राहुल गांधी के नाम खुला पत्र

punjabkesari.in Thursday, Mar 19, 2026 - 04:16 AM (IST)

प्रिय राहुल जी,
लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष के रूप में आपकी भूमिका केवल मोदी सरकार का विरोध करना नहीं है। आप सरकार से ठोस सवाल पूछें, तथ्यों के आधार पर उसकी नीतियों की जांच करें और यह सब करते हुए देशहित को सर्वोपरि रखें। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब सरकार और विपक्ष, दोनों अपनी भूमिका गंभीरता से निभाएं। दुर्भाग्य से, आपके कई बयान और आचरण ऐसे रहे हैं, जिनसे यह गंभीरता कमजोर ही नहीं, बल्कि कई बार खतरनाक रूप लेती भी दिखाई पड़ती है। ऐसा लगता है कि बात पहले कही जाती है, फिर उसके समर्थन में तथ्य इधर-उधर से खोजे जाते हैं। आपकी यह समस्या न तो 2014 के बाद शुरू हुई है और न ही यह आर.एस.एस.-भाजपा तक सीमित है। यह आपका स्वाभाविक चिंतन है, जिसमें इतिहास से असहजता, अहंकार, वैचारिक हीनता और तथ्यों से दूरी स्पष्ट झलकती है।

वर्ष 2010 के विकीलीक्स दस्तावेजों में दर्ज है कि आपने अमरीकी राजदूत से कहा था भारत को लश्कर-ए-तैय्यबा जैसे जिहादी संगठनों से अधिक खतरा ‘हिंदू समूहों’ से है। यह दरअसल उस उपक्रम का हिस्सा था, जिसमें घोषित इस्लामी आतंकवाद को जायज ठहराने के लिए भ्रामक-फर्जी ‘हिंदू-भगवा आतंकवाद’ का नैरेटिव बुना जा रहा था। जिस लश्कर-ए-तैय्यबा की आप तब ढाल बन रहे थे, उसने ही 2008 में पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर देश को दहला (मुंबई 26/11) दिया था। तब जघन्य गोधरा कांड (2002), जिसमें जिहादियों ने भजन-कीर्तन कर रहे 59 हिंदुओं को ट्रेन में जिंदा जला दिया था, उसे आपकी सरकार ने जिस प्रकार ‘हादसा’ कहकर गौण करने का प्रयास किया और 2007 में जिस तरह अदालत में हलफनामा देकर भगवान श्रीराम के अस्तित्व पर प्रश्न उठाया गया, वह सब एक व्यापक वैचारिक दर्शन की ओर संकेत करता है। इसी क्रम में आप और आपका परिवार निमंत्रण के बाद भी श्रीराम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह (2024) में नहीं गया।

राहुल जी, लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति आपका नजरिया भी कई बार सवालों के घेरे में रहा है। 2013 में आपने अपनी ही सरकार के एक अध्यादेश को सार्वजनिक रूप से ‘बकवास’ कहकर फाड़ दिया। यह असहमति नहीं, बल्कि संस्थागत मर्यादा पर आघात था। हालिया वर्षों में चुनावी पराजयों के बाद निर्वाचन आयोग और चुनावी प्रक्रिया पर संदेह जताना भी उसी प्रवृत्ति को दर्शाता है। असहज प्रश्न पूछने वाले पत्रकारों को ‘एजैंट’ कहना या उनकी जाति पूछना संवाद की गंभीरता को कम करता है। अभी कुछ दिन पहले आपने लखनऊ में कहा कि यदि पंडित जवाहरलाल नेहरू जीवित होते, तो दलित नेता कांशीराम जी कांग्रेस से मुख्यमंत्री बनते। यह कथन न केवल काल्पनिक है, बल्कि इतिहास की अनदेखी भी करता है। कांशीराम जी ने अपनी पूरी राजनीति कांग्रेस व्यवस्था के विकल्प के रूप में खड़ी की थी। वह डा. भीमराव रामजी आंबेडकर को अपना आदर्श मानते थे, जिन्हें गांधीजी के दबाव में पं. नेहरू ने 2 अन्य गैर-कांग्रेसियों के साथ स्वतंत्र भारत के पहले मंत्रिमंडल में शामिल किया था।

इतिहास बताता है कि 1951-52 के पहले लोकसभा चुनाव में आंबेडकर की हार सुनिश्चित करने के लिए पं. नेहरू और वामपंथी नेतृत्व ने पूरा प्रयास किया, जिसमें वे सफल भी हुए। स्वयं बाबा साहेब की दूसरी पत्नी सविता आंबेडकर के अनुसार, नेहरू उनकी सीट पर नजरें गड़ाए हुए थे। 16 जनवरी, 1952 को लेडी एडविना माऊंटबेटन को लिखे पत्र में नेहरू ने आंबेडकर की हार पर संतोष व्यक्त किया। यह कैसी मानसिकता है कि एक राष्ट्रीय नेता अपने समकालीन और संविधान-निर्माता की पराजय पर प्रसन्नता क्यों व्यक्त कर रहे थे, वह भी एक ऐसे औपनिवेशिक शासक की पत्नी से, जो भारत के विभाजन से जुड़े थे? इतना ही नहीं, 1946 में राजकुमारी अमृत कौर को लिखे पत्र में नेहरू ने आंबेडकर पर ‘ब्रिटिश सरकार के साथ मिलकर कांग्रेस के खिलाफ काम करने’ का आरोप लगाया था। उस समय के कांग्रेसी और वामपंथी उन्हें ‘गद्दार’ कहने से नहीं हिचकते थे, जबकि गांधीजी ने स्वयं आंबेडकर को ‘देशभक्त’ बताया था। यह विरोधाभास भी विचारणीय है।

आप आज कांशीराम जी को भारत रत्न देने की मांग कर रहे हैं। पर 2008 में आपकी ही सरकार ने इस मांग पर तवज्जो नहीं दी। सिद्धांतों का यह परिवर्तन स्वाभाविक तो नहीं लगता, वह भी तब, जब पं. नेहरू ने स्वयं को 1955 में भारत रत्न प्रदान किया, जबकि संविधान निर्माता डा. आंबेडकर को यह सम्मान 1990 में गैर-कांग्रेसी सरकार के दौरान मिला। मेरी 1994 में कांशीराम जी से कई लंबी मुलाकातें हुई थीं। वे सत्ता को लक्ष्य नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का साधन मानते थे। उन्होंने अपने आंदोलन की बागडोर मायावती को सौंपी और व्यक्तिगत पदों से दूरी बनाए रखी। आपने अपने भाषण में जिस तरह कलम का उपयोग किया, वह असल में कांशीराम जी का पसंदीदा तरीका था, वह इसे बहुत सरलता से समझाते थे। राहुल जी, आपके अनेक वक्तव्यों में एक ऐसा वैचारिक ढांचा दिखाई देता है, जो भारत की सनातन परम्परा को हीन दृष्टि से देखता है। यही कारण है कि आपने कई बार अदालत से फटकार सुनी, स्पष्टीकरण दिया और माफी तक मांगी। चाहे संघ को गांधी हत्या से जोडऩे वाले बयान हों, ‘चौकीदार चोर है’ प्रकरण हो या वीर सावरकर पर आपकी ओछी टिप्पणियां, हर बार आपको सफाई देनी पड़ी। आलोचना लोकतंत्र का अधिकार है, परंतु पूर्वाग्रहों को ही सच मानकर पेश करना उचित नहीं।

आपके द्वारा ट्रम्प के वक्तव्य ‘मृत अर्थव्यवस्था’ का समर्थन करना, विदेशी धरती पर भारतीय ‘सिखों की पहचान खतरे’ में बताना और बाहर जाकर देश के ‘लोकतंत्र को समाप्त’ कहना, अक्सर भारत-विरोधी शक्तियों के हथियार बन चुके हैं। कुछ माह पहले आपने कहा कि ‘कांग्रेस की लड़ाई अब सिर्फ भाजपा-संघ से ही नहीं, बल्कि ‘इंडियन स्टेट’ (भारत) से है’। क्या यह सच नहीं कि यही भाषा उग्रवादी-अलगाववादी संगठन भी इस्तेमाल करते है? डोकलाम प्रकरण के दौरान आपकी चीनी राजदूत से मुलाकात और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण राफेल पर आपके बेतुके आरोप इसी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। वर्तमान भारत को ऐसा विपक्ष चाहिए, जो तथ्यों, गंभीरता और सकारात्मक विकल्प के साथ सरकार को चुनौती दे। नेता प्रतिपक्ष के रूप में आपके पास संवाद के स्तर को ऊंचा उठाने का सुनहरा अवसर है। आशा है, आप इसे आत्मचिंतन के साथ ग्रहण करेंगे। सादर!-बलबीर पुंज    


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