शिक्षित होकर बेहतर भविष्य के सपने को साकार करना चाहते हैं, इसका चुनाव उन्हें ही करना है, जरा सोचिए!-पूरन चंद सरीन
 


Pardeep

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