राष्ट्रीय राजनीति भी तय करेंगे विधानसभा चुनाव
punjabkesari.in Monday, Mar 16, 2026 - 03:50 AM (IST)
पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी चेरी में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। चुनाव परिणाम इन 5 राज्यों में भावी सरकार का फैसला ही नहीं करेंगे, राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी बताएंगे। इन राज्यों का सत्ता संग्राम ज्यादा दिलचस्प इसलिए भी होगा, क्योंकि 2 राज्यों में केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन राजग की सरकारें हैं तो 3 में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की। सबसे ज्यादा निगाहें पश्चिम बंगाल के चुनाव पर रहेंगी। ममता बनर्जी वहां 3 बार से मुख्यमंत्री हैं। दिलचस्प समीकरण यह कि पहले सत्ता में रही कांग्रेस और फिर 3 दशक से भी ज्यादा सत्तारूढ़ रहा वाम मोर्चा अब बंगाल की राजनीति में हाशिए पर हैं, जबकि भाजपा मुख्य विपक्षी दल बन चुकी है। पिछले चुनाव में भी भाजपा ने बंगाल में बदलाव का माहौल तो बनाया था लेकिन 294 सदस्यीय विधानसभा में 100 का आंकड़ा भी नहीं छू पाई, जबकि ममता की तृणमूल 215 सीटें जीत गई। दोनों दलों के मत प्रतिशत में भी 10 प्रतिशत का भारी अंतर रहा।
बेशक 3 सीटों से 77 सीटों की छलांग कम चमत्कारिक नहीं, पर बहुमत का आंकड़ा 147 है। तमाम तिकड़मों के बावजूद भाजपा उसका आधा सफर ही तय कर पाई। 2 सीटों से लड़ीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चॢचत नंदीग्राम सीट से शुभेंदु अधिकारी द्वारा हरा देना शायद भाजपा की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। लगातार 3 कार्यकाल के बाद ममता और तृणमूल के विरुद्ध सत्ता विरोधी भावना की संभावना से इंकार नहीं, पर उसका चुनावी लाभ उठाने के लिए स्वीकार्य विश्वसनीय चेहरा और मजबूत संगठन तो चाहिए। विशाल अल्पसंख्यक वोट बैंक तृणमूल कांग्रेस की बड़ी चुनावी ताकत है। इसीलिए भाजपा हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में गोलबंद करने की कवायद करती रहती है। इस कवायद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रियता से भाजपा अपने और तृणमूल के बीच के फासले को कितना तय कर पाएगी, पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम इस पर काफी निर्भर करेगा।
पिछली बार मिल कर लड़े कांग्रेस और वाम मोर्चा इस बार अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरेंगे। उनकी सीमित चुनावी भूमिका में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि वे तृणमूल के अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाते हैं या फिर सत्ता विरोधी मतदाताओं में हिस्सा बंटा कर भाजपा को नुकसान पहुंचाते हैं। एक बात तय है कि यह चुनाव ममता और भाजपा, दोनों के लिए करो या मरो वाला रहेगा। ममता के लिए यह चुनाव सबसे चुनौतीपूर्ण होगा। इसलिए भाजपा के लिए बंगाल में सरकार बनाने का यह सबसे अनुकूल अवसर भी माना जा रहा है। अगर ममता चौथी बार भी जनादेश पाने में सफल रहीं तो विपक्षी गठबंधन इंडिया के जरिए राष्ट्रीय राजनीति में उनकी भूमिका को नजरअंदाज करना कांग्रेस के लिए मुश्किल हो जाएगा।
तमिलनाडु की राजनीति अर्से तक द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच 2 ध्रुवीय रही लेकिन जयललिता के निधन के बाद वह संतुलन गड़बड़ा गया है। अन्नाद्रमुक के एकीकरण और उससे गठबंधन के जरिए भाजपा वहां सत्ता परिवर्तन की संभावनाएं तलाश रही है लेकिन एम.के. स्टालिन सरकार के कार्यकाल में सनातन धर्म और ङ्क्षहदी भाषा को लेकर रह-रह कर उठते रहे विवादों के बावजूद यह आसान नहीं लगता। हां, टी.वी.के. नामक दल बना कर फिल्म अभिनेता से राजनेता बने थलापति विजय अगर बड़ी ताकत बन कर उभरे तो तमाम समीकरण गड़बड़ा सकते हैं। अगर द्रमुक गठबंधन सत्ता बचाने में सफल रहा तो उससे राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन का भी मनोबल बढ़ेगा ही। वैसे सनातन और हिंदी विरोधी छवि के मद्देनजर स्टालिन के लिए राष्ट्रीय राजनीति की डगर आसान नहीं होगी। इंडिया गठबंधन भी उनसे जुड़े विवादों से बचना ही चाहेगा। अगर टी.वी.के. की चुनावी मौजूदगी से गैर द्रमुक दलों की सत्ता संभावनाएं बनीं, तो वह एक धुर दक्षिण भारतीय राज्य में भाजपा के लिए बिना टिकट खरीदे ही लॉटरी खुल जाने से कम नहीं होगा।
5 चुनावी राज्यों में भाजपा की जीत की सबसे बेहतर संभावनाएं असम में हैं। अर्से से घुसपैठ और जनसांख्यिकी परिवर्तन जैसे मुद्दों से घिरे रहे असम में लगातार दूसरी बार भाजपा सरकार है। पूर्व कांग्रेसी हिमंत बिस्वा सरमा ने पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा का जैसा विस्तार करवाया, उसके पुरस्कार स्वरूप उन्हें पिछले चुनाव के बाद असम का मुख्यमंत्री बनाया गया। भाजपा के लाडले हिमंत इस समय कांग्रेस ही नहीं, राहुल गांधी के भी सबसे मुखर आलोचक हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा को भाजपा में शामिल करवा कर हिमंत ने कांग्रेस को एक और बड़ा झटका चुनाव से ठीक पहले दिया। बेशक असम की राजनीति में गठबंधन आज भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा और कांग्रेस में से कौन बेहतर ढंग से चुनावी गठबंधन को अंजाम दे पाता है। राहुल के करीबी गौरव गोगोई के राजनीतिक भविष्य का फैसला भी काफी हद तक ये चुनाव कर देंगे।
केरल की 2 ध्रुवीय राजनीति में भाजपा के लिए ज्यादा संभावनाएं हैं नहीं। बेशक वहां से लोकसभा चुनाव जीते अभिनेता गोपी केंद्र में मंत्री बनाए गए। हाल ही में कांग्रेस सांसद शशि थरूर के निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा अपना मेयर भी बनाने में सफल हो गई, लेकिन केरल की सत्ता की जंग अभी भी मुख्यत: वाम मोर्चा यानि एल.डी.एफ. और कांग्रेसनीत मोर्चा यू.डी.एफ. के बीच ही सिमटी है। कोई भी जीते, सत्ता इंडिया गठबंधन के पास ही रहेगी लेकिन ध्यान रहे कि देश में केरल एकमात्र राज्य है, जहां वाम सत्ता बची हुई है। उस किले का ढहना वाम राजनीति पर विराम जैसा होगा। केंद्रशासित पुड्डुचेरी की राजनीति बहुत कुछ तमिलनाडु की तर्ज पर चलती है। पिछली बार पासा पलट गया क्योंकि द्रमुक की दोस्त कांग्रेस का चुनावी प्रदर्शन बेहद लचर रहा। परिणामस्वरूप क्षेत्रीय दल एन.आर. कांग्रेस और भाजपा मिल कर सरकार बनाने में सफल हो गए। इस बार वहां गठबंधन की बिसात पर कौन कैसा प्रदर्शन करेगा, सत्ता का जनादेश उसी समीकरण पर निर्भर करेगा।-राज कुमार सिंह
