क्योंकि ‘यैस मैन’ होते हैं खतरनाक

2020-11-26T05:20:21.357

महाराष्ट्र पुलिस नेतृत्व में जल्द ही एक बदलाव बदतर के लिए होने जा रहा है। भले ही एक ईमानदार और सक्षम प्रतिस्थापन को वर्तमान पदाधारी के लिए चुना जाता है, सुबोध जायसवाल के नेतृत्व की गुणवत्ता को मापना उनके लिए आसान होगा। सुबोध को रॉ से बाहर कर दिया गया था जहां उनके पास प्रमुख बनने की संभावना अधिक थी। मुम्बई के लोगों ने एक सम्मानित उत्कृष्ट अधिकारी दत्ता पडसलगिकर जो अब अजीत डोभाल के डिप्टी एन.एस.ए. हैं, को बदलने के लिए पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्त किया। जब दत्ता राज्य के बतौर डी.जी.पी. 6 महीने बाद सेवानिवृत्त हुए तो सुबोध ने उनका स्थान लिया। 

तीन पार्टियों का गठबंधन जो राजनीतिक नेतृत्व करता है, ने पाया कि सुबोध तबादलों तथा पोस्टिंग में हस्तक्षेप करते हैं। महाराष्ट्र की नई सरकार आश्वस्त है कि ये राजनीतिज्ञों का दिव्य अधिकार है कि वे एक यैसमैन को लगाकर पुलिस का राजनीतिकरण कर डालें। इस तरह करने से राजनीतिक हितों के साथ कानून की व्याख्या भी हो जाती है जो तथ्यों तथा संविधान के अनुसार नहीं होती। एक सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी तथा ‘यैस मैन आर डेंजर्स’ नामक किताब के लेखक गोपालकृष्णन शंकरन ने उल्लेख किया कि 21 अप्रैल 2017 को तत्कालीन गृह मंत्री (अब रक्षा मंत्री) ने उच्च नौकरशाहों से बातचीत के दौरान उन्हें चेताया कि वे लोग ‘यैस मैन’ न बनें तथा उन आदेशों को स्वीकार करना बंद कर दें जो कानून का उल्लंघन करते हैं। 

फील्ड मार्शल सैम मानेक शाह ने इस विषय पर कहा था कि ‘यैस मैन’ एक खतरनाक व्यक्ति होता है। वह एक पुरुष है और वह दूर तक जाएगा। वह सरकार का सचिव, मंत्री या फिर फील्ड मार्शल तक बन सकता है मगर कभी भी एक सम्मानित नेता नहीं बन सकता। उसके वरिष्ठ अधिकारी उसका उपयोग करेंगे, उसके सहयोगी उसे नापसंद करेंगे तथा उसके अधीनस्थ उसका तिरस्कार करेंगे। इस कारण आपको ‘यैस मैन’ का त्याग करना चाहिए। सरदार वल्लभ भाई पटेल को केंद्र में सत्ताधारी पार्टी उन्हें याद करती है। मोदी सरकार अपनी साधुओं वाली सलाह प्रशासनिक अधिकारियों को आखिर क्यों नहीं देती। एक प्रशासनिक अधिकारी राजनीति में हिस्सा नहीं ले सकते और न ही उन्हें राजनीति में हिस्सा लेना चाहिए। उसे न ही साम्प्रदायिक झगड़ों में शामिल करना चाहिए। 

मैंने सरदार पटेल, फील्ड मार्शल मानेक शाह तथा राजनाथ सिंह के परामर्श के बुद्धिमान वाले टुकड़ों को शंकरन की किताब से उद्धृत किया है। शंकरन एक सी.सी.जी. (संवैधानिक आचरण समूह) के सम्मानित सदस्य हैं जिसमें दिमाग लगाने वाले आई.ए.एस., आई.एफ.एस. तथा आई.पी.एस. अधिकारी बैठक करते हैं। यह सत्ताधारी सरकारों के अन्यायपूर्ण कार्यों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। इसके अलावा ये लोग केंद्रीय सिविल सेवा के राजनीतिकरण के खिलाफ हैं। 

सुबोध जायसवाल को केंद्र सरकार में डैपुटेशन में भेजने के लिए पूछा गया है जब वरिष्ठ आई.पी.एस. अधिकारियों की पोस्टिंग तथा उनके स्थानांतरण पर उनका परामर्श नहीं लिया गया। इस तरह उन्हें मात्र एक साधारण व्यक्ति बना दिया गया। शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार ने उनके अनुरोध को तुरंत स्वीकार कर लिया और इसकी सिफारिश केंद्र सरकार से कर डाली। यकीनन ‘यैस मैन’ को पसंद किया जाता है। हाल ही में अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी हुई थी और मुझे यकीन है कि सुबोध जायसवाल से परामर्श नहीं लिया गया। गुपचुप तरीके से पूरे आप्रेशन को रायगढ़ के एस.पी. तथा मुम्बई के पुलिस आयुक्त के साथ अंजाम दिया गया। विपरीत सलाह से सरकार डर गई थी। 

जब आई.ए.एस. तथा आई.पी.एस. अधिकारियों की नियुक्ति होती है तो वे संविधान की शपथ लेते हैं न कि वर्तमान सरकार की। वह शपथ लेते हैं कि देश के लोगों की सेवा करेंगे न कि सत्ताधारी पार्टी की। आई.ए.एस. तथा आई.पी.एस. अधिकारी सेवा करने के लिए अधिकारी बनते हैं न कि राजनेता बनने के लिए। मेरे अपने सेवाकाल के दौरान मुझे कई मौकों पर अपने राजनीतिक बॉस विलासराव देशमुख (तत्कालीन गृह राज्यमंत्री) तथा तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री स. बूटा सिंह को याद दिलाना होता था कि मैंने राजनेताओं की मदद करने के लिए आई.पी.एस. ज्वाइन नहीं की और न ही उनको चुनाव जिताने के लिए सर्विस ज्वाइन की। 

इस संदर्भ में मैं देशमुख की बात म्युनीसिपल चुनावों तथा बूटा सिंह की बात एस.जी.पी.सी. के चुनावों को लेकर कर रहा हूं। सी.सी.जी. मसूरी में अकादमी के निदेशक को निर्देश देने के लिए कहा  गया है कि प्रत्येक प्रोबेशनर को शंकरन की पुस्तक ‘यैस मैन आर डेंजर्स’ पढऩे के लिए कहा जाए ताकि वे एक सैद्धांतिक स्टैंड ले। जैसा कि महाराष्ट्र में सुबोध जायसवाल ने लिया था। प्रोबेशनर को गलत के साथ चलने की सलाह न दी जाए।-जूलियो रिबैरो(पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)


Pardeep

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